उत्पीड़न के खिलाफ आवाज

Updated at : 21 Nov 2017 7:04 AM (IST)
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उत्पीड़न के खिलाफ आवाज

आकार पटेल कार्यकारी निदेशक, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया पांच अक्तूबर को न्यूयॉर्क टाइम्स में हॉलीवुड फिल्म निर्माता हार्वे विंसटेन द्वारा किये गये यौन उत्पीड़न के बारे में खबर छपी थी. इस समाचार पत्र ने उन अभिनेत्रियों का हवाला दिया था, जिन्होंने फिल्म उद्योग के सबसे ज्यादा शक्तिशाली लोगों में से एक और ‘द किंग स्पीच’ जैसी […]

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आकार पटेल
कार्यकारी निदेशक, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया
पांच अक्तूबर को न्यूयॉर्क टाइम्स में हॉलीवुड फिल्म निर्माता हार्वे विंसटेन द्वारा किये गये यौन उत्पीड़न के बारे में खबर छपी थी. इस समाचार पत्र ने उन अभिनेत्रियों का हवाला दिया था, जिन्होंने फिल्म उद्योग के सबसे ज्यादा शक्तिशाली लोगों में से एक और ‘द किंग स्पीच’ जैसी ऑस्कर पुरस्कार विजेता फिल्म बनानेवाले विंसटेन द्वारा किये गये दुर्व्यवहार के बारे में बताया था.
इसके बाद कई और महिलाएं सामने आयीं और उन्होंने इस फिल्म निर्माता द्वारा अपने साथ किये गये उत्पीड़न की बात कही (अक्तूबर के अंत तक आरोप लगानेवाली ऐसी महिलाओं की सूची 80 से ऊपर पहुंच चुकी थी), और इसके कुछ दिन बाद ही विंसटेन को उनकी अपनी ही कंपनी के निदेशक मंडल ने बर्खास्त कर दिया. इस घटना के महीने भर बाद ही कई और महिलाएं, जिनमें कई नामचीन महिलाएं शामिल थीं, ने अपने साथ हुए उत्पीड़न की कहानी खुलकर बतानी शुरू कर दी और इस बार कुछ दूसरे शक्तिशाली लोगों पर आरोप लगाये गये थे.
इन लोगों में निर्देशक जेम्स टोबैक (238 से अधिक महिलाओं के दुर्व्यवहार का आरोपी), अभिनेता डस्टिन हॉफमैन, केविन स्पेसी, स्टीवन सिगल और बेन एफलेक, स्टैंडअप कॉमेडियन लुइस सीके, राजनीतिक विश्लेषक मार्क हाल्पेरिन और पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज एचडब्ल्यू बुश शामिल थे. इसी तरह के आरोपों के कारण अपने समय के चहेते रिपब्लिकन उम्मीदवार व पूर्व न्यायाधीश रॉय मूर और तत्कालीन डेमोक्रेटिक सिनेटर अल फ्रैंकेन का सीनेट के लिए चुनावी अभियान खतरे में पड़ चुका है.
इनमें से राष्ट्रपति जॉर्ज बुश समेत कई लोगों ने अपने व्यवहार को लेकर क्षमा भी मांगी और अब यह स्पष्ट हो चुका है कि महिलाओं की हिम्मत के कारण ऐसी छिपी हुई महामारी लोगों के सामने आ पायी. ऐसा लगता है जैसे अमेरिका में कुछ बदलाव आया है, हालांकि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. वर्ष 2014 में ही अमेरिका के प्रसिद्ध हास्य कलाकारों में से एक बिल कॉस्बी पर दर्जनों महिलाओं ने नशा करने के बाद हमला करने का आरोप लगाया था.
हालांकि, कॉस्बी के खिलाफ एक मामला अभी अदालत में है और अगले साल इसका फैसला आने की उम्मीद है. हालांकि कॉस्बी का मामला काफी ज्यादा प्रचारित हुआ था, लेकिन इस मामले पर विंसटेन मामले की तरह लोगों की प्रतिक्रिया सामने नहीं आयी, और अब प्रतिदिन वैसे प्रसिद्ध लोग (जिनका पर्दाफाश हो चुका है) के बारे में एक या दो मामले सामने आ ही रहे हैं. ट्विटर पर एक अभियान शुरू हुआ, जिसने इस महत्वपूर्ण घटना को अंतरराष्ट्रीय बना दिया था. ऐसे मामलों पर भारत में कैसी प्रतिक्रिया देखने को मिली है?
अकादमिक, जिसका अर्थ प्रोफेसर व शिक्षक है, जो उत्पीड़न के दोषी थे, की सूची के साथ यहां इसकी शुरुआत हुई. यहां आरोप लगानेवाली महिलाएं अनाम थीं. राया सरकार नामक एक अमेरिकी विद्यार्थी ने इस सूची को सार्वजनिक किया था. इस सूची में आरोपित एक व्यक्ति, जो मद्रास संगीत अकादमी के निदेशक थे, ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है.
हालांकि, अभी यह अस्पष्ट है कि क्या वाकई उन्होंने आरोप लगने की वजह से अपना पद छोड़ा था या कोई और बात है.फरियादी के अज्ञात होने के कारण भले ही इस सूची पर हमला किया गया है, लेकिन प्रत्यक्ष तौर पर, भारत में यौन हिंसा के इतिहास को देखते हुए उनका गुमनाम होना आश्चर्यजनक नहीं है.
सरकारी आंकड़े बताते हैं, यौन हिंसा की शिकार 99 प्रतिशत भारतीय महिलाएं इस अपराध के लिए पुलिस में रिपोर्ट नहीं करती हैं. यहां तक कि अमेरिका में भी केवल एक तिहाई ही इस बाबत रिपोर्ट करती हैं, क्योंकि यह अपराध एक व्यक्तिगत हमला होता है और घटना का विवरण देने में वे सहज महसूस नहीं करती हैं.
भारत में इसके दूसरे कारण भी हैं. एक तो हमारा सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश ऐसा है, जहां यौन हिंसा का शिकार होने पर प्राय: महिलाओं को ही दोषी ठहराया जाता है. जहां गलत तरीके से सम्मान की जिम्मेदारी महिलाओं पर थोप दी जाती है. और जहां कोई गलत काम करने पर प्रभावशाली लोगों को कभी भी सजा नहीं मिलती है.
बॉलीवुड में गैर-बराबर तरीके से कुछ-एक पुरुषों के हाथ में सारी शक्ति है, चाहे वे अभिनेता हों, निर्माता हों या फिर निर्देशक. जो महिला इनके खिलाफ अारोप लगाती है, उसे फिल्म उद्योग में दोबारा काम करने का सपना भूलना होता है, इसके अतिरिक्त उसे अपमानित किया जायेगा और फिर वह व्यक्ति बच निकलेगा.
राजनीति में हालात और भी बुरे हैं. यहां वैसे शक्तिशाली राजनेता जो शोषण करते हैं, के खिलाफ न्याय मिलना मुश्किल है. और दूसरों की निजी जिंदगी में दखल देने में राजनीतिक दल कोई हिचक नहीं दिखाते हैं. निर्दोष महिलाओं का केवल प्रेम के नाम पर यहां शोषण किया जाता है, जिसे गुप्त रूप व अनुचित तरीके से रिकॉर्ड किये गये सेक्स स्कैंडल टेप दर्शाते हैं. कहा जा सकता है कि इनके बदलने का वक्त जब आयेगा, तो वह सचमुच आश्चर्यजनक होगा.
लोगों द्वारा उत्साहवर्धन करने पर हिंसा और अपमान से पीड़ित भारतीय महिलाएं और सर्वाइवर लोगों के बीच जा सकती हैं. ऐसी हिंसा का दोष महिलाओं पर मढ़ दिया जाना क्रूरता है और निस्संदेह ऐसी घटनाओं को खत्म करने या कम करने का एकमात्र सही तरीका यह सुनिश्चित करना है कि ऐसे मामलों में कानून तेजी से अपना काम करे और दोषी को सजा मिले. लेकिन जब समस्या कुछ हद तक संस्कृति को लेकर है, तब सही वक्त ही बड़ा बदलाव ला सकता है.
दूसरे कुछ देशों में लोगों ने पहले ही महिलाएं के प्रति अन्याय कर दिया है. विंसटेन मामले के जवाब में चीन की आधिकािरक मीडिया ने कहा है कि चीन में महिलाओं का अपमान बहुत कम होता है, क्योंकि चीनी पुरुषों को महिलाओं की रक्षा करने का पाठ पढ़ाया जाता है.
महिलाओं के खिलाफ गलत आचरण चीन के प्रत्येक परंपरागत मूल्य और रिवाज के विपरित है. यह निश्चित तौर पर बकवास बात है.
इस अवसर का यूं ही हाथ से निकल जाना शर्मनाक होगा, क्योंकि यही वह वक्त है, जहां जनसंख्या के एक बड़े हिस्से की मानसकिता में बदलाव लाया जा सकता हैै. उनके मन में पीड़ितों के प्रति अधिक संवेदना और सहानुभूति जगायी जा सकती है और उन सामाजिक और सांस्कृतिक मान्यताओं को परे किया जा सकता है, जो कई मायने में पीड़ित को ही दोषी ठहराते हैं.
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