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जब जॉर्ज साहब को पहली बार देखा

Updated at : 31 Jan 2019 1:20 AM (IST)
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जब जॉर्ज साहब को पहली बार देखा

रामविलास पासवान लोजपा प्रमुख व केंद्रीय मंत्री delhi@prabhatkhabar.in मैंने जॉर्ज फर्नांडिस, जिन्हें हमलोग प्यार से ‘जॉर्ज साहब’ के नाम से पुकारते हैं, को पहली बार 1960 में देखा था. उस समय मैं पीडब्ल्यू हायर स्कूल, खगड़िया में 11वीं में पढ़ता था. जॉर्ज साहब स्कूल में अन्य स्थानीय नेताओं के साथ आये थे. मैंने उसके पहले […]

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रामविलास पासवान
लोजपा प्रमुख व केंद्रीय मंत्री
delhi@prabhatkhabar.in
मैंने जॉर्ज फर्नांडिस, जिन्हें हमलोग प्यार से ‘जॉर्ज साहब’ के नाम से पुकारते हैं, को पहली बार 1960 में देखा था. उस समय मैं पीडब्ल्यू हायर स्कूल, खगड़िया में 11वीं में पढ़ता था. जॉर्ज साहब स्कूल में अन्य स्थानीय नेताओं के साथ आये थे. मैंने उसके पहले सिर्फ उनका नाम सुना था.
खगड़िया में काफी समाजवादी नेता थे. मैं उनको देखकर और उनकी बातों को सुनकर काफी प्रभावित हुआ. स्थानीय समाजवादी नेताओं द्वारा उनके ओजस्वी भाषण के बारे में सुना करता था. साल 1969 में मैं पहली बार विधायक बना.
उसी साल जार्ज साहब से पटना में मेरी मुलाकात हुई. जार्ज साहब उस समय संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (संसोपा) के शीर्षस्थ नेताओं में थे. डॉ लोहिया, राजनारायण, मधु लिमये और कर्पूरी ठाकुर के व्यक्तित्व ने मुझे काफी प्रभावित किया. तब इनमें से किसी से भी मैं कभी नहीं मिला था. समाज के कमजोर वर्गों के प्रति इनकी प्रतिबद्धता से प्रभावित था.
‘संसोपा ने बांधी गांठ, पिछड़ा पावे सौ में साठ’ के नारे ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया. विधानसभा चुनाव में चूंकि मैं दल के लिए नया था. इसलिए लिमये जी को छोड़कर किसी नेता का कार्यक्रम मेरे विधानसभा क्षेत्र में नहीं लगा. उनका कार्यक्रम शायद इसलिए लगा कि लोकसभा में वे मुंगेर से 1967 में चुनाव जीते थे. खगड़िया तब मुंगेर जिले में था.
विधानसभा चुनाव जीतने के बाद बिहार में जहां कहीं भी जॉर्ज साहब का भाषण होता, मैं जरूर जाता था़ लोग जॉर्ज साहब के इतने दीवाने थे कि मीलों चलकर उनका भाषण सुनने जाते थे.
मैं गृहविहीनों को घर दिलाने एवं बाढ़ पीड़ितों की राहत के लिए हमेशा संघर्ष करता था. इस दौरान मैं जेल भी गया. जॉर्ज साहब इससे काफी प्रभावित थे. साल 1970 में संसोपा ने भूमि मुक्ति आंदोलन का नारा दिया और 9 अगस्त से जेल भरो आंदोलन का निर्णय लिया. मैंने अपने दल के साथियों को बुलाकर बैठक की. मेरे विधानसभा क्षेत्र में पचैला चौर था.
उस चौर में हजारों एकड़ सरकारी जमीन थी, जिसे वहां के जमींदार ने कब्जे में कर रखा था. उस जमींदार के लड़के कामेश्वर सिंह ने 1967 में संसोपा से खगड़िया लोकसभा का चुनाव जीता था. पार्टी ने फैसला लिया कि सांसद को जमीन को मुक्त करने को कहा जाये और गरीबों के बीच जमीन नहीं बांटेंगे, तो उस पर गरीबों को ले जाकर कब्जा करेंगे. मुझे खुशी हुई कि सांसद परिवार के सुरेंद्र सिंह और सैकड़ों समाजवादी कार्यकर्ताओं ने संघर्ष का बिगुल बजाने का निर्णय लिया.
नौ अगस्त, 1970 को हम सबने पचैला चौर की जमीन पर हजारों गरीबों के साथ हमला बोल दिया़ एक तरफ जमींदारों की फौज और दूसरी ओर मेरे साथ गरीबों की सेना थी. दोनों आमने-सामने हो गयी. हमलोगों के साथ निहत्थे-गरीब और दूसरी ओर हथियार व बंदूक से लैस जमींदार के गुर्गे थे. पहले उन लोगों ने लाठी, तीर और हथियार से हमला किया, उसके बाद भी गरीब जब आगे बढ़ते गये, तो बंदूक से फायर करना शुरू कर दिया. मेरे साथ में चल रहा एक मजदूर गोली का शिकार हुआ.
फिर भी हम नहीं माने. शाम हो गयी थी. निर्णय हुआ कि फिर कल सबेरे और जमीन पर कब्जा करेंगे. रात में हम कुछ लोग सुरेंद्र सिंह के यहां सो रहे थे कि सबेरे करीब तीन बजे पुलिस आयी और हमलोगों को गिरफ्तार कर भागलपुर कैंप भेज दिया गया. हमारे खिलाफ अटेम्प्ट टू मर्डर सहित बहुत सारी गंभीर धाराएं लगायी गयीं.
पार्टी का निर्णय था कि कोई गिरफ्तारी के बाद बेल नहीं लेगा. जॉर्ज साहब को जब पता चला, तो वे खगड़िया आये. उस समय खगड़िया के विधायक भी संसोपा के थे. विधायक, सांसद व अधिकारी सबकी आपस में सांठ-गांठ थी. जॉर्ज साहब गुस्से से लाल हो गये, तुरंत प्रेस को बुलाया और घटना की निंदा की. घोषणा की कि अगले चुनाव में सांसद कामेश्वर सिंह को संसोपा से टिकट नहीं दिया जायेगा. अगले चुनाव (1971) में हमने कामेश्वर सिंह की जगह शिवशंकर यादव को टिकट दिया. वे चुनाव जीत गये.
जॉर्ज साहब ने मुझे संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का प्रदेश का संयुक्त सचिव नियुक्त किया था. साल 1970 में पुणे में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का राष्ट्रीय अधिवेशन था.
अधिवेशन समाप्त कर 31 दिसंबर को हम बंबई आये. बंबई में उस दिन टैक्सी की हड़ताल थी. जॉर्ज साहब टैक्सी यूनियन के नेता थे. हमलोगों को थोड़ा दूर जाना था. हमने एक टैक्सी वाले से चलने को कहा. टैक्सी वाले ने जवाब दिया- आप लोगों को मालूम नहीं है कि आज टैक्सी हड़ताल है और जॉर्ज साहब बंबई में है. जब हमने बताया कि हम जॉर्ज साहब की पार्टी के हैं और अधिवेशन का बैच दिखाया, तब वह खुश हो गया और बिना किराया लिये ही हमें गंतव्य तक पहुंचाया़
साल 1975 में इमरजेंसी के दौरान जॉर्ज साहब का जो आपातकाल के खिलाफ शस्त्रक्रांति थी, उस समय हम जैसे नौजवानों को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की याद दिलाती थी. कभी-कभी सोचता हूं कि यदि इमरजेंसी कायम रहती, तो जॉर्ज साहब का क्या होता. साल 1982 में लोकदल-क (कर्पूरी ठाकुर) और लोकदल-च (चौधरी चरण सिंह) अलग हुए, तो लोकदल-क के साथ लोकसभा के 11 सांसद थे. जॉर्ज साहब ने मुझे लोकसभा में लोकदल-क का नेता बनाया. उसी साल मैं पहली बार लंदन जा रहा था. जॉर्ज साहब से मिलने उनके निवास स्थान पर गया और बताया कि मैं लंदन जा रहा हूं.
यह सुनकर उन्होंने मुझे 500 डाॅलर दिये और लंदन में प्रो हार्जर, स्वराज लांबा सहित तीन लोगों के नाम और टेलीफोन नंबर दिये. मेरे लिए यह उस समय बड़ी बात थी. मुझे आश्चर्य हुआ कि लंदन पहुंचने के पहले ही जॉर्ज साहब ने प्रो हार्जर और स्वराज लांबा को फोन पर सूचित कर दिया था. मैं अकेला था, लेकिन मुझे जरा भी महसूस नहीं हुआ कि मैं विदेश में हूं. मुझे आश्चर्य हुआ कि जितनी पैठ उनकी देश में थी, उतनी ही विदेश में भी थी. जब मैं जर्मनी गया, तो वहां के लोगों का भी नंबर उन्होंने दिया. सभी समाजवादी विचारधारा से प्रभावित थे.
जॉर्ज साहब ने मुझे जितना प्यार दिया, उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है. मैंने उनको कभी प्लेन में बिजनेस क्लास में बैठते नहीं देखा. वे हमेशा सबसे पीछे की सीट पर बैठते थे. अपने निवास स्थान का गेट हटवा रखा था.
एक बार मैंने टीवी पर आ रही किसी खबर के बारे में उनसे कहा, तो उन्होंने कहा कि रामविलास, मैं कभी टीवी नहीं देखता हूं. अब मुझे विश्वास नहीं हो रहा है कि जॉर्ज साहब हमारे बीच नहीं हैं. जॉर्ज साहब हमेशा मेरे लिए प्रेरणा के स्रोत रहेंगे.
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