अंगना में पड़ेला फुहरवा...

Published at :01 Aug 2019 6:23 AM (IST)
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अंगना में पड़ेला फुहरवा...

संजय यादव टिप्पणीकार yadav.sanjay009@gmail.com तपते मन को जैसे कोई भीगी फुहार छू जाये, कुछ ऐसी अदा से सावन अपने साथ बारिश ले आता है. सावन कहने भर ही से लगता है कि मानो ऋतु ने बांसुरी बजायी हो और मौसम मस्ताना हो गया हो! मदमस्त सावन देखने की हसरत तो गांव में जाकर ही पूरी […]

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संजय यादव
टिप्पणीकार
yadav.sanjay009@gmail.com
तपते मन को जैसे कोई भीगी फुहार छू जाये, कुछ ऐसी अदा से सावन अपने साथ बारिश ले आता है. सावन कहने भर ही से लगता है कि मानो ऋतु ने बांसुरी बजायी हो और मौसम मस्ताना हो गया हो! मदमस्त सावन देखने की हसरत तो गांव में जाकर ही पूरी हो सकती है!
पेड़ों पर झूले, खेतों में शरारत और मेड़ों पर अठखेलियां आदि प्रेम के माध्यम बन जाते हैं! प्रकृति का सावनी रूप अद्भुत-अतुलनीय लगता है. हर तरफ हरियाली, रिमझिम बूंदों और काले बादलों की छटा देखकर मन मचल उठता है. ससुराल से मायके लौटी बेटियाें के मनोभाव सावन में कजरी के माध्यम से प्रकट होते हैं!
सावन तो ग्रामीण महिलाओं के गीतों का एक त्यौहार का महीना है. गीतों के इस लोक में पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, नदी, खेत, किसान, जंगल सब शामिल हैं.
सावन अति प्रिय है, मधुर है, मानवीय है, प्रेम है, बिरह है, इसलिए गीतों में सावन का विशेष महत्व है. ससुराल में नवविवाहिता उमड़ते बादल को देखकर गाती है- ‘हमरे नैहरे कि ओरिया उड़ेला बदरा! जब जब ई बदरा अंगनवा में बरसे. गोरी अपने परदेशी के निहारे डगरा.’
सावन के गीतों में विरह है, तो खुशियां भी हैं. आशा के साथ निराशा भी है! एक विवाहिता ससुराल में अत्यंत सुखी होने का बखान करते हुए अपनी ननद से कहती है- ‘नाहक भइया आयो अनवैया रे, सवनवा में ना जाइबो ननदी!’ वहीं एक बेटी अपने पिता से कुछ और ही कहती है- ‘अब की बरस भेजि भइया को बाबुल, सावन में लीन्हो बुलाय रे…’
सावन में ये गीत मानवीय लगाव एवं मिठास को बढ़ा देते हैं. प्रकृति का मानवीकरण कर प्रतीकों के माध्यम से अंतस की अनुभूतियों को सहज ढंग से प्रकट कर देते हैं. बचपन का सावन सबके लिए स्थायी सुखद स्मृति होता है.
मुझे तो अपने बचपन का सावन नहीं भूलता है! लोग झूले के आनंद में मदमस्त हो जाते थे. लोकगीत, कजरी आदि लड़कों को याद नहीं थी, लेकिन सब दोस्त मिलकर कोई गीत एक संवेत स्वर में गाने का प्रयास करते थे! बड़ी सुखद अनुभूति होती थी. छोटे-मोटे गिले-शिकवे भी भूल जाते थे!
गांव के पुराने पीपल से लेकर हरियाले आम और नीम की डाल पर पड़े झूले पर बैठ शरारत भरतीं सखियों के साथ जीवन के कोलाहल को विस्मृत कर मन भर जी लेने की छटपटाहट, चहुं ओर कजरी और भावुक-बिरह गीतों के मधुर स्वरों से सृजित होते रसीले वातावरण से प्रकृति के रोम-रोम में होता स्पंदन, सावन की पहचान हैं.
प्रकृति भी गर्मी की तपिश के कारण मुरझाये-कुम्हलाये पेड़-पौधों को वर्षा की ठंडी फुहारों में भिगोकर हरियाली की सुंदर चुनर ओढ़ा देती है.
इस ऋतु में प्रकृति जिस तरह अपना शृंगार करती है, उसी तरह महिलाएं-युवतियां भी तैयार होती हैं. सावन का मनमोहक अंदाज देख लगता है, मानो प्रकृति ने हरे रंग की साड़ी के साथ बिंदी-चूड़ियां भी धारण कर ली हो. सौंदर्य के नये प्रतिमानों को गढ़ता सावन मानव की सौंदर्यप्रियता की भावना को सौंदर्य साधना की उपासना तक ले जाने की प्रेरणा देता है.
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