अप्रतिम थी नेहरू की दूरदर्शिता

Updated at : 14 Nov 2017 12:07 AM (IST)
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अप्रतिम थी नेहरू की दूरदर्शिता

प्रो आदित्य मुखर्जी इतिहासकार, जेएनयू हमारे देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के विचारों की प्रासंगिकता भारतीय लोकतंत्र में आज भी है और कल भी रहेगी है. हां, आज ज्यादा है, क्योंकि देश में जिस तरह की धार्मिक उन्माद वाली परिस्थितियां बनी हुई हैं, असहिष्णुता बढ़ी है, उसके ऐतबार से नेहरू की प्रासंगिकता कुछ […]

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प्रो आदित्य मुखर्जी

इतिहासकार, जेएनयू

हमारे देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के विचारों की प्रासंगिकता भारतीय लोकतंत्र में आज भी है और कल भी रहेगी है. हां, आज ज्यादा है, क्योंकि देश में जिस तरह की धार्मिक उन्माद वाली परिस्थितियां बनी हुई हैं, असहिष्णुता बढ़ी है, उसके ऐतबार से नेहरू की प्रासंगिकता कुछ बढ़ जाती है. नेहरू जैसे राष्ट्र-निर्माता की जयंती मनाते हुए उनके समय के ऐतिहासिक और वैचारिक तथ्यों को समझने की बहुत जरूरत है. उन सभी तथ्यों में सबसे पहली बात यह है कि पंडित नेहरू ने लोकतांत्रिक भारत को ‘हिंदू भारत’ नहीं बनने दिया, जबकि बंटवारे के बाद हमारे सामने ही एक ‘मुस्लिम पाकिस्तान’ बन गया.

आजादी के तुरंत बाद जब सांप्रदायिक भावना चरम पर थी, लाखों लोग मारे जा चुके थे और बेशुमार लोग बेघर हो चुके थे, तब नेहरू ने तीन साल के अंदर चुनाव करवाया. वह चुनाव बेहद शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ. उस चुनाव में भारत की हम-जनता ने मुस्लिम पाकिस्तान की तरह हिंदू भारत की कल्पना को नकार दिया और एक ‘धर्मनिरपेक्ष भारत’ के लिए वोट किया.

आजादी के तुरंत बाद नेहरू जी की यह सबसे बड़ी कामयाबी रही है. उन्होंने लोगों से सीधा संवाद स्थापित कर उनकी बातें सुनी और सांप्रदायिकता के चरम से ‘रिलिजियस इंडिया’ के मुहाने पर खड़े भारत का रुख मोड़कर एक ‘सेकुलर इंडिया’ के ख्वाब को हकीकत की शक्ल में जमीन पर उतार दिया. आज इसी सेकुलर इंडिया की सबसे ज्यादा जरूरत है, क्योंकि नेहरू ने भारत में लोकतंत्र को एक परंपरा बनाया.

नेहरू समझते थे कि एक समृद्ध संस्कृति वाले देश की जनता को उनके मूलभूत अधिकारों का एहसास दिलाना बहुत जरूरी है. इस एहसास का एक मुख्य हिस्सा था चुनाव, जिसमें जनता खुद से अपना प्रतिनिधि चुनने के लिए स्वतंत्र होती है. इस तरह उन्होंने देश की जनता के दिलों में उसकी खुद की ताकत का एहसास कराया और उसमें लोकतंत्र की समझ विकसित की.

वह लोकतंत्र हमारे देश में आज बेहद कामयाब है, जबकि दुनिया के किसी भी औपनिवेशिक देश यानी ब्रिटिश गुलामी से आजाद हुए नये-नये देशों में यही लोकतंत्र उतना कामयाब नहीं हो पाया और भारत की तरह एक लंबे अरसे तक नहीं चल पाया. वही लोकतंत्र भारत में ऐसा रच-बस गया है कि आज हम दुनिया का महान लोकतंत्र के रूप में जाने जाने लगे हैं.

आजादी के तुरंत बाद देश-निर्माण की प्रक्रिया को नेहरू अच्छे से समझते थे कि किसी भी देश को आधुनिक बनने के लिए विज्ञान और तकनीक का विकास जरूरी है. इसलिए नेहरू ने देश के सामने साइंटिफिक टेंपर की बात कही. उन्होंने ऐसे नववैचारिक मूल्यों की स्थापना की, जो अंधविश्वास और पुरानी विचारधारा को छोड़कर वैज्ञानिक युग में प्रवेश करने के लिए जरूरी होते हैं. आज उन्हीं मूल्यों की जरूरत है, क्योंकि ऐसा लग रहा है कि वर्तमान में सत्ता-समर्थन में हम उन मूल्यों से दूर होते नजर आ रहे हैं. हमें फिर से पुराने अंधविश्वास की ओर धकेला जा रहा है और यह बहुत ही दुखद है कि हमारी मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था ही यह सब कर रही है.

नेहरू की एक खास बात यह थी कि वे पीछे मुड़कर नहीं देखते थे, बल्कि नये विचारों का सृजन करते थे. यही वजह है कि उनके साइंटिफिक टेंपर का यथार्थ ‘देखा-समझा’ पर आधारित था, ‘सुना-समझा’ पर आधारित नहीं था. अंधविश्वास और कपोल-कल्पनाएं सब सुनी-सुनायी बातें होती हैं, इनका हकीकत से कहीं भी कोई भी संबंध नहीं होता. ऐसे में आज देश के लिए एक ऐसा वक्त है कि जब नेहरू को रोज याद करने और उनके दूरदर्शिता वाले विचारों को और आगे ले जाने की जरूरत है. मैं समझता हूं कि अगर नेहरू की लोकतांत्रिक और आधुनिक वैचारिकी की सार्थकता को समझा जाये, उस पर अमल किया जाये, तभी उनकी जयंती मनाने का कोई अर्थ है.

नेहरू ने कभी दलगत लड़ाई की बात नहीं की, बल्कि उनका मानना था कि एक राजनीतिक दल को लड़ाई हमेशा विचारधारा के स्तर पर लड़नी चाहिए. क्या आज कोई राजनीतिक दल विचारधारा की लड़ाई लड़ रहा है? इसीलिए नेहरू हमें याद आते हैं, क्योंकि विचारों को लेकर वे मतभेद का सम्मान करते थे और मनभेद को कोसों दूर रखते थे.

नेहरू की सोच थी कि गरीबों की तरफ अपनी नजरें मोड़ो, तभी देश का सर्वांगीण विकास संभव हो पायेगा. लेकिन, आज देश में गरीब की हालत क्या है, यह किसी से छुपा नहीं है. आजादी के बाद भारत की आर्थिक स्थिति के मद्देनजर जिन चीजों की सबसे ज्यादा जरूरत थी, नेहरू ने उन्हें पूरा किया. क्या आज कोई नेता ऐसा करने की भी सोच रहा है? आज अर्थव्यवस्था की क्या हालत है?

आजादी के बाद नेहरू के शासनकाल के उन 15 वर्षों में देश में चार प्रतिशत का ग्रोथ रेट था, जो उस समय दुनियाभर में सबसे अच्छा ग्रोथ रेट माना जाता था. इसीलिए नेहरू की विकासात्मक रणनीति आज भी हमारे लिए एक बेहतरीन उदाहरण मानी जाती है. आज हमारे पास सब कुछ है, हम साधनसंपन्न देश हैं, फिर भी 6-7 प्रतिशत ग्रोथ रेट के लिए हम एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं. जिस तरह आज की गंदी राजनीति से हमारा लोकतांत्रिक भारत पीड़ित है, उसमें नेहरू की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है.

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