खपत पर नियंत्रण की पहल नहीं

Published at :15 Jul 2014 4:06 AM (IST)
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खपत पर नियंत्रण की पहल नहीं

।। डॉ भरत झुनझुनवाला ।। अर्थशास्त्री विदेशी निवेश का मोह वित्त मंत्री को छोड़ नहीं रहा है. जबकि हमें मिलनेवाले विदेशी निवेश का बड़ा हिस्सा राउंड ट्रिपिंग है – हमारा काला धन बाहर जाकर अपना रंग परिवर्तित करके विदेशी निवेश के रूप में वापस आ रहा है. वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा प्रस्तुत बजट की […]

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।। डॉ भरत झुनझुनवाला ।।

अर्थशास्त्री

विदेशी निवेश का मोह वित्त मंत्री को छोड़ नहीं रहा है. जबकि हमें मिलनेवाले विदेशी निवेश का बड़ा हिस्सा राउंड ट्रिपिंग है – हमारा काला धन बाहर जाकर अपना रंग परिवर्तित करके विदेशी निवेश के रूप में वापस आ रहा है.

वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा प्रस्तुत बजट की आम तौर पर सराहना की गयी है कि इसमें लोकलुभावन वादों के स्थान पर ठोस काम करने का संकल्प है. आंशिक रूप में यह सही भी है, परंतु यूपीए की गलत नीतियों को निष्ठापूर्वक लागू करने का परिणाम अच्छा नहीं होगा. जरूरत नीति परिवर्तन के साथ-साथ कार्यान्वयन में सुधार करने की है. आलोचना के पहले बजट के सकारात्मक पहलुओं पर नजर डालना उचित होगा. देश को शहरीकरण की ओर ले जाने का स्पष्ट संकल्प दिखता है.

सेटेलाइट शहरों का विकास, महानगरों के बीच इंडस्ट्रियल कॉरीडोर का निर्माण, मेट्रो का निर्माण, सड़कों और एयरपोर्ट का विस्तार आदि सही दिशा में है. किसानों तथा मध्यवर्गीय उपभोक्ताओं को प्राइस स्टेबलाइजेशन फंड से राहत मिलेगी. सौर ऊर्जा पर बजट में खासा जोर है. किसानों के लिए सोलर पंप को प्रोत्साहन दिया गया है. राजस्थान, तमिलनाडु और लद्दाख में सौर ऊर्जा संयंत्र लगाये जायेंगे. यह महत्वपूर्ण कदम है. टैक्स पेयर के लिए छूट दो लाख से बढ़ा कर 2.5 लाख कर दी गयी है. इससे मध्यम वर्ग को राहत मिलेगी.

लेकिन, इस समय देश की प्रमुख समस्या रोजगार की है. लगभग 90 प्रतिशत लोग असंगठित क्षेत्र में कार्यरत हैं. इन्हें संगठित क्षेत्र में रोजगार देने के रोडमैप का नितांत अभाव है. मनरेगा के कार्यो को कृषि से जोड़ा गया है, यह कदम स्वागतयोग्य है. लेकिन, मनरेगा की जरूरत ही न पड़े, इस ओर कोई कदम नहीं उठाया गया है. अपने भाषण में वित्त मंत्री ने विकास दर, महंगाई, वित्तीय घाटे एवं व्यापारिक घाटे को प्रमुख चुनौतियां बताया था. रोजगार को प्रमुख चुनौती नहीं माना गया. यह दुखद है. किसानों के लिए भी पुराने राग का अलाप जारी है. किसान की एक मात्र समस्या है कि उसे उत्पाद का सही मूल्य नहीं मिल पा रहा है.

अब तक की सरकारें मध्यम वर्ग को सस्ता खाद्यान्न उपलब्ध कराना ज्यादा जरूरी मानती रही हैं. वित्त मंत्री नहीं समझ रहे हैं कि इससे किसान को लाभ होने के स्थान पर वह सस्ते ऋण के दलदल में और अधिक धंसता जाता है और आत्महत्या को मजबूर हो जाता है. वित्त मंत्री को मध्य वर्ग को विश्वास में लेकर खाद्यान्नों के बढ़े मूल्यों को बर्दाश्त करने का आवाहन करना चाहिए था. तब किसान वास्तव में खुशहाल हो जाता. देश की खाद्य सुरक्षा निश्चित हो जाती. किसान को ऋण लेने के लिए घूस का भी सहारा नहीं लेना पड़ता.

बजट में सरकारी खपत पर नियंत्रण की कोई पहल नहीं की गयी है. महंगाई का मूल कारण सरकार की बढ़ती खपत है. इसे पोषित करने के लिए रिजर्व बैंक नोट छापता है. बड़ी मात्र में उपलब्ध नये नोटों द्वारा कम मात्र में उपलब्ध माल का पीछा करने से दाम बढ़ते हैं. सरकारी कर्मियों का वेतन देने में सरकार का अधिकाधिक राजस्व व्यय हो रहा है. यही कारण है कि सरकार को रिजर्व बैंक से नोट छापने के लिए आग्रह करना पड़ता है. वित्त मंत्री को चाहिए था कि सातवें वेतन आयोग से वेतन वृद्घि को बाहर करते और सरकारी कर्मियों की कार्य कुशलता में सुधार की ओर आयोग को फोकस करते. इस समय में इसे किया जा सकता था.

विदेशी निवेश का मोह वित्त मंत्री को छोड़ नहीं रहा है. हमें मिलनेवाले विदेशी निवेश का बड़ा हिस्सा राउंड ट्रिपिंग है- हमारा काला धन बाहर जाकर अपना रंग परिवर्तित करके विदेशी निवेश के रूप में वापस आ रहा है. वित्त मंत्री ने गंगा पर जहाजों को चलाने के प्लान को हरी झंडी दी है. यह गंगा को नष्ट करने की महती योजना है.

वित्त मंत्री ने गांवों में 24 घंटे सातों दिन बिजली उपलब्ध कराने के लिए ग्रामीण फीडर के सुधार के लिए धन आवंटित किया है. इसका स्वागत है. परंतु इसके साथ शहरों को 24 घंटे सातों दिन बिजली उपलब्ध कराने का संकल्प जुड़ा हुआ है. मुंबई के एक उद्यमी के घर की बिजली का मासिक बिल 74 लाख रुपये है. 24 घंटे सातों दिन उपलब्धता से ऐसी विलासिता की बिजली की मांग बढ़ेगी. इसे पूरा करना असंभव है. गुजरात में कतिपय यह संभव था, क्योंकि शेष देश के कोयले को गुजरात ले जाकर बिजली बनायी जा रही थी. पूरे देश की मांग को पूरा करना संभव नहीं है, चूंकि हमारे पास कोयले के भंडार सीमित हैं.

यूरेनियम के लिए हम विदेशों पर आश्रित हो जाते हैं और हाइड्रोपावर से हमारा पर्यावरण बिगड़ता है. अत: बिजली की मांग कम करने के प्रयास करने थे. प्रति व्यक्ति बिजली की खपत 25 यूनिट प्रति माह से अधिक होने पर बिजली के दाम बढ़ा देना चाहिए था. बिजली-पानी पर लग्जरी कंजम्पशन टैक्स लगा कर अमीरों की मांग कम करनी थी. तब वर्तमान उत्पादन में ही गांवों को 24 घंटे सातों दिन बिजली मिल जाती. इससे धरती माता को भी सकून मिलता. एनडीए-2 का संकल्प है कि देश को सुशासन प्रदान किया जायेगा. इस संकल्प का भरपूर स्वागत है, परंतु साथ ही साथ नीतियों में सुधार करना भी आवश्यक है.

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