शिक्षक नियुक्ति में तरह-तरह के पेंच

Published at :05 Jul 2014 12:29 AM (IST)
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शिक्षक नियुक्ति में तरह-तरह के पेंच

शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के बावजूद झारखंड में एक भी प्राथमिक शिक्षक की नियुक्ति न हो पाना दुर्भाग्यपूर्ण है. तय प्रक्रिया और मानदंडों के आधार पर शिक्षकों की नियुक्ति न होना राज्य सरकार की ही विफलता माना जायेगा. राज्य के प्राथमिक व माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षकों की भारी कमी के चलते पढ़ाई की […]

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शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के बावजूद झारखंड में एक भी प्राथमिक शिक्षक की नियुक्ति न हो पाना दुर्भाग्यपूर्ण है. तय प्रक्रिया और मानदंडों के आधार पर शिक्षकों की नियुक्ति न होना राज्य सरकार की ही विफलता माना जायेगा.

राज्य के प्राथमिक व माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षकों की भारी कमी के चलते पढ़ाई की व्यवस्था चरमरा गयी है. बीच-बीच में सरकार शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया शुरू करने की बात करती है, तो उसकी ढुलमुल नीति आड़े आ जाती है. इस अत्यंत जरूरी काम के लिए राज्य ने अगर केंद्र सरकार का शिक्षा का अधिकार कानून लागू होते ही नीतिगत मुकम्मल तैयारी कर ली होती, तो आज ये दिन न देखना पड़ता. शिक्षक नियुक्ति प्रक्रिया में मुश्किल की शुरुआत शिक्षक पात्रता परीक्षा कराने की बाध्यता के साथ ही हो गयी थी. दरअसल हुआ यह कि राज्य सरकार यह समझ ही नहीं पायी थी कि शिक्षक पात्रता परीक्षा के लिए कौन से लोग पात्र होंगे. फिर भी किसी तरह परीक्षा ले ली गयी. करीब एक साल गुजर जाने के बाद जब नतीजा आया, तो शिक्षक नियुक्ति की बजाय स्थानीयता का पेंच फंसा दिया गया.

अब स्थिति यह है कि पात्रता परीक्षा पास करने के बाद भी अभ्यर्थी नियुक्ति के लिए भटक रहे हैं. इस चक्कर में कुछ लोग अदालत तक पहुंच गये. अनेक अभ्यर्थी ऐसे हैं जिनका परीक्षा परिणाम अब तक घोषित नहीं हुआ है. कारण है उनके आवेदनों में त्रुटियां. अदालत ने हालांकि सरकार को ऐसी मामूली त्रुटियों को नजरंदाज करने की हिदायत दी है. बावजूद इसके परीक्षा लेनेवाली झारखंड एकेडमिक कौंसिल संबंधित अभ्यर्थियों का परिणाम तक जारी नहीं कर सकी है. यही नहीं झारखंड में अभी 4,401 उर्दू शिक्षकों के पद रिक्त हैं.

और शिक्षक पात्रता परीक्षा में पास हुए हैं मात्र 815 अभ्यर्थी. इस तरह अगर शत-प्रतिशत नियुक्ति भी जाती है, तो राज्य 3586 उर्दू शिक्षकों के पद खाली रह जायेंगे. ये हाल है एक उर्दू शिक्षकों का. बाकी का अंदाजा लगाया जा सकता है. यह झारखंड की विडंबना नहीं तो और क्या है. राज्य सरकार इस दिशा में तुरंत पहल करे, तो भी इस समस्या का समाधान निकलता नहीं दिख रहा है. राज्य में कुछ महीनों में विधानसभा चुनाव होने हैं. नयी सरकार जब तक पहल करेगी, सत्र बीत चुका होगा.

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