नौकरशाही का अड़ंगा

Updated at : 01 Nov 2017 5:14 AM (IST)
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नौकरशाही का अड़ंगा

अन्य सुरक्षा के साजो-सामान और हथियारों की खरीद पर देश को बड़ी रकम खर्च करनी पड़ती है. इस साल के बजट में रक्षा मंत्रालय को विभिन्न मदों में 3.59 लाख करोड़ की राशि आवंटित की गयी है. बीते दस साल के रुझान के आधार पर कहा जा सकता है कि इस राशि का 40 फीसदी […]

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अन्य सुरक्षा के साजो-सामान और हथियारों की खरीद पर देश को बड़ी रकम खर्च करनी पड़ती है. इस साल के बजट में रक्षा मंत्रालय को विभिन्न मदों में 3.59 लाख करोड़ की राशि आवंटित की गयी है. बीते दस साल के रुझान के आधार पर कहा जा सकता है कि इस राशि का 40 फीसदी से ज्यादा हिस्सा सैन्य साजो-सामान के आधुनिकीकरण और भंडारण पर खर्च होना है. इसके लिए देश मुख्य रूप से आयात पर निर्भर है.

अंतरराष्ट्रीय शोध-अध्ययनों के आंकड़े बताते हैं कि सैन्य साजो-सामान के आयात पर भारत का खर्च हाल के सालों में बढ़ा है. साल 2012 से 2016 के बीच हथियार के कुल वैश्विक व्यापार में भारत की खरीदारी का हिस्सा 13 फीसदी था, जो बड़े आयातक देशों में सबसे ज्यादा है. सैन्य-आयुधों के लिए विदेशों पर निर्भरता कम करने की जरूरत को भांप कर सरकार ने 250 अरब डॉलर के एक बड़े पैकेज की घोषणा की थी. इसके अंतर्गत अत्याधुनिक रायफल से लेकर युद्धक विमान और पनडुब्बी तक देश में तैयार करने की बात कही गयी और ‘मेक इन इंडिया’ के तहत सैन्य-साजो निर्माण के लिए देशी-विदेशी कंपनियों के लिए राह खोलने का काम हुआ.

इसके बावजूद तथ्य यह है कि बीते तीन सालों में सेना की 3.5 लाख करोड़ की परियोजनाएं जमीनी तौर पर साकार होने की बाट जोह रही हैं. परियोजनाओं के साकार होने में देरी की वजह है नौकरशाही का रवैया. जंगी हालात में सेना को सहायता मुहैया कराने के लिए छोटे हेलीकॉप्टर और युद्धक वाहन से लेकर नौसेना के लिए विमान तथा अत्याधुनिक पनडुब्बी बनाने तक की योजनाएं अफसरशाही के किसी न किसी अड़ंगे के कारण अधर में लटकी हुई हैं.

बेशक यह देखना होता है कि आयुध-निर्माण से जुड़े तमाम पक्ष एक-दूसरे से सहमत हों. मिसाल के लिए, रूस सुखोई टी-50 नाम का युद्धक विमान भारत के साथ मिलकर विकसित करने और बनाने के लिए राजी था, लेकिन सेना ने इस विमान की मारक-क्षमता पर सवाल उठाये, तो परियोजना आगे न बढ़ सकी. लेकिन, सभी मामले एक जैसे नहीं होते.

उदाहरण के लिए, रूस के साथ मिलकर कामोव यूटिलिटी हैलिकॉप्टर बनाने की योजना पर दोनों देशों के बीच 2015 में ही सहमति बन गयी थी, परंतु एक संयुक्त उद्यम के रूप में हैलीकॉप्टर के निर्माण के लिए प्रस्ताव अभी तक तैयार नहीं हो पाया है. स्पष्ट तौर पर यह लालफीताशाही का मामला है. रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने अधर में लटकी हुई परियोजनाओं का जायजा लेने के लिए हाल में विभागीय अधिकारियों के साथ लगातार बैठकें की हैं.

आतंकवाद, घुसपैठ और कुछ पड़ोसी देशों की आक्रामकता से जूझ रही हमारी सेना के तीनों अंगों को चुस्त-दुरुस्त रखने के काम में बेवजह की देरी किसी भी लिहाज से ठीक नहीं है. उम्मीद की जानी चाहिए कि मंत्रालय की तत्परता से सैन्य साजो-सामान के निर्माण की परियोजनाओं में हो रही देरी का त्वरित समाधान निकलेगा.

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