‘पवित्र क्षेत्रों’ की सियासत

Updated at : 03 Jul 2014 3:54 AM (IST)
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‘पवित्र क्षेत्रों’ की सियासत

।। सुभाष गाताडे ।। सामाजिक कार्यकर्ता क्षेत्र विशेष की पवित्रता की दुहाई देते हुए अल्पसंख्यकों को उनके सांस्कृतिक, मानवीय अधिकारों से वंचित करने की घटनाओं का सिलसिला दक्षिण एशिया के इस हिस्से में ही जोर पकड़ता दिख रहा है. आगामी दिनों में क्या मांसाहारी पदार्थ बेचना-बनाना गुजरात में ‘समाजविरोधी’ गतिविधि में शुमार किया जायेगा? जैन […]

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।। सुभाष गाताडे ।।

सामाजिक कार्यकर्ता

क्षेत्र विशेष की पवित्रता की दुहाई देते हुए अल्पसंख्यकों को उनके सांस्कृतिक, मानवीय अधिकारों से वंचित करने की घटनाओं का सिलसिला दक्षिण एशिया के इस हिस्से में ही जोर पकड़ता दिख रहा है.

आगामी दिनों में क्या मांसाहारी पदार्थ बेचना-बनाना गुजरात में ‘समाजविरोधी’ गतिविधि में शुमार किया जायेगा? जैन लोगों के लिए पवित्र कहे जानेवाले नगर पलिटाना को शाकाहारी घोषित करने की अपनी मांग को लेकर भूख हड़ताल कर रहे जैन साधुओं की यही मांग थी. भूख हड़ताल के चौथे दिन गुजरात सरकार के कॉटेज उद्योग के राज्यमंत्री ताराचंद छेड़ा से मुलाकात के बाद उन्होंने हड़ताल वापस ली है. उधर मंत्री महोदय ने ऐलान किया है कि पलिटाना को, ‘शाकाहारी क्षेत्र’ घोषित करने का निर्णय लिया गया है.

एक लाख आबादी वाले इस नगर की 25 फीसदी आबादी मुसलिम है. स्थानीय सरकारी अधिकारी बताते हैं कि नगर की 40 फीसदी आबादी मांसाहारी है, जिसमें कुछ हिंदू भी हैं. कुछ समय पहले गुजरात की पलिटाना म्युनिसिपल कमेटी ने जैन धार्मिक नेताओं के दबाव में आकर यह प्रस्ताव पारित किया कि म्युनिसिपालिटी की सीमा के भीतर मांस और अन्य गैरशाकाहारी भोजन- जिनमें अंडे भी शामिल किये गये हैं- के बिक्रय पर रोक लगायी जायेगी. यह निर्णय जैनियों के राजनीतिक दबाव के तहत लिया गया, जो राज्य में काफी प्रभावशाली माने जाते हैं और सत्ताधारी पार्टी को भरपूर चंदा देते हैं.

ऐसे में अल्पसंख्यकों का डर वाजिब है कि उन्हें बकरीद जैसे त्योहार पर भी कुर्बानी जैसे धार्मिक कर्तव्य की अनुमति नहीं होगी.

पिछले साल आंध्र प्रदेश की तिरूमला पहाड़ियों की तलहटी में थोंडावडा के पास तिरूपति मंदिर से तेरह किमी दूर मुसलिम महिलाओं के लिए बन रही ‘हीरा इंटरनेशनल इस्लामिक युनिवर्सिटी’ के मद्देनजर हिंदू साधुओं के एक हिस्से ने क्षेत्र की पवित्रता की दुहाई देते हुए इस निर्माणाधीन संस्थान को वहां से हटाने की मांग की थी. ‘सात पहाड़ियों की पवित्रता की रक्षा’ के नाम पर ‘तिरूमला तिरूपति पवित्रता संरक्षण वेदिके’ नाम से एक साझा मंच के बैनर तले हिंदु गजर्ना नामक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था.

विशाखापटनम स्थित सारदा पीठम के किन्हीं स्वरूपानंदेंद्र सरस्वती ने ऐलान किया था कि इस निर्माण को हटाने के लिए वह ‘श्रीवरी दांडू’ अर्थात् ईश्वर की सेना बनायेंगे. गौरतलब है कि क्षेत्र विशेष की पवित्रता की दुहाई देते हुए अल्पसंख्यकों को उनके सांस्कृतिक, मानवीय अधिकारों से वंचित करने की घटनाओं का सिलसिला दक्षिण एशिया के इस हिस्से में ही जोर पकड़ता दिख रहा है.

देश में तमिलों के आत्मनिर्णय के अधिकार को कुचलने के लिए ‘युद्घ अपराधों’ के विवादों में घिरे श्रीलंका में डंबुल्ला नामक स्थान पर बनी मसजिद एवं मंदिर को ‘पवित्र बौद्घ भूमि’ का हवाला देते हुए हटा दिया गया था. जिन दिनों पंजाब में अतिवादी सिख नेता भिंडरावाले की गतिविधियों ने जोर पकड़ा था, उन दिनों उनकी तरफ से भी मांसाहारी चीजों को लेकर ‘आचार संहिता’ लागू करवाने की बात की जा रही थी. मध्य प्रदेश में जब उमा भारती मुख्यमंत्री बनी थीं, तब अमरकंटक तथा अन्य ‘धार्मिक नगरों में’ मांस-मछली-अंडे की बिक्री-सेवन पर पाबंदी लगा दी गयी थी. तब प्रश्न उठा था कि किस तरह से न केवल गैरहिंदुओं, बल्कि हिंदु धर्म को माननेवालों के बहुविध दायरे पर अल्पमत वर्ण हिंदुओं का एजेंडा लादा जा रहा है. सभी जानते हैं कि हिंदुओं का बेहद छोटा-सा अल्पमत पूर्णत: शाकाहारी है और व्यापक बहुमत मांसाहारी है.

यदि देश में कहीं भी पलिटाना या आंध्र प्रदेश मॉडल को लागू किया जायेगा, तो आप पायेंगे कि उसी तर्क के आधार पर कहीं अल्पमत में रहनेवाले हिंदुओं के लिए, कहीं अल्पमत में रहनेवाले सिखों के लिए या ईसाइयों या अन्य धर्मावलंबियों के लिए संविधानप्रदत्त अपनी आस्था के अधिकार पर अमल करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है. वैसे बहुसंख्यकवाद को हवा देने में महज सांप्रदायिक संगठन ही आगे नहीं हैं, कई बार सेक्युलर संगठन भी अपने वोट बैंक के लिए ऐसे कदम उठाते हैं. पूर्व मुख्यमंत्री वाइएस राजशेखर रेड्डी के नेतृत्व में आंध्र प्रदेश सराकर ने तिरूमला-तिरूपति और राज्य के 19 अन्य चर्चित मंदिरों वाले नगरों में गैरहिंदू आस्थाओं के प्रचार-प्रसार पर पाबंदी लगाने के लिए अध्यादेश 3 और उससे संबधित दो सरकारी आदेश जारी किये थे.

श्रीलंका के डंबुल्ला के हमले को लेकर तीस से अधिक सामाजिक संगठनों एवं दो सौ से अधिक बुद्घिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं का एक साझा बयान प्रकाशित हुआ था, जिसमें स्थिति को गंभीरता को देखते हुए हस्तक्षेप करने की सरकार से अपील की गयी थी. तो क्या इस बात की उम्मीद की जा सकती है कि श्रीलंका की तर्ज पर भारत के सैकड़ों-हजारों बुद्घिजीवी एवं सामाजिक कार्यकर्ता भारतीय समाज, जीवन एवं राजनीति में बहुसंख्यकवाद के बढ़ते वर्चस्व के खिलाफ एवं बढ़ती असहिष्णुता के विरोध में इसी तरह न केवल आवाज बुलंद करेंगे, बल्कि निरंतर सचेत रहेंगे?

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