गरीबों के हक में
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 11 Jul 2018 12:05 AM
महंगी चिकित्सा सुविधा देनेवाले निजी अस्पतालों की मनमानी पर अंकुश लगाते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने एक सराहनीय फैसला दिया है.अब दिल्ली के सभी निजी अस्पतालों को गरीब मरीजों की नि:शुल्क चिकित्सा करनी होगी, अन्यथा उनका लाइसेंस खारिज कर दिया जायेगा. अदालत की खास हिदायत वैसे निजी अस्पतालों को है, जो जनसेवा के नाम पर सरकार […]
महंगी चिकित्सा सुविधा देनेवाले निजी अस्पतालों की मनमानी पर अंकुश लगाते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने एक सराहनीय फैसला दिया है.अब दिल्ली के सभी निजी अस्पतालों को गरीब मरीजों की नि:शुल्क चिकित्सा करनी होगी, अन्यथा उनका लाइसेंस खारिज कर दिया जायेगा. अदालत की खास हिदायत वैसे निजी अस्पतालों को है, जो जनसेवा के नाम पर सरकार से जमीन आदि में विशेष छूट हासिल करते हैं.
नियम यह है कि सरकार से छूट का लाभ लेनेवाले निजी अस्पतालों को परामर्श और सामान्य उपचार (ओपीडी) में कुल मरीजों में कम-से-कम 25 फीसदी गरीबों से कोई शुल्क नहीं लिया जाना चाहिए. भर्ती मरीजों के मामले में यह संख्या न्यूनतम 10 फीसदी रखी गयी है.
लेकिन, निजी अस्पताल किसी बहाने से इस नियम का लगातार उल्लंघन करते रहे हैं. देश में चिकित्सा व्यवस्था की मौजूदा स्थिति के मद्देनजर यह निर्णय बहुत महत्वपूर्ण है.
यह विडंबना ही है कि सालाना 17 फीसदी की औसत से बढ़नेवाला स्वास्थ्य क्षेत्र आम नागरिक की सहज पहुंच से लगातार दूर होता जा रहा है. इलाज पर होनेवाले कुल खर्चे में सरकारी खजाने का हिस्सा महज 25 फीसदी है, बाकी का बोझ लोगों की जेब पर है. नतीजतन सालाना 10 लाख भारतीय साधनों के अभाव में उपचार नहीं करा पाते और उनकी मौत हो जाती है.
इलाज का खर्च हर साल करीब साढ़े पांच करोड़ लोगों को गरीब बना देता है. निजी अस्पतालों में गरीबों के मुफ्त इलाज की हिदायत करता बड़ी अदालत का फैसला सिद्धांत रूप में इस बात की स्वीकृति है कि निजी निवेशकों को जनसेवा के लिए अगर रियायत हासिल होती है, तो उन्हें यह इंतजाम करना चाहिए कि गरीब को भी सुविधाओं का फायदा मिल सके.
बात सिर्फ निजी अस्पतालों पर ही नहीं, निजी स्कूलों पर भी लागू होती है. शिक्षा के अधिकार कानून में निजी स्कूलों को अपनी 25 फीसदी सीटों पर कमजोर तबके के बच्चों का दाखिला देने का निर्देश है.
लेकिन, बाल अधिकारों के राष्ट्रीय आयोग की एक हालिया रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि दिल्ली में बीते दो सालों से वंचित तबके के लिए आरक्षित सीटों में से सात फीसदी पर या तो दाखिला नहीं लिया गया या फिर उन सीटों पर सामान्य श्रेणी के बच्चों का नामांकन हुआ. रियायती दर पर संसाधन हासिल करनेवाले दिल्ली के निजी स्कूलों में शिक्षा को मुनाफे के धंधे में तब्दील करने का आलम यह है कि हाल में सरकार को हस्तक्षेप करते हुए 575 स्कूलों से वसूला गया अतिरिक्त शुल्क वापस करने का आदेश देना पड़ा.
उम्मीद है कि अदालती फैसले के बाद ऐसे रवैये बदलेंगे और गरीबों को उनका अधिकार मिल सकेगा. हर वर्ग के लिए समान अवसर मुहैया कराने के लोकतांत्रिक वादे को पूरा करने के लिए यह जरूरी है कि सरकारी अमला कायदे-कानूनों को सख्ती से लागू कराये. ऐसा राजधानी दिल्ली में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में सुनिश्चित करना होगा.
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