महाराष्ट्र की बदलती सियासी तसवीर

Updated at : 03 Jul 2014 4:09 AM (IST)
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महाराष्ट्र की बदलती सियासी तसवीर

।। आकार पटेल ।। वरिष्ठ पत्रकार अगले तीन महीनों में, जब महाराष्ट्र में विधानसभा के लिए मतदान होंगे, स्थितियों में कोई उल्लेखनीय बदलाव होने की संभावनाएं नहीं हैं. केंद्र में कांग्रेस की सरकार नहीं है, लेकिन उसके विरुद्ध जनता की नाराजगी अभी भी बरकरार है. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मुखिया और वरिष्ठ राजनेता शरद पवार […]

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।। आकार पटेल ।।

वरिष्ठ पत्रकार

अगले तीन महीनों में, जब महाराष्ट्र में विधानसभा के लिए मतदान होंगे, स्थितियों में कोई उल्लेखनीय बदलाव होने की संभावनाएं नहीं हैं. केंद्र में कांग्रेस की सरकार नहीं है, लेकिन उसके विरुद्ध जनता की नाराजगी अभी भी बरकरार है.

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मुखिया और वरिष्ठ राजनेता शरद पवार ने कभी एक साक्षात्कार में कहा था कि महाराष्ट्र एक ‘कांग्रेसी मानसवाला राज्य’ है. उनका तात्पर्य यह भी था कि महाराष्ट्र का निवासी अपने मिजाज से ही धर्मनिरपेक्ष विचारधारा का मतदाता है और हिंदुत्व के प्रति उसका बहुत आकर्षण नहीं है. क्या सचमुच ऐसा है?

अगर हम इतिहास की ओर देखें, तो यह सही है कि इस राज्य पर कांग्रेस का वर्चस्व रहा है. महाराष्ट्र में अब तक हुए सत्रह मुख्यमंत्रियों में सिर्फ दो ही मुख्यमंत्री कांग्रेस पार्टी के अलावा किसी अन्य दल से हुए हैं. अगर बतौर मुख्यमंत्री 1978 के शरद पवार के पहले कार्यकाल को जोड़ लें, तो गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों की संख्या कुल तीन तक पहुंचती है. कांग्रेस पार्टी महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव में सिर्फ एक बार ही पराजित हुई है. 1995 में शिव सेना-भारतीय जनता पार्टी का गठबंधन सत्तारुढ़ हुआ था और यह सरकार पांच वर्षो के अपने कार्यकाल के पूरा होने तक चली थी.

इस वर्ष होनेवाले चुनाव में क्या होने की संभावना है, जब महाराष्ट्र अपनी तेरहवीं विधानसभा का निर्वाचन करेगा? हाल ही में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और उसके सहयोगी दल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को उनके इतिहास की सबसे खराब हार का सामना करना पड़ा है. राज्य के कुल 48 निर्वाचन क्षेत्रों में से कांग्रेस मात्र दो सीटें हासिल कर सकी, जबकि उसकी सहयोगी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को मात्र चार सीटें ही जीत मिल सकी. उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश के बाद महाराष्ट्र में सबसे अधिक लोकसभा की सीटें हैं.

अगर लोकसभा के चुनाव में पड़े मतों के आधार पर विधानसभा चुनाव के परिणाम का आकलन करें, तो भारतीय जनता पार्टी और शिव सेना गठबंधन कुल 288 सीटों में से 220 सीटें जीतने की स्थिति में है.

क्या इस तरह का परिणाम भारत के बड़े राज्यों में कांग्रेस को सबसे अधिक समर्थन करनेवाले राज्य में हो सकता है? आइये, इस संबंध में स्थानीय कारकों पर नजर डालें. महाराष्ट्र में अभी सबसे बड़ा मसला राज्य सरकार के विरुद्ध जनता की नाराजगी है. कुछ वैसी समस्याएं, जिनसे संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) ग्रस्त थी, राज्य की कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस सरकार को भी बीमार कर चुकी हैं.

भ्रष्टाचार, खासकर राज्य की राजधानी मुंबई के रियल इस्टेट क्षेत्र में, इस कदर हावी था कि भवन-निर्माताओं द्वारा बड़े पैमाने पर दिये जानेवाले विज्ञापनों से लाभान्वित होनेवाले मीडिया भी ऐसे मामलों को अनदेखा नहीं कर सका. आदर्श हाउसिंग जैसे घोटाले, जो स्थानीय मसले थे, राष्ट्रीय सुर्खियां बन गये.

कुछ हद तक यह समझ का फेर था. इंस्टीट्यूट ऑफ कंपटीटिवनेस ने वर्ष 2013 के एक रिपोर्ट में महाराष्ट्र को भारत के सबसे अधिक नवोन्मेषोन्मुखी अर्थव्यवस्था की संज्ञा दी गयी थी. इस रिपोर्ट में उसका स्थान गुजरात से आगे था. वर्ष 2013 के सितंबर महीने में द हिंदू अखबार में छपे एक अन्य रिपोर्ट में गुजरात से कहीं अधिक महाराष्ट्र के विकास की सराहना की गयी थी. इस रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र (तकरीबन बारह लाख करोड़ रुपये) और गुजरात (तकरीबन छह लाख करोड़ रुपये) मिला कर देश के सकल घरेलू उत्पादन का बीस फीसदी हिस्सा हैं. महाराष्ट्र में प्रति व्यक्ति आय 95,339 रुपये थी, जबकि यह आय गुजरात में 89,668 रुपये थी.

इन दो राज्यों में तेजी से हो रहे विकास का कारण प्राकृतिक संसाधन और लोगों की उद्यमशीलता का योग है. भारत का अधिकांश आयात और निर्यात इन दो राज्यों में स्थित बंदरगाहों से ही किया जाता है.

इस आधार पर कहा जा सकता है कि महाराष्ट्र पूरी तरह से कुप्रबंधन का शिकार नहीं था, बल्कि कांग्रेस ने लोगों तक पहुंचनेवाली छवि का प्रबंधन समुचित ढंग से नहीं किया.

कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के बीच, कांग्रेस के विभिन्न मराठा गुटों के बीच, और राष्ट्रवादी कांग्रेस के नेताओं के बीच लगातार चलनेवाले क्षुद्र तनावों ने सत्ताधारी गठबंधन के लिए परिस्थितियां बद से बदतर कर दीं. दूसरी तरफ, चचेरे ठाकरे भाईयों के अलग-अलग हो जाने से मुंबई के मराठी मतों का विभाजन हो गया, लेकिन इससे लोकसभा चुनाव में शिव सेना कोई बहुत नुकसान नहीं हुआ. यह विधानसभा चुनाव में अधिक नुकसानदेह साबित होगा, जैसा कि पहले के स्थानीय चुनावों में देखने को मिला था, जिनमें राज ठाकरे ने उम्दा प्रदर्शन करते हुए लगभग बीस फीसदी मत प्राप्त किये थे.

लेकिन अगले तीन महीनों में, जब महाराष्ट्र में विधानसभा के लिए मतदान होंगे, स्थितियों में कोई उल्लेखनीय बदलाव होने की संभावनाएं नहीं हैं. केंद्र में कांग्रेस की सरकार नहीं है, लेकिन उसके विरुद्ध जनता की नाराजगी अभी भी बरकरार है.

इस बीच, सत्ता संभालने के बाद नरेंद्र मोदी ने कोई भी बड़ी गलती नहीं की है और वे अभी भी हनीमून के दौर से गुजर रहे हैं. इस दौर के कम-से-कम अभी कुछ और महीने जारी रहने की उम्मीद है.

नरेंद्र मोदी एक जोरदार चुनाव प्रचारक हैं और शहरी निर्वाचन क्षेत्रों में बड़ा असर डाल सकते हैं, खासकर मुंबई में जहां गुजरातियों की बड़ी जनसंख्या है. गोपीनाथ मुंडे के निधन से भारतीय जनता पार्टी को नुकसान तो होगा, लेकिन यह कोई बड़ा नुकसान नहीं होगा.

भारतीय जनता पार्टी और शिव सेना गठबंधन में एक बड़ा विवाद मुख्यमंत्री पद को लेकर है. अब तक तय फॉर्मुले के अनुसार राज्य में इस गठबंधन की ओर से शिव सेना का मुख्यमंत्री पद पर दावा है. हालांकि नरेंद्र मोदी की अपने पार्टी पर पूरी पकड़ है और उनके और उद्धव ठाकरे के लिए किसी समाधान तक पहुंचना आसान होगा.

इस बात का आकलन लगा पाना मुश्किल है कि कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी संभावित हार से कैसे बच सकेंगे. भारतीय जनता पार्टी और शिव सेना के लिए महाराष्ट्र में दो-तिहाई बहुमत के साथ ऐतिहासिक जीत हासिल करना संभव ही नहीं, निश्चित भी है.

और कांग्रेस, जिसने स्वतंत्रता के बाद राज्य में तकरीबन लगातार शासन किया है, स्वयं को महाराष्ट्र विधानसभा में उसी स्थिति में पा सकती है, जो दुर्दशा उसकी लोकसभा में आज है. शरद पवार ने जो बात महाराष्ट्र के बारे में कही थी, वह बात बीते हुए समय के लिए सही हो सकती है, लेकिन यह स्थिति अब बदल जायेगी, कम-से-कम आगामी चुनाव में तो निश्चित रूप से ही.

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