असली मित्र की पहचान

Updated at : 13 Jun 2018 7:07 AM (IST)
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असली मित्र की पहचान

क्षमा शर्मा वरिष्ठ पत्रकार पिछले दिनों की बात है. एक परिचित घर आये. उनके बेटे का बारहवीं का रिजल्ट आया था. बच्चे ने मेहनत की होगी, मगर उसके इतने अंक नहीं आ पाये थे कि दिल्ली के किसी काॅलेज में दाखिला मिल सके. बातों ही बातों में वह अपने एक मित्र का नाम लेने लगे, […]

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क्षमा शर्मा

वरिष्ठ पत्रकार

पिछले दिनों की बात है. एक परिचित घर आये. उनके बेटे का बारहवीं का रिजल्ट आया था. बच्चे ने मेहनत की होगी, मगर उसके इतने अंक नहीं आ पाये थे कि दिल्ली के किसी काॅलेज में दाखिला मिल सके.

बातों ही बातों में वह अपने एक मित्र का नाम लेने लगे, जो एक काॅलेज में प्रिंसिपल हैं. ये दोनों अभिन्न मित्र हैं. उनका एक-दूसरे के घर आना-जाना, खाना-पीना, घूमना-फिरना है.

वह बताने लगे कि माना कि उनके बच्चे के नंबर कम आये हैं, मगर साहब देख लिया कि जब जरूरत पड़ती है, तो कोई मदद नहीं करता. यहां तक कि मेरे प्रिंसिपल मित्र ने भी दोनों हाथ खड़े कर दिये कि वह कुछ नहीं कर सकता. ऐसे हाथ झाड़ने से तो काम चलता नहीं है. अरे दोस्त हो, तो जैसे भी हो मदद करो. लेकिन वह कहता है कि मजबूर है.

उलटे मुझे कानून का पाठ पढ़ाने लगा कि किन बच्चों को दाखिला मिल सकता है और किन्हें नहीं. अरे कानून का पाठ पढ़ना होता, तो किसी प्रिंसिपल के पास न जाकर वकील के पास जाता.

जब वह देर तक इस तरह की बातें करने लगे तो मैंने कहा- लेकिन आजकल जब सब कुछ पारदर्शी है, एक-एक सीट के लिए मारामारी है, तो ज्यादा नंबर वालों के मुकाबले कम नंबर वाले को कोई मित्र भी कैसे दाखिला दिला सकता है.

इतना कहना था कि वह और भी नाराज हो गये. कहने लगे- ऐसा है कि राजा हरिश्चंद्र का जमाना गुजरे तो बहुत साल हो गये. और गांधीगिरी भी मजबूरी का नामभर है. वैसे भी काम न करना हो, तो सब ईमानदारी का पाठ ही पढ़ाते हैं, वरना जिसे करना होता है, वह रास्ते निकालता ही है.

मैंने पूछा- किसी नियम को तोड़कर भी? कैसे?

वह बोले- अजी नियम गया तेल लेने. नियम जो बनाते हैं न, वे ही उसे तोड़ने का रास्ता भी बताते हैं. सब सीटों पर ज्यादा नंबर वाले बैठ जायेंगे, तो कम नंबर वाले कहां जायेंगे. क्या उन्हें पढ़ने और आगे बढ़ने का अधिकार ही नहीं है?

मैंने कहा- किसी और जगह भी पढ़ाया जा सकता है.

वह बोले- बहुत अच्छा! घर हमारा यहां, परिवार यहां, दिल्ली के रहनेवाले हम और हमारे सामने ही बाहर के लोग यहां पढ़ें और हमारे बच्चे बाहर की ठोकरें खायें, यह कहां का न्याय है? और फिर बाहर क्या मुफ्त में पढ़ाई होती है? पढ़ाई का खर्चा क्या नियम बनानेवाले देंगे?

उनकी बात सुनकर निरुत्तर हो गयी. इस बात में दम था कि हर बच्चे को पढ़ना और बढ़ना चाहिए. मगर उनके बच्चे को दाखिला नहीं मिल रहा है, तो किसी और को भी न मिले, यह बात गले से नहीं उतरी. फिर असली मित्र वही है, जो मित्र का भला करने के लिए बेईमानी करे, नियम तोड़े, तभी वह सच्चा मित्र कहलायेगा, यह परिभाषा भी समझ में नहीं आयी. मगर इन दिनों यही चलन है कि जैसे भी हो अपना काम हो.बाद में पता चला कि उन्होंने अपने मित्र से सारे संबंध तोड़ लिये और मिलना-जुलना सब खत्म हो गया.

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