भारत गणराज्य प्राइवेट लिमिटेड!

Updated at : 26 Jan 2018 6:50 AM (IST)
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भारत गणराज्य प्राइवेट लिमिटेड!

सुरेश कांत वरिष्ठ व्यंग्यकार भारत गणराज्य प्राइवेट लिमिटेड वह संगठन है, जिसका स्वामित्व प्रोपराइटरों के एक सेट से दूसरे सेट के हाथों में जाता रहता है. इसका कार्य एक सीमित कार्यकाल के लिए चुने जानेवाले निदेशकों द्वारा संचालित होता है, हालांकि एक बार चुन लिये जाने पर वे आसानी से कुर्सी खाली नहीं करते. फिर […]

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सुरेश कांत

वरिष्ठ व्यंग्यकार

भारत गणराज्य प्राइवेट लिमिटेड वह संगठन है, जिसका स्वामित्व प्रोपराइटरों के एक सेट से दूसरे सेट के हाथों में जाता रहता है. इसका कार्य एक सीमित कार्यकाल के लिए चुने जानेवाले निदेशकों द्वारा संचालित होता है, हालांकि एक बार चुन लिये जाने पर वे आसानी से कुर्सी खाली नहीं करते.

फिर भी, अगर उन्हें कुर्सी खाली करनी पड़ जाये, तो वे यह सुनिश्चित कर लेते हैं कि नियंत्रण फिर भी उन्हीं के हाथों में रहे. ऐसा वे अपने बेटे-बेटी, बहू-दामाद, भाई-भतीजे को अधिष्ठित करके करते हैं. यदि उनका कोई नजदीकी रिश्तेदार न हो, तो दूर के रिश्तेदार, यार-दोस्त और उनके परिवार नामांकित किये जाते हैं. ऐसे आदमी गंवार, यहां तक कि मूढ़ या अपराधी भी हों, जो होते ही हैं, तब तो कहना ही क्या!

अगर हम भारत गणराज्य प्राइवेट लिमिटेड उर्फ बीजीपीएल की 1947 में एक पब्लिक लिमिटेड कंपनी के रूप में स्थापना और फिर 26 जनवरी, 1950 को एक एमओयू के जरिये स्वामित्व में रूपांतरण के समय से उसके निदेशकों की सूची पर नजर डालें, तो पायेंगे कि उनमें से ज्यादातर कई-कई वर्षों तक पद पर काबिज रहे हैं. इस प्रवृत्ति के लिए उन्हें दोष भी नहीं दिया जा सकता, क्योंकि निदेशक के रूप में चुने जाने के लिए उन्होंने करोड़ों रुपये खर्च किये-करवाये होते हैं और उन्हें वह राशि हुक से या क्रुक से, यानी किसी भी तरह वसूल करनी-करवानी ही होती है.

चुने जाने की प्रक्रिया में उन्होंने अनेक शत्रु भी बनाये होते हैं, अत: जिंदा रहने के लिए उन्हें बीजीपीएल के बलों- एसपीओ, ब्लैक कैट्स, पुलिस आदि- की सुरक्षा की जरूरत होती है. अगर बीजीपीएल के किसी निदेशक पर भ्रष्टाचार का आरोप लगता है, तो उसका गिरोह, जिसे तकनीकी भाषा में ‘राजनीतिक दल’ कहा जाता है, ऐसे व्यक्ति का तो निदेशक के लिए नामांकन नहीं करता (नामांकनों को आजकल ‘टिकट देना’ कहा जाता है), लेकिन उसकी पत्नी या बच्चों को जरूर ‘टिकट दे देता’ है.

बीजीपीएल में गरीब रिश्तेदार यानी जनता कभी सपने में भी निदेशक बनने की नहीं सोच सकती. उसका काम बस, निदेशकों के हर अच्छे-बुरे काम का, बुरे को भी अच्छा ही समझकर, समर्थन करना है.

कोई सवाल पूछना तक उसके अख्तियार में नहीं होता है. निदेशकों ने पिछले सत्तर सालों में यह भी सुनिश्चित किया है कि गरीब जनता एक वक्त का खाना जुटाने का अपना शौक पूरा करने में ही मगन रहे और कुछ और सोचने की जरूरत महसूस न करे.

निदेशक जब निदेशक बने ही होते हैं, तो प्राय: दरिद्रनारायण होते हैं. पर जल्दी ही उनके पास आलीशान कोठी-बंगले, वातानुकूलित कारें और मोटा बैंक-बैलेंस आ जाता है. तब नारायण भी उनके सामने दरिद्र लगने लगता है. रोज रात को सोने से पहले वे ‘प्रार्थना’ करते हुए कहते हैं कि ‘हे नारायण, कुछ चाहिए हो तो बताना.’ वे अपने इस लक्ष्य में सफल रहते हैं कि गरीब जनता उनकी इस उन्नति पर गर्व अनुभव कर सके और उनकी उन्नति को ही अपना विकास समझे.

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