लौट आओ! अब लौट भी आओ तुम

Updated at : 24 Jun 2014 4:36 AM (IST)
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लौट आओ! अब लौट भी आओ तुम

।। शैलेश कुमार ।। प्रभात खबर, पटना आज की सुबह कुछ अलग थी. उठने के साथ ही एक अलग सी शांति का अहसास हुआ. लगा जैसे बहुत दूर चला गया है मेरा मन. कहां, यह मुङो नहीं मालूम. आज न ऑफिस के लिए जल्दी तैयार होने की चिंता और न ट्रैफिक जाम का डर. न […]

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।। शैलेश कुमार ।।

प्रभात खबर, पटना

आज की सुबह कुछ अलग थी. उठने के साथ ही एक अलग सी शांति का अहसास हुआ. लगा जैसे बहुत दूर चला गया है मेरा मन. कहां, यह मुङो नहीं मालूम. आज न ऑफिस के लिए जल्दी तैयार होने की चिंता और न ट्रैफिक जाम का डर. न तो जिम्मेवारियों की फिक्र थी और न ही किसी परिणाम की चिंता. मन अपनी ही किसी दुनिया में पहुंच चुका था.

हमारी दुनिया से बहुत दूर. वहां इस मन को न कोई टोकनेवाला था और न ही रोकनेवाला. वह बस उड़ान भरे जा रहा था. कभी नदियों की बहती धारा के साथ सुर में सुर मिला कर गीत गाता, तो कभी हवाओं की गोद में सवार हो जाता. कभी आसमान में उड़ते पंक्षियों के साथ दौड़ लगाता, तो कभी झरने से गिरते पानी के नीचे बैठ उसकी ताजगी और ठंडक को महसूस करता. कभी पहाड़ों पर गिरती बर्फ पर फिसल खुशी से ठहाके लगाता, तो कभी सागर की लहरों पर सवार हो कर समुंदर में गोते लगाने का आनंद लेता. आज न तो यह किसी से बात करना चाहता था और न ही किसी की सुनना चाहता था. आज तो बस अपनी मरजी का मालिक था.

मन का अचानक रोजाना की दौड़-भाग की जिंदगी से अचानक इतनी दूर पहुंच जाना अनायास न था. शांति की तलाश में इतनी दूर निकल जाना बस यूं ही नहीं था. यह इसलिए था कि रंग-बिरंगी दुनिया मन को अब काली नजर आने लगी. रोजाना महिला हेल्पलाइन और आयोग में आनेवाले मामलों को देख वह सिहर उठा था. कभी दिल्ली, तो कभी मुंबई, तो कभी बदायूं में महिलाओं की आ-ब-रू पर हुए हमलों से यह हिल उठा था. पाकिस्तान, अफगानिस्तान, इराक, सीरिया और सूडान में हो रही हिंसा को देख यह सिसकियां भरने लगा. उत्तर बिहार में मासूम बच्चों पर इन्सेफ्लाइिटस के कहर ने इसे झकझोर कर रख दिया. शिक्षक नियोजन वाले प्रतिभागियों का दर्द सुन कर इसका दिल भर आया.

शहर के धुएं में खांस-खांस कर बेचारा परेशान हो गया. पीएमसीएच पहुंचा, तो न बेड नसीब हुआ और न इलाज. उलटा मरीजों को तड़पता देख, खुद का दर्द और बढ़ गया. मन बेचारा परेशान. करे, तो क्या करे? जाये, तो कहां जाये? इसलिए आज सुबह-सुबह ही मुङो बिना बताये निकल पड़ा एक ऐसी यात्र पर, जिसकी मंजिल न मुङो मालूम है और न ही शायद उसे. उसे तो बस उस दुनिया से कुछ दिनों तक दूर रहना है, जो अपनी पहचान भूल चुकी है. जो चल तो रही है, लेकिन रास्ता भूल चुकी है. जहां सच खुद को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है और झूठ उसकी इस हालत पर ठहाके लगा रहा है. बेचारा मन, इतना मर्माहत हो चुका है कि कभी इस दुनिया में वापस नहीं लौटना चाहता. पर, मुङो उसे समझा कर वापस लाना ही होगा. अहसास दिलाना होगा उसे कि हमें लड़ना है. लड़ना है, हर उस ताकत से जिसने हमारी दुनिया की शांति छीन ली है. लौट आओ मेरे मन, इस दुनिया को फिर रहने लायक बनाना है. लौट आओ, अब लौट भी आओ तुम.

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