टेलीविजन समाचार के नायाब चेहरे

Published at :10 Jul 2014 4:54 AM (IST)
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टेलीविजन समाचार के नायाब चेहरे

आकार पटेल वरिष्ठ पत्रकार चौबीस घंटे के समय-चक्र और कुछ प्रसिद्ध चेहरों पर निर्भरता के कारण टेलीविजन में अखबार की तुलना में कहीं अधिक मेहनत है. मैंने दोनों माध्यमों में काम किया है और अपने अनुभव से यह बात कह सकता हूं. मेरे दोस्त राजदीप सरदेसाई और सागरिका घोष ने नेटवर्क 18 से इस्तीफा दे […]

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आकार पटेल

वरिष्ठ पत्रकार

चौबीस घंटे के

समय-चक्र और कुछ प्रसिद्ध चेहरों पर निर्भरता के कारण

टेलीविजन में अखबार की तुलना में कहीं अधिक मेहनत है. मैंने दोनों माध्यमों में काम किया है और अपने अनुभव से यह बात कह सकता हूं. मेरे दोस्त राजदीप सरदेसाई और सागरिका घोष ने नेटवर्क 18 से इस्तीफा दे दिया है. देश के दो महत्वपूर्ण टेलीविजन चैनलों- अंगरेजी समाचार चैनल सीएनएन-आइबीएन और हिंदी चैनल आइबीएन 7- के जरिये दर्शक इन दोनों व्यक्तित्वों से बखूबी परिचित हैं. भारत के बड़े व्यापारिक चैनल सीएनबीसी-टीवी 18 के साथ ये दोनों चैनल उस नेटवर्क का हिस्सा हैं, जो अब देश के सबसे अमीर व्यक्ति मुकेश अंबानी की मिल्कियत है.

राजदीप भारत के सबसे प्रसिद्ध पत्रकारों में से हैं और दो दशक पहले भारतीय समाचार टेलीविजन के निजी क्षेत्र में जाने के दौर से ही इस क्षेत्र में सक्रिय हैं. उस समय अंगरेजी समाचार के परिदृश्य पर मुख्य रूप से प्रणय रॉय के न्यू डेल्ही टेलीविजन (एनडीटीवी) का कब्जा था. एनडीटीवी सरकारी नेटवर्क ‘दूरदर्शन’ पर एक कार्यक्रम से प्रारंभ हुई थी. उसके बाद इस कंपनी ने रूपर्ट मडरेक के एक चैनल को चलाते हुए अपना खुद का नेटवर्क शुरू करने तक पहुंची.

प्रणय रॉय ने जाने-माने अभिजात्य शैक्षणिक संस्थानों से शिक्षित युवाओं की एक टीम तैयार की, जिसका दबदबा आज अंगरेजी के समाचार चैनलों पर है. राजदीप इसी टीम का हिस्सा थे. वे और सागरिका, जो उनकी पत्नी हैं, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से पढ़े हैं. टाइम्स नाउ चैनल को चलानेवाले अर्नब गोस्वामी भी एनडीटीवी से हैं और ऑक्सफोर्ड से शिक्षित हैं. बरखा दत्त, जो पाकिस्तान में बहुत लोकप्रिय हैं, जैसा मुङो पिछले महीने उनके साथ पाकिस्तान यात्र के दौरान पता चला, आज संपादक के रूप में एनडीटीवी चला रही हैं.

इस नेटवर्क के अन्य महत्वपूर्ण चेहरे निधि राजदान, विक्रम चंद्रा, श्रीनिवासन जैन व सोनिया वर्मा हैं. हिंदी में भी एनडीटीवी ने कई सितारे दिये, हालांकि इनमें से कई टेलीविजन में पहले ही अपना नाम बना चुके थे, जैसे- दिबांग, पंकज पचौरी (जो बाद में प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार भी बने) और नगमा.

अंगरेजी चैनलों की ओर रुख करें, तो उम्र के चौथे दशक में चल रहे ये पत्रकार अखबारों में कार्यरत अपने समकालीनों से कहीं अधिक प्रभावशाली और चर्चित हैं. मैं तो यहां तक कहना चाहूंगा कि वे भारतीय अखबारों के अब तक के किसी भी पत्रकार की तुलना में अधिक शक्तिशाली हैं और राष्ट्रीय बहस की दिशा को निर्धारित कर सकते हैं, विशेषकर अर्नब, राजदीप व बरखा. बहरहाल, इस पर चर्चा बाद में.

इस वजह से ये प्रमुख टेलीविजन पत्रकार समाचार पत्रों में काम करनेवाले अपने समकक्षों की कमाई की तुलना में कहीं अधिक कमाते हैं. वे इसके उचित अधिकारी भी हैं. उनके स्तर पर टेलीविजन में वार्षिक आमदनी तकरीबन पांच लाख अमेरिकी डॉलर तक पहुंचती है. कुछ के लिए तो कंपनियों में वित्तीय हिस्सेदारी का भी विकल्प है. टेलीविजन पत्रकारिता कठिन काम है और इसमें समाचार पत्रों की तुलना में अधिक मेहनत की आवश्यकता होती है. इन लोगों की सफलता के पीछे उनकी स्वाभाविक प्रतिभा के अलावा जो कारण है, वह यह है कि इनकी प्रवृत्ति प्रतियोगितात्मक होती है और वे बहुत मेहनती हैं.

कई दिन पहले एक रात मैं किसी कार्यक्रम के सिलसिले में सीएनएन-आइबीएन के स्टूडियो गया था. वहां मैं एक खाली केबिन में बैठ कर कुछ तैयारी कर रहा था. करीब 9.30 बजे का समय था. उस केबिन से मैं राजदीप सरदेसाई को न्यूज रूम में मौजूद कार्यक्रम-निर्माताओं को किसी फोटोग्राफ के खराब उपयोग और खबर के कमजोर शीर्षक के लिए डांटते हुए सुन रहा था. यह बात मुङो महत्वपूर्ण लगी कि ऐसी छोटी गलतियां भी उन्हें परेशान कर सकती हैं.

उसी चैनल पर 2012 के गुजरात चुनाव के विशेष कार्यक्रम में मैंने भाग लिया था. यह कार्यक्रम सुबह सात बजे से देर रात ग्यारह बजे तक चला था. इन सोलह घंटों में लगातार काम करने के बावजूद राजदीप व सागरिका के चेहरों पर शिकन तक न थी और वे उत्साहित होकर अपना काम कर रहे थे. हममें से बहुत लोगों के लिए, खासकर मेरे जैसे व्यक्ति के लिए, ऐसा कर पाना बहुत कठिन है. ब्रेक के दौरान भी सागरिका रुझानों पर नजर गड़ाये रहती थीं और नयी सूचना पर उनकी आंखों में एक उत्साही चमक आ जाती थी. ऐसा लगाव अपने काम से अतिशय प्रेम से ही आ सकता है.

टाइम्स नाउ के एक कार्यक्रम के दौरान ब्रेक में मैं अपने इयरफोन पर अर्नब को अपने सहयोगियों से कहते हुए सुन रहा था- ‘बरखा के कार्यक्रम में क्या हो रहा है? राजदीप के कार्यक्रम का विषय क्या है? उनमें कौन-कौन अतिथि भाग ले रहे हैं?’ वगैरह. अपने काम में ऐसा समर्पण असाधारण और प्रशंसनीय है. पाकिस्तान में सम्मेलन के दौरान बरखा सभागार के अंदर-बाहर फोन पर लगी रहती थीं, जबकि हम सब निश्चिंत थे.

चौबीस घंटे के समय-चक्र और कुछ प्रसिद्ध चेहरों पर निर्भरता के कारण टेलीविजन में अखबार की तुलना में कहीं अधिक मेहनत है. मैंने दोनों माध्यमों में काम किया है और अपने अनुभव से यह बात कह सकता हूं. बतौर संपादक मैं रात में चैन से सो सकता हूं, क्योंकि मुङो पता है कि अगले 12 घंटे काम पर मेरी जरूरत नहीं है. टेलीविजन में ऐसा नहीं हैं. यह माध्यम पूर्ण समर्पण और अभिरुचि की मांग करता है, विशेषरूप से अपने वरिष्ठों से.

यह बात कही जानी चाहिए कि ये लोग उदारवादी हैं और भारत को भी इनके प्रभाव व शक्ति से लाभ हुआ है. सामाजिक मसलों पर इनकी बहसें पूर्वाग्रहों के विरुद्ध व भविष्योन्मुखी हैं. यह प्रणय रॉय और उनके सानिध्य में तैयार इन प्रतिभाशाली पत्रकारों की ओर से उपहार है. हम अक्सर दर्शक के रूप में समाचार चैनलों के उन्मादी रवैये की शिकायत करते हैं, लेकिन भारत के अधिकतर अंदरूनी मसलों पर इन लोगों का रुख बहुत बढ़िया रहा है और उसका अच्छा असर भी पड़ा है. और इन लोगों ने अक्सर उच्च श्रेणी की समाचार व विश्लेषण सामग्री तैयार की है. यह बात हिंदी चैनल एनडीटीवी इंडिया के बारे में भी सही है, जिसके मालिक प्रणय रॉय हैं. मेरे विचार से, जब यह चैनल शुरू हुआ था, तब यह कई मायनों में अपनी प्रवृत्ति में उदार था.

मुङो राजदीप सरदेसाई और सागरिका घोष की कमी बहुत खलेगी. साथ में, उन लोगों की भी अनुपस्थिति महसूस होगी, जिन्होंने मुकेश अंबानी द्वारा नेटवर्क 18 को खरीदने के बाद वहां से इस्तीफा दे दिया है. मुङो उम्मीद है कि वे एक नया समाचार चैनल प्रारंभ करेंगे, क्योंकि यही उनकी प्रवृत्ति है. और ऐसा होना अच्छा भी है.

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