ब्रिक्स के बढ़ते कदम

अगले महीने ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) देशों की सालाना बैठक दक्षिण अफ्रीका के जोहांसबर्ग में होनेवाली है. इस लिहाज से विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का दक्षिण अफ्रीका दौरा और वहां ब्रिक्स के विदेश मंत्रियों की मुलाकात अहम है. दुनिया की सबसे तेज रफ्तार वाली अर्थव्यवस्था के इन देशों के आपसी सहयोग […]
अगले महीने ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) देशों की सालाना बैठक दक्षिण अफ्रीका के जोहांसबर्ग में होनेवाली है. इस लिहाज से विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का दक्षिण अफ्रीका दौरा और वहां ब्रिक्स के विदेश मंत्रियों की मुलाकात अहम है.
दुनिया की सबसे तेज रफ्तार वाली अर्थव्यवस्था के इन देशों के आपसी सहयोग का मंच ब्रिक्स अब लगभग एक दशक पूरा करने जा रहा है. दुनिया की 40 फीसदी आबादी इन पांच देशों में रहती है. सेवा और सामानों के वैश्विक उत्पादन में ब्रिक्स देशों का हिस्सा 20 फीसदी है. इन देशों ने 2009 के बाद से अब तक वैश्विक आर्थिक वृद्धि में तकरीबन 50 फीसदी का योगदान किया है.
व्यापार, निवेश तथा क्षेत्रीय सहयोग के एक मंच के रूप में ब्रिक्स की अहमियत का अंदाजा इन तथ्यों से लगाया जा सकता है. जाहिर है, दुनिया से गरीबी और उसके अलग-अलग स्वरूपों- अशिक्षा, कुपोषण, भुखमरी आदि- को 2030 तक समाप्त करने का सहस्राब्दि विकास लक्ष्य हो या फिर वैश्विक तापमान में चिंताजनक बढ़ोतरी की स्थितियों को देखते हुए जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर अंकुश लगाने के लिए वैश्विक बिरादरी को स्वीकार किसी व्यापक समझौते को अमल में लाने की- ब्रिक्स देशों की महत्वपूर्ण भूमिका की अनदेखी नहीं की जा सकती है.
वैश्वीकरण के दौर में दुनिया पारस्परिक निर्भरता से संचालित हो रही है और फिलहाल अंतरराष्ट्रीय शक्ति-समीकरणों पर असर डालनेवाला मुल्कों का कोई भी मंच खुद को पूर्ण नहीं मान सकता है. यूरोपीय संघ को ही लीजिए. इस संघ में शामिल देशों की अर्थव्यवस्था एक हद तक ठहराव की शिकार है.
वहां रोजगार के नये अवसरों का सृजन अपेक्षित गति से नहीं हो पा रहा है और यूरोपीय कंपनियों को दक्षिण-पूर्व एशिया की कंपनियों से तगड़ी चुनौती मिल रही है. यूरोपीय संघ के देशों के लिए ब्रिक्स में शामिल मुल्क वित्तीय संकट से उबरने में मददगार साबित हो सकते हैं और साझेदारी के नये उद्यम कायम करने की दिशा में बेहतर मौके मुहैया करा सकते हैं.
जानकारों का मानना है कि जोहांसबर्ग में होनेवाली ब्रिक्स बैठक इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण साबित हो सकती है. अहम वैश्विक मुद्दों पर भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के बीच त्रिपक्षीय संबंधों को मजबूत करने का एक मंच इब्सा (आइबीएसए) है. इसके विदेश मंत्रियों की एक बैठक भी सुषमा स्वराज की अगुवाई में हो रही है.
एक ऐसे समय में जब यूरोप अपनी आंतरिक चुनौतियों का सामना कर रहा है, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की संरक्षणवादी और अनिश्चित विदेश नीति से ट्रेड वाॅर, आर्थिक प्रतिबंधों एवं बहुपक्षीय समझौतों पर संकट की स्थितियां हैं तथा मध्य-पूर्व और अफ्रीका के अनेक इलाकों में राजनीतिक अस्थिरता और हिंसा का माहौल है, ब्रिक्स देश आपसी सहयोग और अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में संतुलित हस्तक्षेप से वैश्विक राजनीति और आर्थिकी को एक नयी दिशा दे सकते हैं.
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