जाम से मुक्ति चाहिए,ताे थाेड़ा कष्ट सहना हाेगा

Updated at : 14 Nov 2017 8:03 AM (IST)
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जाम से मुक्ति चाहिए,ताे थाेड़ा कष्ट सहना हाेगा

अनुज कुमार सिन्हा पूरा शहर, पूरी राजधानी (रांची) तबाह है. जाम से. रांची के बाहर की बात करें ताे जमशेदपुर, धनबाद में हालात (जाम के मामले में) बेहतर नहीं हैं. छाेटे-छाेटे शहराें में भी अब यह परेशानी दिखने लगी है. समय रहते नहीं सुधरे, तैयारी नहीं की, सड़कें चाैड़ी नहीं हुई, ताे उन छाेटे शहराें […]

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अनुज कुमार सिन्हा

पूरा शहर, पूरी राजधानी (रांची) तबाह है. जाम से. रांची के बाहर की बात करें ताे जमशेदपुर, धनबाद में हालात (जाम के मामले में) बेहतर नहीं हैं. छाेटे-छाेटे शहराें में भी अब यह परेशानी दिखने लगी है. समय रहते नहीं सुधरे, तैयारी नहीं की, सड़कें चाैड़ी नहीं हुई, ताे उन छाेटे शहराें के भी हालात रांची जैसे हाेंगे. झारखंड बनने के बाद तेजी से रांची की आबादी बढ़ी, गाड़ियां कई गुनी बढ़ी. अपवाद काे छाेड़ दें ताे सड़कें उस अनुपात में चाैड़ी नहीं हुईं. नतीजा सामने है. शहर में आप फ्री हाेकर चल नहीं सकते, गाड़ियां नहीं चला सकते. चाराे आेर जाम.

बीस मिनट का रास्ता दाे-दाे घंटे में तय हाेता है. लाेग परेशान, पर करें ताे क्या करें. रातू राेड आैर कांटा टाेली से जाे लाेग राेज गुजरते हैं, वे इस पीड़ा काे ज्यादा महसूस कर सकते हैं. शहर में कई बार फ्लाइआेवर बनाने की घाेषणा की गयी, लेकिन हाेने लगा विराेध. 17 साल में काेई भी सरकार कड़े फैसले नहीं ले सकी. विधायक-पार्षद अपना दांव खेलते रहे, राेड़ा अटकाते रहे. अब फिर शिलान्यास हाेना है, विराेध भी हाे रहा है. जाे प्रभावित हाेगा, जिसके घर या दुकान का कुछ हिस्सा टूटेगा, वह नाराज हाेगा ही. उसकी नाराजगी कैसे कम हाे, इस पर बात हाे. उसे पूरा पैसा मिले, पूरी सुविधा मिले, कहीं बसाना हाे, जरूर बसाइए लेकिन फ्लाइआेवर जरूर बनाइए, सड़कें जरूर चाैड़ी कीजिए, वरना नरक की जिंदगी जीने के लिए तैयार हाे जाइए. एेसे कड़े फैसले (फ्लाइआेवर बनाने या सड़कें चाैड़ी करने) से हजार लाेग प्रभावित हाे सकते हैं लेकिन 20 लाख लाेगाें काे राहत मिलेगी. याद रखिए, आज नहीं ताे कल यह काम करना ही हाेगा. ऐसा न हाे कि चार साल बाद जब यह फैसला हाे ताे स्थिति संभालने लायक भी न रहे. चाहे हरमू राेड का फ्लाइआेवर हाे या फिर कांटाटाेली का, जाे तिथि निर्धारित है, उस पर शिलान्यास हाे, समय पर काम शुरू हाे आैर निर्धारित समय के पहले ही फ्लाइआेवर बन जाये.

दाे साल इसे बनने में लगेंगे, तब तक शहर में जाे ट्रैफिक व्यवस्था हाेगी, उसमें लाेगाें काे कष्ट ताे हाेगा ही. एक दिन के जाम में यह हालत है ताे दाे साल में क्या हाल हाेगा. अगर समय पर नहीं बना आैर तीन-चार साल लगा दिया ताे समझ लीजिए क्या हाेगा? इसलिए समय पर जमीन अधिग्रहण, समय पर काम आरंभ करना, समय पर खत्म करना बड़ी चुनाैती हाेगी. सरकार-अफसर इस चुनाैती काे स्वीकार करें, जनता सहयाेग करे, कुछ भी असंभव नहीं. हां, लाेगाें काे धैर्य रखना हाेगा, कई जगहाें पर लाेगाें काे घूम कर जाना हाेगा, दूरी बढ़ेगी, जाम बढ़ेगा, समय लगेगा, पर भविष्य के आराम के लिए इस कष्ट काे सहना हाेगा. चिल्लाना नहीं हाेगा.

हां, राजनेता इस पर राजनीति न करें. न ताे परदे के सामने आैर न ही परदे के पीछे. लाेगाें काे उकसायें नहीं. यह सत्ता पक्ष या विपक्ष का मामला नहीं है. सत्ता पक्ष बनाम सत्ता पक्ष (निर्णय सरकार का हाेगा लेकिन अधिकांश विधायक भी भाजपा के ही हैं) इसे न बनायें. हां, सरकार इतना ध्यान रखे कि किसी के साथ साैतेला व्यवहार न हाे. अगर किसी गरीब दुकानदार का घर ताेड़ा जाता है ताे ताकतवर आैर पैसेवाले बड़े दुकानदार भी नहीं बचें. दाेनाें के साथ समान व्यवहार हाे. हाेता यह है कि ताकत आैर पैरवी के सामने नियम बदल दिये जाते हैं.

अगर ऐसा हाेगा ताे अाक्राेश बढ़ेगा. सबसे बड़ी चुनाैती ट्रैफिक पुलिस के सामने हाेगी. इसे स्वीकारना हाेगा. यह भी सच है कि सिर्फ दाे फ्लाइआेवर से रांची का कल्याण नहीं हाेनेवाला. रातू राेड में भी आज नहीं ताे कल यह काम करना हाेगा. शहर पर लाेड कम करना हाेगा. आठ-दस साल से रिंग राेड बन ही रहा है (पता नहीं कैसे काम हाे रहा है). अगर समय पर यह काम पूरा हाे गया हाेता ताे शहर पर कुछ ताे लाेड कम हाेता. बेहतर हाेगा कि जितना जल्द हाे सके, रिंग राेड पूरा बन जाये. फ्लाइआेवर का काम शुरू हाेने के पहले शहर की सड़कें चाैड़ी कर दी जायें. नाली काे ढंग से बना कर भी यह काम पूरा हाे सकता है. जहां सड़कें चाैड़ी हाे चुकी हैं लेकिन बिजली के खंभे बीच में हैं. ऐसे अधूरे काम काे पूरा करना हाेगा.

यह काम आसान नहीं है. रांची का हर नागरिक (जिसकी जमीन जा रही है), वह भी जाम से परेशान है. वह भी निदान चाहता है. माेमेंटम झारखंड के दाैरान कांटाटाेली से बूटी माेड़ तक की सड़क चाैड़ी हाे गयी. आज इस रास्ते पर लाेग राहत महसूस कर रहे हैं. साेचिए, अगर नामकुम, डिबडीह आैर कडरू फ्लाइआेवर नहीं बना हाेता ताे आज रांची की हालत क्या हाेती. आज इन तीनाें फ्लाइआेेवर से गुजरनेवालाें काे आराम हाेता है. कांटाटाेली, हरमू या रातू राेड (जिसका मामला लटका दिया गया है) के फ्लाइआेवर जब बन कर तैयार हाे जायें ताे इन क्षेत्राें काे जाम से मुक्ति मिल जायेगी. सारा सवाल इच्छाशक्ति का है. सरकार इन्हें बनाना चाहती है.

पीछे हटने से भविष्य के लिए आैर गंभीर संकट पैदा हाेगा. जाे करना है, अभी कीजिए. कड़ी मानिटरिंग हाे, अफसर आैर पूरी टीम इस मिशन काे पूरा करने में लग जाये ताे यह काम जरूर समय से पहले पूरा हाेगा. आज दिल्ली, काेलकाता, बेंगलूर,यहां तक की पटना में भी फ्लाइआेवर का जाल बिछा है. रांची में भी यह काम हाे सकता है. अगर जाम नहीं चाहिए ताे कष्ट करना हाेगा, स्वार्थ से ऊपर उठना हाेगा. जिसने भी अतिक्रमण किया है, नियम के विरुद्ध काम किया है, उस पर कार्रवाई हाेनी चाहिए, चाहे वह कितना भी पैरवी वाला क्याें न हाे.

कुछ आैर मुद्दे हैं. आज नहीं ताे कल नयी रांची बसानी हाेगी (नाम चाहे जाे भी दें). सारे मॉल रांची शहर में क्याे बनेंगे. जहां जाम की इतनी बड़ी समस्या है, वहां बीच शहर में बड़े-बड़े मॉल, हाेटल, अस्पताल बनाने की अनुमति कैसे मिल जा रही है. जाम हाे,ताे मरीज अस्पताल जाते-जाते लुढ़क जायेगा. भविष्य में इन बिंदुआें पर भी ध्यान देना हाेगा.

हाेटल, अस्पताल, मॉल आदि शहर से थाेड़ी दूरी पर बने, कुछ बड़े दफ्तर भी बाहर बने ताे रांची शहर पर धीरे-धीरे लाेड कम हाेगा. अगर ऐसा न हुआ ताे सड़कें कितनी चाैड़ी कर लें, कितने ही फ्लाइआेवर क्याें न बना लें, समस्या ज्याें की त्याें रहेंगी. इसलिए सरकार कड़े फैसले लेते हुए काम काे आगे बढ़ाये, उसे जनता का सहयाेग मिलेगा ही. यह हर आदमी से जुड़ा मामला है, ताकि वह भी जाम से राहत की सांस ले सके.

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