सच समझ लेने का समय

Updated at : 28 Mar 2018 7:18 AM (IST)
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सच समझ लेने का समय

II पवन के वर्मा II लेखक एवं पूर्व प्रशासक pavankvarma1953@gmail.com साधारणतः ऐसा समझा जाता है कि राजनेताओं का हाथ जनता की नब्ज पर होता है, पर संसद में उनके द्वारा स्वयं का तमाशा बनाये जाने के मामले में तो वे जनता की भावनाओं से पूरी तरह अनजान ही लगते हैं. सरल तथ्य यह है कि […]

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II पवन के वर्मा II
लेखक एवं पूर्व प्रशासक
pavankvarma1953@gmail.com
साधारणतः ऐसा समझा जाता है कि राजनेताओं का हाथ जनता की नब्ज पर होता है, पर संसद में उनके द्वारा स्वयं का तमाशा बनाये जाने के मामले में तो वे जनता की भावनाओं से पूरी तरह अनजान ही लगते हैं. सरल तथ्य यह है कि भारत के लोग अब अपनी संसद तथा कुछ राज्यों की विधानसभाओं में अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों के शोर-शराबे, वहशत, उपद्रवबाजी और बुरे व्यवहार से बिल्कुल ऊब चले हैं.
संसद के चालू सत्र में एक भी दिन काम नहीं हो सका है. उसकी बैठक आरंभ होने के कुछ मिनटों के अंदर ही सांसद नारे लगाने, तख्तियां दिखाने, अपशब्द कहने और आसन (वेल) के समक्ष पहुंचकर उन्हें बैठक स्थगित कर देने को बाध्य करने में लग जाते हैं. कुछ मौकों पर जरूर दूसरी बार बैठक आहूत करने की कोशिशें हुई हैं, पर अब तो लोकसभा और राज्यसभा की ज्यादातर बैठकें पूरे दिन के लिए स्थगित कर दी जाती हैं. अगले दिन भी एक बार फिर वही कहानी दोहरायी जाती है. वहीं दूसरी ओर देखें, तो अपने पूरे इतिहास में ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स की बैठक एक भी दिन स्थगित नहीं हुई है. ऐसा ही चलता रहा, तो जल्दी ही हम भी गर्व से यह कह सकेंगे कि ऐसा एक भी दिन नहीं, जब हमारी संसद की बैठक स्थगित न हुई हो.
क्या ऐसे व्यवहार से विरोध व्यक्त करती सियासी पार्टियों अथवा सांसदों का उद्देश्य पूरा होता है? मैं समझता हूं कि ऐसा नहीं होता. एक समय था कि संसद की बैठक का इस तरह स्थगित हो जाना समाचार का मुद्दा बन जाया करता था. पर अब ऐसा नहीं होता. क्योंकि अब ऐसी वारदातें इतनी नियमितता से होने लगी हैं कि उनकी कोई खबरिया कीमत ही नहीं रह गयी. सच यह है कि यदि विरोध व्यक्त करते सांसद अपने मुद्दों पर चर्चा होने देते और अपनी बात तार्किक ढंग से रखते, तो मीडिया के माध्यम से पूरा देश उनकी बातें सुनता और उस पर कोई मत स्थिर कर पाता.
इस निंदनीय स्थिति की जिम्मेदारी तय करने से कोई लाभ नहीं होनेवाला. इस हमाम में सभी पार्टियां नंगी हैं. जब यूपीए सरकार गद्दी पर थी, तब वह इसका दोष भाजपा पर मढ़ती थी. इसमें कोई असत्यता भी नहीं. भाजपा ने अपनी संसदीय अनुशासनहीनता को एक आदर्शवादी रंग देने की भी कोशिश की थी. तब राज्यसभा तथा लोकसभा में विपक्ष के नेता क्रमशः अरुण जेटली एवं सुषमा स्वराज ने इस पर जोर दिया था कि सदन की कार्यवाही में व्यवधान पैदा करना संसदीय रणनीति का एक वैध हिस्सा है.
पर अब टोपी दूसरों के सिर है. तब का विपक्ष अब सत्ता में है, जबकि तब के सत्ताधारी अपनी मित्र पार्टियों के साथ आज विपक्ष में हैं. इसलिए विपक्षी भाजपा के साथ आज वही कर रहे हैं, जो इसने तब उनके साथ किया था. एक दुष्चक्र के हिस्से की तरह वही गरिमाहीन खेल फिर खेला जा रहा है और राष्ट्र के साथ सारा विश्व दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र की हरकतें हैरत से देख रहा है.
इसका समाधान क्या है? यह तो सच है कि संसद की कार्यवाही चलाने की प्राथमिक जिम्मेदारी सत्तापक्ष की है. उसे चाहिए कि वह सदन, सदन के बाहर तथा इस हेतु सृजित संसद के विभिन्न मंचों पर विपक्ष के साथ सम्मान का व्यवहार करे. यहां संसदीय कार्य मंत्री की भूमिका अत्यंत अहम हो उठती है.
यूपीए के वक्त राजीव शुक्ल इस पद पर थे और तब सदन के नेता प्रणब मुखर्जी उनसे यह कहा करते थे कि उनके प्रदर्शन का मूल्यांकन इस आधार पर किया जायेगा कि वे विपक्ष के साथ संपर्क साधते एवं प्रतिरोध घटाते हुए विपक्षी कतारों के बीच कितना वक्त बिताते हैं. अब यह जिम्मेदारी भाजपा नेताओं की है, पर इसका निर्वाह अहंकार और अवहेलना के साथ नहीं किया जा सकता. इसके साथ ही, विपक्ष भी यह नहीं कह सकता कि वह दोषहीन है. यदि विपक्ष सदन को चलने नहीं देने पर ही आमादा हो, तो सत्तापक्ष कुछ भी नहीं कर सकता.
क्या राज्यसभा के सभापति तथा लोकसभा अध्यक्ष अनुशासन का पालन करा सकते हैं? वे अवश्य ही ऐसा करा सकते हैं. इन सदनों के संचालकों को इस हेतु व्यापक अनुशासनिक शक्तियां प्राप्त हैं. वे यह तय किया करते हैं कि कोई सदस्य कब बोलेंगे, कितनी देर तक बोलेंगे एवं सदन की कार्यवाही में क्या दर्ज नहीं होगा. वे किसी सदस्य को एक नियत अवधि तक सदन से बाहर रहने का निर्देश भी दे सकते हैं.
वे अपने आदेशों के उल्लंघन करनेवाले सदस्यों के नाम ले सकते हैं, ऐसे सदस्यों को चेतावनी दे सकते हैं और उनकी सदस्यता निलंबित भी कर सकते हैं. सदन के मार्शल उनके अधीन होते हैं और सदन के अंदर ऐसे मामलों में उनकी व्यवस्थाओं को चुनौती नहीं दी जा सकती. ऐसी शक्तियों से संपन्न होते हुए भी क्यों वे सदन के सुचारु संचालन में उनका इस्तेमाल नहीं करते? अब सांसदों द्वारा खुल्लम-खुल्ला अस्वीकार्य व्यवहार बहुत लंबे वक्त तक सहन किये जा चुके हैं और पिछले कुछ वर्षों के दौरान सदन के संचालकों द्वारा प्रदर्शित दृढ़ता की कमी ने निश्चित रूप से संसदीय अराजकता की यह स्थिति उत्पन्न करने में अपना योगदान किया है.
बुनियादी बात यह है कि संसद का नहीं चल पाना हर हाल में रुकना ही चाहिए. संसद को चलाने में प्रति मिनट 2.5 लाख से भी अधिक रुपये खर्च होते हैं. संसद का वर्तमान सत्र 23 दिनों का ही है. सामान्य नागरिकों का जीवन प्रभावित करनेवाले अहम विधेयक विचाराधीन पड़े हैं. इस प्रस्ताव में दम तो जरूर है कि यदि संसदीय आचार की कमी से संसद नहीं चलती, तो सदस्यों को उस दिन के भत्ते नहीं मिलने चाहिए और सदन के संचालकों को इस नियम का पक्षपातरहित ढंग से क्रियान्वयन करना चाहिए.
राष्ट्र अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों से उच्चतम कोटि की वैसी ही तार्किक चर्चा की अपेक्षा रखता है, जैसी अतीत में हुआ करती थी. विपक्ष को अपनी दृष्टि का औचित्य गरिमा तथा तथ्यों के साथ सिद्ध करना चाहिए तथा सत्तापक्ष की प्रतिक्रिया भी वैसी ही होनी चाहिए. दो टूक कहा जाये, तो भारत की जनता संसद में यह अनुचित बरताव बहुत झेल चुकी. अब वह समय आ गया है कि सभी राजनीतिक पार्टियां यह संदेश समय से स्वीकार कर लें.
(अनुवाद: विजय नंदन)
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