भारत की गौरवगाथा

Updated at : 24 Nov 2017 5:25 AM (IST)
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भारत की गौरवगाथा

तरुण विजय पूर्व सांसद, भाजपा दुनिया के सबसे तेज (आवाज की गति से तीनगुनी रफ्तार) और मारक प्रक्षेपास्त्र ‘ब्रह्मोस’ (वजन 2.5 टन) को वायुसेना के सुखोई 30 युद्धक विमान द्वारा सफल परीक्षण अद्भुत विश्व कीर्तिमान ही नहीं बना गया, बल्कि भारत की सैन्य शक्ति का भी जबरदस्त जलवा जमा गया. जो सफलता चीन और अमेरिका […]

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तरुण विजय

पूर्व सांसद, भाजपा

दुनिया के सबसे तेज (आवाज की गति से तीनगुनी रफ्तार) और मारक प्रक्षेपास्त्र ‘ब्रह्मोस’ (वजन 2.5 टन) को वायुसेना के सुखोई 30 युद्धक विमान द्वारा सफल परीक्षण अद्भुत विश्व कीर्तिमान ही नहीं बना गया, बल्कि भारत की सैन्य शक्ति का भी जबरदस्त जलवा जमा गया.

जो सफलता चीन और अमेरिका की वायुसेना को नहीं मिली, वह भारतीय वायुसेना के जांबाज वायु-वीरों ने हासिल कर दिखायी. यह अवसर और भी गौरवशाली हो जाता है, जब हम अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (आइसीजे) में 71 वर्ष के ‘ब्रिटिश राज’ का अंत कर भारत के जस्टिस दलवीर भंडारी की विजय को देखते हैं. एक ही सप्ताह में दो विश्व-कीर्तिमान भारतीय शक्ति-यात्रा के दो महत्वपूर्ण सोपान कहे जायेंगे.

ब्रह्मोस प्रक्षेपास्त्र भारत और रूस के बीच हुए सैन्य-समझौते का परिणाम है- जो पनडुब्बी, नौसेना के युद्धपोतों, युद्धक विमानों अथवा भू-स्थानकों/वाहनों से दागी जा सकती है. ‘ब्रह्मोस’ नाम भी भारत की नदी ब्रह्मपुत्र (जो वास्तव में शास्त्रों में ‘नद’ यानी पुलिंग कहा गया) तथा रूस की मरुस्थल नदी (जिसके नाम पर रूस का शहर मास्को है) के मिलन से बना है.

यह सामान्यत: 290 किलोमीटर दूर तक मार कर सकती है, परंतु युद्धक विमान से दागे जाने पर इसकी प्रहारक-दूरी और ज्यादा बढ़ जाती है. भारत ने सेना के तीनों अंगों के लिए ब्रह्मोस प्रक्षेपास्त्र हेतु 27,510 करोड़ रुपये के आदेश दिये हैं.ब्रह्मोस की सफलता भारतीय वायुसेना के साथ ही रक्षा अनुसंधान और विकास संस्थान के वैज्ञानिकों के अभिनंदन का क्षण है.

बेहद सीमित बजट और कठोर अपेक्षाओं के बीच काम कर रहा यह संस्थान रक्षा क्षेत्र में ‘मेक इन इंडिया’ का अभियान है, जिसने रूस के लिए सुखोई 30 में भारतीय अावश्यकताओं के अनुरूप स्वदेशी तकनीक से आधारभूत परिवर्तन कर ब्रह्मोस प्रक्षेपास्त्र का सफल प्रक्षेपण कर दुनिया के सैन्य-विशेषज्ञों को आश्चर्यचकित कर दिया.

हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स और ब्रह्मोस एयरोस्पेस रक्षा अनुसंधान संस्थान के साथ ब्रह्मोस को सुखोई युद्धक विमानों में जोड़ने का प्रयास जून 2016 से ही कर रहे थे. भूमि तथा नौसैनिक युद्धपोतों से ब्रह्मोस प्रक्षेपास्त्र छोड़ने की अपेक्षा युद्धक विमान से यह कर पाना अत्यंत कठिन एवं अभी तक अभूतपूर्व रहा है. निश्चय ही इस उपलब्धि से जहां भारतीय सेना का मनोबल बढ़ा है, वहीं शत्रुओं को धक्का भी लगा है.

पर हम भारतीय राजनीतिक गालीगलौज और क्षुद्र जीत-हार में इतने डूबे और इतना ज्यादा रस लेते हैं कि भारतीय वैज्ञानिकों एवं वायु-वीरों की अद्भुत असाधारण उपलब्धि भी राष्ट्रीय मतैक्य और पार्टी विभेदों से परे सामूहिक खुशी का मौसम नहीं बनाती दिखती.

यह अवसर भारतीय रक्षा वैज्ञानिकों तथा वायुसेना को हजारों-हजार प्रणाम भेजने का है. स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में इस उपलब्धि पर चर्चाएं और विमर्श आयोजित होने चाहिए.

ब्रह्मोस के साथ जस्टिस दलवीर भंडारी अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में पुन: निर्वाचित होकर इस भारत गौरवगाथा का दूसरा अध्याय रच गये. कल्पना करिये कि जिस अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (आइसीजे) में पिछले 71 सालों से एक भी कालावधि ऐसी न रही हो, जब उसमें ब्रिटिश न्यायाधीश रहे ही न हों, उस स्थिति में भारत ने तमाम विदेशी शक्तियों के गठजोड़ को भेदते हुए जो विजय प्राप्त की, उसकी कोई मिसाल ही नहीं है. इससे यह भी सिद्ध होता है कि अगर सरकार और उसका राजनीतिक नेतृत्व एकजुट टीम के नाते काम करें, तो असंभव सा दिखनेवाला लक्ष्य भी हासिल किया जा सकता है.

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, विदेश सचिव जयशंकर, संयुक्त राष्ट्र में भारतीय प्रतिनिधि सईद अकबरुद्दीन, हेग में भारत के राजदूत वेणू राजामणि सहित समूचा विदेश मंत्रालय और प्रधानमंत्री के निर्देशन में हर संभव उपाय के लिए सक्रिय समूचा साउथ ब्लॉक वह करिश्मा दिखा गया, जिसमें हार के जबड़ों से जीत प्राप्त कर ली. यह केवल जस्टिस दलवीर भंडारी के न्यायप्रिय एवं लोकप्रिय व्यक्तित्व की ही जीत नहीं है, बल्कि दुनिया में लगातार बढ़ रहे भारत के गौरवशाली स्थान का भी सूचक है.

प्रसिद्ध कवि रमानाथ अवस्थी की एक कविता की एक पंक्ति है- ‘कुछ कर गुजरने के लिए मौसम नहीं, मन चाहिए.’ जो मन बना लेते हैं, मोसम को उनके अनुरूप ढलना ही पड़ता है.

जो मौसम के बदलने का इंतजार किया करते हैं, उनके मंसूबे धरे-के-धरे ही रह जाते हैं. यह कोई विधि का संयोग अथवा ईश्वरीय कर्मकांड से निर्देशित उपलब्धियों का पर्व नहीं, बल्कि भारत के बदलते वक्त और बदलते मिजाज का एहसास करानेवाला समय है. मानो तो मानो, न मानो तो अपनी गति को प्राप्त हो जाओ!

इस मौसम में हर हिंदुस्तानी का सीना अपने सैनिकों, वैज्ञानिकों, राजनयिकों, और राजनीतिक नेतृत्व के प्रति अभिमान और अभिनंदन से भर जाना चाहिए. हिंदुस्तान का गौरव बढ़ता है, तो मनोबल किसका घटता है आखिर? उसी का तो घटेगा, जिसकी भारत की प्रगति में कोई रुचि ही नहीं होगी.

अगर विभिन्न दलों और विभिन्न विचारधाराओं के लोग अपने-अपने रास्ते से भारत के विकास की नयी गाथा रचने के लिए सक्रिय हैं, तो वह गाथा कोई भी रचे, उसमें उन्हें समान रूप से खुशी क्यों नहीं होती? परंतु दुर्भाग्य से भारतीय सार्वजनिक जीवन में संवाद और व्यवहार इतना गर्हित स्तर का नहीं रहा, जितना आज दिख रहा है.

कई बार तो यह कहने का मन होता है कि भारत की तकदीर मिट्टी और मेहनत के पसीने में सने किसानों, मजदूरों और चाय वालों ने ही लिखी है, करोड़पति, अरबपति सरमायेदारों ने नहीं. भारत के 95 प्रतिशत सैनिक और वैज्ञानिक आज भी मध्यम और निम्न आय वर्ग से आते हैं, जिनकी मेहनत की खुशबू भारत के माथे का मुकुट और सीने का कवच बनती है.

उनका अपमान भारत का अभिनंदन तो हो नहीं सकता.ब्रह्मोस से लेकर दलवीर भंडारी तक भारत के बढ़ रहे कदम दुनिया की कोई ताकत रोक नहीं सकती. सवा अरब हिंदुस्तानी हजारों रंग और गंधों को समेटे तिरंगे में प्रतिबिंबित एक नयी भारत कथा रच रहा है. यह अवसर तो बस आगे देखने का है, इतिहास के बोझ और गालियों के गंध से लदने का नहीं. इस समय का हमें हृदय से स्वागत करना चाहिए.

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