अक्षरधाम ही है भारत धाम

Updated at : 10 Nov 2017 5:55 AM (IST)
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अक्षरधाम ही है भारत धाम

तरुण विजय पूर्व सांसद, भाजपा दिल्ली में जब अक्षरधाम का उद्घाटन हुआ था, तब पांचजन्य में संपादकीय छपा था- भारतीय सभ्यता का उषाकाल. जो दिल्ली आक्रमणकारियों ने अठारह बार ध्वस्त की, मंदिर बनने नहीं दिये, सबसे बड़े आस्था केंद्र बर्बर हमलावरों की छाया में मस्जिदों व चर्चों के रूप में बने, वहां पहला बड़ा मंदिर […]

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तरुण विजय
पूर्व सांसद, भाजपा
दिल्ली में जब अक्षरधाम का उद्घाटन हुआ था, तब पांचजन्य में संपादकीय छपा था- भारतीय सभ्यता का उषाकाल. जो दिल्ली आक्रमणकारियों ने अठारह बार ध्वस्त की, मंदिर बनने नहीं दिये, सबसे बड़े आस्था केंद्र बर्बर हमलावरों की छाया में मस्जिदों व चर्चों के रूप में बने, वहां पहला बड़ा मंदिर गांधीजी के आग्रह पर सेठ बलदेव दास बिरला व उनके पुत्र सेठ घनश्याम दास बिरला ने मंदिर मार्ग पर 1939 में बनावाया-लक्ष्मी नारायण मंदिर. इसका उद्घाटन भी गांधीजी ने किया था.
दूसरा सत्तर के दशक में इंदिरा गांधी के सहयोग से आद्याकात्यायनी मंदिर, छत्तरपुर में बना. लेकिन, यदि वास्तव में हिंदू गौरव, वास्तुशिल्प के उत्कर्ष, भारत की सभ्यता व संस्कृति का अद्भुत दर्शन करानेवाला पहला विराट मंदिर कह सकें, ऐसा अक्षरधाम मंदिर ही है. यह 2005 में बना था और इसकी प्रेरणा स्वामिनारायण संप्रदाय के महान संत योगी जी महाराज (प्रमुख अध्यक्ष) से मिली थी. यहां आने पर भारत की आत्मा के दर्शन होते हैं.
वस्तुत: मूल अक्षरधाम गांधीनगर, गुजरात, में 1992 में बना था- पूज्य प्रमुख स्वामी की प्रेरणा तथा मार्गदर्शन से. 23 एकड़ भूमि में अक्षरधाम का सृजन वस्तुत: हिंदू गौरव की पत्थरों की उत्कीर्ण कविता ही है. इसे पूरा होने में तेरह वर्ष लगे और इसमें 264 अद्भुत उत्कीर्ण मूर्तियां हैं. यहां स्वामिनारायण संप्रदाय के संस्थापक नीलकंठ वर्णी (सहजानंद), जिन्हें भगवान के जीवन की गाथा और रामायण, महाभारत, उपनिषदों का परिचय भी मिलता है.
भारत देखना हो, तो अक्षरधाम देख लीजिए- यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी.महान सुधारवादी संत स्वामी रामानंद के शिष्य उत्तर प्रदेश में अयोध्या के पास छपैया गांव (जहां आज भी स्वामिनारायण मंदिर है) के निवासी घनश्याम पांडे बने, जो दीक्षा के बाद सहजानंद (नीलकंठ वर्णी) कहाये. महान परिव्राजक, तपस्वी और वीतरागी स्वामी सहजानंद ने हिंदू समाज को संगठित किया, उनसे कुरीतियां छुड़वायीं, उनकी धर्मनिष्ठा प्रबल की तथा उस समय ईसाई मिशनरियों के कुचक्री धर्मांतरण अभियानों से बचाया. यदि स्वामी सहजानंद द्वारा गठित, सृजित एवं पुष्ट स्वामिनारायण संप्रदाय न होता, तो गुजरात में कितने हिंदू शेष रहते, कहना कठिन है. स्वामिनारायण संप्रदाय, कालांतर में अनेक शाखाओं तथा धाराओं में फैला. अक्षरधाम बोच्छासनवासी अक्षरपुरुषोत्तम स्वामिनारायण संस्था (बीएपीएस) द्वारा निर्मित है, जो हिंदू धर्म की मूल शिक्षाओं का वर्तमान समय में सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि चेहरा कहा जा सकता है.
इन दिनों जबकि साधु-संन्यासियों के बारे में अनेक भ्रांत धारणाएं एवं अनर्गल प्रचार होता है, स्वामिनारायण संप्रदाय ने विश्वभर में हिंदू धर्म के गौरव तथा सम्मान की रक्षा की है, उसे बढ़ाया है.
विश्वभर में सात सौ से अधिक हिंदू मंदिर हजारों युवा संन्यासी- जो इंजीनियर, डॉक्टर, सीए, एमबीए, बैरिस्टर, अटार्नी एवं श्रेष्ठ चित्रकार भी हैं- अमेरिका, यूरोप जैसे संस्थानों का सुख छोड़कर हिंदू धर्म के गौरववर्द्धन एवं दलित जनजातियों की सेवा के माध्यम से ईश्वर तक पहुंचने के पथ को अपनाते हैं.
मैं स्वयं ऐसे अनेक युवा संन्यासियों से मिला हूं, जिनके ज्ञान और वैज्ञानिक सोच को देखकर अचंभित हुआ हूं. वर्तमान युग में स्वामिनारायण संस्था को विश्वव्यापी विस्तार एवं मान्यता का अद्भुत संसार रचनेवाले प्रमुख स्वामी गत वर्ष 95 की आयु में 13 अगस्त को ब्रह्मलीन हुए थे.
वे लगातार 66 वर्ष तक स्वामिनारायण संस्था के प्रमुख रहे. उन्होंने गुजरात के गरीब, पिछड़े जनजातीय क्षेत्रों में युवा संन्यासी डॉक्टर, शिक्षक एवं धर्म प्रसारक भेजे. युवाओं में सद्प्रवृत्तियों के जागरण हेतु हर रविवार को होनेवाली ‘रवि सभा’ को प्रारंभ किया. कुरीतियों से हिंदू समाज मुक्त हो, ऐसा सघन एवं सफल अभियान चलाया तथा मनुष्य की सेवा के माध्यम से ईश्वर सेवा हो सकती है, ऐसा भाव जागृत किया.
अक्षरधाम उन्हीं की कल्पना है.
वहां नचिकेता की कथा को अद्भुत, अविश्वसनीय जल-उत्सव के मंत्रमुग्ध करनेवाले प्रदर्शन द्वारा समझाया जाता है. प्राचीन भारत में ज्ञान, विज्ञान, प्रौद्योगिकी प्रगति एवं आयुर्वेद, विश्वविद्यालयों की स्थापना, अध्यात्म तथा आधुनिक शिक्षा के समन्वय का दर्शन अक्षरधाम के माध्यम से करवाते हुए राष्ट्र और धर्म को जोड़ा गया है. एक हिंदू मंदिर कैसा होना चाहिए, किस प्रकार उसे हिंदू समाज का मनोबल बढ़ाते हुए राष्ट्रीय उत्कर्ष में प्रवृत्त होने की प्रेरणा देनी चाहिए, यह अक्षरधाम सिखाता है.
साल 2002 में 24 सितंबर को अक्षरधाम (गांधीनगर) पर आतंकियों ने हमला किया था, जिसमें 32 हिंदू श्रद्धालुओं की जान चली गयी थी. परंतु, प्रमुख स्वामी व संन्यासी अविचलित रहे तथा वीर योद्धा संन्यासियों की तरह सेवा कार्य में जुटे रहे.
अक्षरधाम की रजत जयंती पर स्वामिनारायण विचारधारा में गहरी श्रद्धा रखनेवाले नरेंद्र भाई मोदी, प्रधानमंत्री के नाते गये, श्रद्धा व्यक्त की, यह हिंदू धर्म के लिए और भारत के लिए बहुत गौरव का विषय है. स्वामिनारायण हिंदू धर्म की रक्षा एवं विस्तार के लिए युवा योद्ध संन्यासी तथा समाज तैयार करे, यही कामना है. जय स्वामिनारायण!
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