बहू आयी है, नेग देना है

Updated at : 04 May 2018 1:30 AM (IST)
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बहू आयी है, नेग देना है

II मिथिलेश कु. राय II युवा रचनाकार पाठशाला से लौटा. माई मेरी ही प्रतीक्षा कर रही थी. बोली कि कुछ पैसे दे दो- कम-से-कम 51 रुपये. पैसे देते हुए मैंने पूछा कि क्या करोगी, तो बोली कि जीवन की बहू आयी है. सब देखने जा रही हैं. मुंह-दिखाई के लिए. ओह नेग! मैं जब तक […]

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II मिथिलेश कु. राय II
युवा रचनाकार
पाठशाला से लौटा. माई मेरी ही प्रतीक्षा कर रही थी. बोली कि कुछ पैसे दे दो- कम-से-कम 51 रुपये. पैसे देते हुए मैंने पूछा कि क्या करोगी, तो बोली कि जीवन की बहू आयी है. सब देखने जा रही हैं. मुंह-दिखाई के लिए. ओह नेग! मैं जब तक समझता, तब तक पैसे लेकर माई काकी के साथ निकल चुकी थी.
कल रात जीवन की बहू आयी है. अब चार दिनों तक इस टोले से उस टोले तक की सारी स्त्रियां टोली बनाकर उसे देखने जाती रहेंगी. नयी बहू के पास इन चार दिनों तक चलनेवाली मुंह दिखाई की रस्म के दौरान नेग के रूप में कुछ जमा-पूंजी भी जमा हो जायेगी.
चौथे दिन जो एक छोटे से भोज का आयोजन किया जायेगा, संभव है कि बहू के पास जमा पैसे भी उसमें होम हो जायें. नहीं भी हो सकता है. लेकिन बहू अपने साथ नइहर से क्या-क्या लायी है, यह चर्चा स्त्रियों से होते-होते पुरुषों तक और अंतत: गांव के बच्चे-बच्चे तक फैल जायेगी.
समाज मे ज्यादातर रस्म को देखने पर लगता है कि अब इसका वजूद दिखावे का लेवल मेंटेन करने के लिए ही बच गया है. लड़का-लड़की की शादी और उसके बाद विदाई की ही रस्म देखिये, बात समझ में आ जायेगी.
आज भी ज्यादातर घरों में शादी के बाद नयी लड़की कदम रखती है, तो उसे देखने जानेवाले उसके साथ आये सामानों को गौर से देखते हैं. सामानों की मात्रा ठीक-ठाक हुई तो समाज हर्षित, न हुई तो वहीं नाक-भौंह सिकोड़ लेते हैं कि ये दिया तो क्या दिया. वो देता तो बात बनती. परिवार वाले शिक्षित न हुए तो देखने आनेवाले के हाव-भाव को देखकर ही मायूस हो जाते हैं और घर में पधारे नये मेहमान के प्रति कई बार द्वेष भाव से भी भर जाते हैं.
बहू के साथ आये सामानों को देखने में लोगों की जितनी दिलचस्पी होती है, उससे कम रुचि घरवालों को यह दिखाने में नहीं होती है कि देखिये, हमारी बहू अपने साथ क्या-क्या लेकर आयी है.
विदाई में आये सारे सामानों को घरवाले पसार कर एक मेला जैसा दृश्य बना देते हैं. लोग आते-जाते हैं और उनकी निगाह सामानों पर पड़ती जाती है. गजब का रिवाज है. लोग सामान देखते हैं और प्रत्यक्ष में ‘बहुत दिया-बहुत दिया’ की चर्चा करके बाहर निकलते ही ‘क्या-क्या नहीं दिया’ विषय पर बात शुरू कर देते हैं.
बात यहीं तक सीमित नहीं रहती है. बेटी की शादी के दिन या उससे पहले से पिता को विदाई में दी जानेवाली चीजों की फिक्र होती है. वे एक-एक सामानों की जुगत करते-करते एक ट्रक सामानों का इंतजाम करते हैं.
भारत में अब भी ज्यादातर घर में बेटी की जन्म की खबर पर अगर मन मायूस हो जाता है, तो इसके बहुत से कारण हैं. बेटियों के साथ लेन-देन का मामला दिखावटी समाज में दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है और अब तो जटिल हुआ जा रहा है. शादी से पहले लड़के वालों की मांग की लंबी लिस्ट को ही दुल्हन के साथ आये सामानों के प्रदर्शन में मिलान किया जाता है कि क्या दिया और क्या छूट गया, जिसके लिए बाद में उलाहने दिये जा सकते हैं.
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