प्रतिभा सम्मान के नाम पर

आजकल प्रतिभा सम्मान की एक परंपरा-सी चल निकली है. सालोंभर चलनेवाली परीक्षाओं के दौर में कुछ परीक्षार्थी श्रेष्ठ होते हैं. इसके लिए उन्हें प्रमाणपत्र मिलता है जो न केवल देखने-दिखाने के अलावा उन्हें प्रोत्साहित भी करता है. लेकिन यूं अलग से विविध रूपों में प्रतिभा सम्मान का तरीका नहीं जंचता. ऐसे में, एक दूसरे बड़े […]
आजकल प्रतिभा सम्मान की एक परंपरा-सी चल निकली है. सालोंभर चलनेवाली परीक्षाओं के दौर में कुछ परीक्षार्थी श्रेष्ठ होते हैं. इसके लिए उन्हें प्रमाणपत्र मिलता है जो न केवल देखने-दिखाने के अलावा उन्हें प्रोत्साहित भी करता है. लेकिन यूं अलग से विविध रूपों में प्रतिभा सम्मान का तरीका नहीं जंचता. ऐसे में, एक दूसरे बड़े छात्र वर्ग में क्या अपमान, उपेक्षा, तिरस्कार और कुंठा का भाव नहीं जगता?
फिर क्या समाज, राज्य या देश की गाड़ी हांकने को ये गिने-चुने टॉपर ही काफी हैं? यह न भूलें कि एक मामूली सिपाही, अर्दली, गेटकीपर तथा मैदान में खिलाड़ियों के उत्साहवर्धन को तालियां ठोंकनेवाले सामान्य दर्शक की भी बड़ी भूमिका होती है. गरीब छात्र किसी तरह काम के साथ पढ़ाई कर फस्र्ट, सेकेंड या थर्ड क्लास से पास होता है, क्या मुख्यमंत्री महोदय इनपर भी कृपादृष्टि बरसायेंगे?
प्रो लखन कु मिश्र, टाटीसिलवे
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