संकट में पर्यावरण

हालांकि पर्यावरण के बदतर होने की समस्या विश्वव्यापी है, पर अनेक देश हैं, जहां इसकी गंभीरता भयावह रूप लेती जा रही है. भारत भी उनमें से एक है. पिछले महीने जारी वैश्विक पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक में भारत आखिरी पांच देशों में शामिल है और वह दो साल में 36 पायदान नीचे आया है. ग्रीनपीस के […]
हालांकि पर्यावरण के बदतर होने की समस्या विश्वव्यापी है, पर अनेक देश हैं, जहां इसकी गंभीरता भयावह रूप लेती जा रही है. भारत भी उनमें से एक है. पिछले महीने जारी वैश्विक पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक में भारत आखिरी पांच देशों में शामिल है और वह दो साल में 36 पायदान नीचे आया है. ग्रीनपीस के एक हालिया अध्ययन में पाया गया है कि स्वच्छ वायु के मामले में 280 भारतीय शहरों में एक भी विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानदंडों पर खरा नहीं उतर सका है.
दुनिया के 20 सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में से 13 हमारे देश में हैं. पिछले साल अक्तूबर में प्रकाशित लांसेट के शोध में जानकारी दी गयी थी कि 2015 में 25 लाख लोगों को प्रदूषणजनित बीमारियों के चलते अपनी जान गंवानी पड़ी थी. नदियों में प्रदूषण तथा वन क्षेत्र का घटते जाने की समस्या भी लंबे समय से मौजूद है. विकास और शहरीकरण के कारण पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव स्वाभाविक है, किंतु पर्यावरण को संरक्षित करने और प्रदूषण को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी को ठीक से नहीं निभाने से वर्तमान और भविष्य के लिए गंभीर मुश्किलें खड़ी हो रही हैं.
जहां शहरी इलाकों में हवा-पानी के खराब होने से स्वास्थ्य संकट पैदा हो रहा है, वहीं जीवन-यापन के लिए प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर लोग दिक्कतों का सामना कर रहे हैं. जानकारों की मानें, तो 2014 से 2017 के बीच 36 हजार हेक्टेयर से अधिक वन क्षेत्र को खनन, सड़क निर्माण, उद्योग जैसे उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल में लाया गया है.
उल्लेखनीय है कि बांधों के मामले में हिमालय जल्दी ही दुनिया का सबसे अधिक घनत्व का क्षेत्र बन जायेगा. ऐसे में स्वाभाविक तौर पर सामाजिक और कानूनी विवाद, पलायन और असमान विषय जैसी दिक्कतें भी बढ़ती जा रही हैं. हालांकि, सरकार ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जलवायु परिवर्तन और वैश्विक गर्मी की चुनौती का सामना करने के साथ पर्यावरण बचाने के लिए अपनी प्रतिबद्धता को बार-बार दोहराया है. समय-समय पर राज्य सरकारों ने भी पहलें की हैं.
लेकिन, एक तो इन कोशिशों के सकारात्मक परिणाम नहीं दिख रहे हैं और दूसरे सरकार की जल-मार्ग बनाने या बंजर जमीनों को सुधारने जैसी अनेक कोशिशों पर उठे सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं मिल रहा है. एक परेशानी की बात यह भी है कि कुछ लोग, जिनमें अनेक नीति नियामक भी हैं, पर्यावरण को लेकर चिंता को विकास की राह में बाधक मानते हैं, जबकि जरूरत इस बात की है कि एक ऐसी समझ बनायी जाये, जो विकास की जरूरतों और संसाधनों के अंधाधुंध दोहन के बीच संतुलन बना सके.
यदि हमने नदियों, भूजल, जंगलों, पहाड़ों जैसे प्राकृतिक देनों को सहेज कर नहीं रखा और उनका ठीक से उपयोग नहीं किया, तो समृद्धि और विकास के लक्ष्यों को भी ठीक से पाना संभव नहीं होगा. सरकार, उद्योग जगत और समाज को पर्यावरण के मौजूदा संकट पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है.
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