हिंदी सहित इंगलिश अपनाइए

Updated at : 24 Jun 2014 4:43 AM (IST)
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हिंदी सहित इंगलिश अपनाइए

।। डॉ भरत झुनझुनवाला ।। अर्थशास्त्री नरेंद्र मोदी को इंगलिश को पकड़ कर आम आदमी की आर्थिक उन्नति और अपनी संस्कृति के विस्तार का अस्त्र बनाना चाहिए, जैसा कि गांधीजी ने अंगरेजों द्वारा स्थापित कांग्रेस को अंगरेजों से ही लोहा लेने का अस्त्र बना लिया था. अटल बिहारी वाजपेयी अंगरेजी बोलने वाली हस्तियों से अंगरेजी […]

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।। डॉ भरत झुनझुनवाला ।।

अर्थशास्त्री

नरेंद्र मोदी को इंगलिश को पकड़ कर आम आदमी की आर्थिक उन्नति और अपनी संस्कृति के विस्तार का अस्त्र बनाना चाहिए, जैसा कि गांधीजी ने अंगरेजों द्वारा स्थापित कांग्रेस को अंगरेजों से ही लोहा लेने का अस्त्र बना लिया था.

अटल बिहारी वाजपेयी अंगरेजी बोलने वाली हस्तियों से अंगरेजी में बात करते थे और शेष से हिंदी में. मोदी ने सभी से हिंदी में बात करने का मन बनाया है. उनका यह कदम भारतीय संस्कृति के प्रति आस्था को दर्शाता है, परंतु अंगरेजी बोलने वाली विदेशी हस्ती से अंगरेजी में बात करने से सामंजस्य बनेगा. वार्ता का मूल उद्देश्य मुद्दे पर विजय हासिल करना है. जैसे इंगलैंड के प्रधानमंत्री से डब्ल्यूटीओ पर वार्ता में हिंदी में बात करके हारने की तुलना में अंगरेजी में बात करके जीतना श्रेष्ठ दिखता है. इसी क्रम में आपने केंद्र सरकार के कर्मचारियों को हिंदी में कार्य करने का आदेश जारी किया है. यहां भी हिंदी में पत्र लिख कर कर्नाटक में उसे पुन: अंगरेजी में अनुवाद करने की तुलना में अंगरेजी में पत्र लिखना श्रेष्ठ दिखता है.

लेकिन अंगरेजी के इतिहास को हम झुठला नहीं सकते हैं. यह भाषा ब्रिटिश राज से हमारी पराजय को दर्शाती है. यह देश के संभ्रांत वर्ग का चिह्न् है. ऊपरी तबके के लोग इस भाषा का अधिक उपयोग करते हैं. पब्लिक स्कूलों के बच्चे आपस में इंगलिश में ज्यादा और हिंदी अथवा मराठी में कम बोलते हैं. परिणामस्वरूप अंगरेजी में लिये जाने वाले इम्तिहानों में संभ्रांत वर्ग के बच्चे ज्यादा सफल होते हैं.

यह समस्या संपूर्ण विश्व में व्याप्त है. हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू के वेबपेज पर एक लेख में कहा गया है कि इंगलिश को अपनाने पर लोगों को झटका लगता है. उनका आत्मविश्वास जाता रहता है. काम्पीटेंट व्यक्ति पीछे रह जाते हैं. इस परिप्रेक्ष्य में मुलायम सिंह द्वारा संसद में इंगलिश पर प्रतिबंध की मांग को समझना चाहिए. वे उन करोड़ों के दर्द को बयान कर रहे हैं, जो इंगलिश के आतंक से पीड़ित हैं.

इस समस्या का दूसरा पहलू यह है कि इंगलिश और आर्थिक विकास का सीधा संबंध दिखायी देता है. हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू के एक अन्य लेख में बताया गया है कि इंगलिश के उपयोग एवं औसत आय में भी संबंध है. जैसे, रूस में इंगलिश का उपयोग 50 प्रतिशत है. इनकी प्रति व्यक्ति औसत आय 20,000 डॉलर प्रति व्यक्ति है. सिंगापुर में इंगलिश का उपयोग 60 प्रतिशत और आय 60,000 डालर प्रति व्यक्ति है.

निष्कर्ष यह है कि इंगलिश के उपयोग के बढ़ने के साथ-साथ आय बढ़ती है. वैश्विक स्तर पर इंगलिश जानने वाले आवेदकों को 30 से 50 प्रतिशत अधिक वेतन मिलते हैं. अत: आर्थिक प्रगति के लिए इंगलिश को अपनाना जरूरी दिखता है. दूसरे अनुभवों से भी यही प्रमाणित होता है. जापानी कंपनी राकूटेन ने अपने सभी कार्य इंगलिश में करने का निर्णय लिया है. कंपनी के मुखिया हिरोशी मिकीटानी के अनुसार, इंगलिश अपनाने से वे वैश्विक स्तर पर टैलेंटेड कर्मियों को आकर्षित करने में कामयाब हुए हैं.

स्विस कंपनी नेस्ले ने पाया कि इंगलिश अपनाने के बाद माल की खरीद सस्ती हुई है. जर्मनी की होस्ट एवं फ्रांस को रोन पोलेंक के विलय के बाद बनी एकीकृत कंपनी ने इंगलिश अपनाया है. इंगलिश अपनाने के विरोध में मुख्य तर्क सांस्कृतिक विविधिता का है. ब्रिटेन एवं अमेरिका द्वारा व्यक्तिवाद एवं भोगवाद की संस्कृति को प्रतिपादित किया गया है. इंगलिश भी इन्हीं मूल्यों का प्रतीक बन गयी है. लेकिन इंगलिश का यह चरित्र अनिवार्य नहीं है.

वास्तव में संस्कृति द्वारा भाषा का उल्लंघन किया जा सकता है. जैसे सिंधु घाटी सभ्यता की संस्कृति को लें. सिंधु घाटी की भाषा पहले ब्रrी, फिर संस्कृत और इसके बाद हिंदी में परिवर्तित हुई है. संस्कृति बनी रही, भाषाएं बदलती रहीं. इसी प्रकार पश्चिमी मूल्यों की जड़ें मूलत: लातिन में व्यक्त हुई थीं. आज इन्हीं मूल्यों को इंगलिश में व्यक्त किया जा रहा है. इंगलिश का उपयोग अपनी स्वदेशी संस्कृति को व्यक्त करने में भी किया जा रहा है.

मैंने ऋग्वेद का अध्ययन ग्रिफिथ के अंगरेजी अनुवाद से किया है. संस्कृति की दृष्टि से भी इंगलिश को अपनाना लाभप्रद हो सकता है. अपनी संस्कृति को इंगलिश के प्लेटफार्म पर व्यक्त करने से हमारी संस्कृति का वैश्वीकरण हो सकता है. जैसे परमहंस योगानंद अथवा प्रभुपाद की अंगरेजी किताबों के माध्यम से हुआ है.

मेरी समझ से इंगलिश का विकल्प नहीं है. हमें अपनी संस्कृति को इंगलिश में व्यक्त करने का प्रोग्राम हाथ में लेना चाहिए. अपने धार्मिक ग्रंथों और देशी भाषाओं के काव्यों का इंगलिश में अनुवाद करना चाहिए. हमें इंगलिश और तमिल जैसी घरेलू भाषाओं का विलय कर हिंगलिश व टिंगलिश बनानी चाहिए. हमें दो भाषाओं का फामरूला प्राथमिक विद्यालयों से ही लागू करना चाहिए. नरेंद्र मोदी को इंगलिश को पकड़ कर आम आदमी की आर्थिक उन्नति और अपनी संस्कृति के विस्तार का अस्त्र बनाना चाहिए, जैसाकि गांधीजी ने अंगरेजों द्वारा स्थापित कागं्रेस को अंगरेजों से ही लोहा लेने का अस्त्र बना लिया था.

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