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  • Oct 3 2018 8:39AM

रोजगार और वेतन संबंधी चुनौतियां





अमित बसोले

एसोसिएट प्रोफेसर, 
अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी
amit.basole@apu.edu.in








आनंद श्रीवास्तव

अर्थशास्त्री, अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी 




चंद सरकारी नौकरियों के लिए लाखों उम्मीदवारों का परीक्षा देना आजकल आम बात है. रोजगार की स्थिति यह है कि ग्रेजुएट और पोस्ट-ग्रेजुएट नौजवान चपरासी की नौकरी के अभिलाषी हैं. यानी जिन नौकरियों को देश का युवा व शिक्षित वर्ग 'अच्छी' नौकरी मानता है, उसकी भारी कमी है.
 
भारत की तेज आर्थिक वृद्धि के बावजूद रोजगार कम क्यों हैं? इस बारे में क्या किया जा सकता है? इसके कारणों को समझने के लिए अर्थव्यवस्था के ढांचे और विकास की प्रक्रिया को देखना होगा. एपीयू की 'स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया' रिपोर्ट इन सवालों का जवाब देने की कोशिश करती है.
 
स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार जीडीपी में 7 प्रतिशत की बढ़त रोजगार में एक प्रतिशत से भी कम का इजाफा कर पाती है.
 
भारत सरकार के लेबर ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि 2015 में युवा-शिक्षित वर्ग में बेरोजगारी की दर 16 प्रतिशत थी. यानी छह में से एक युवक और छह में से एक ग्रेजुएट बेरोजगार था. साल 2015 के बाद सरकारी सर्वे उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन निजी सर्वे के अनुसार 2016-2017 में भी कुछ ऐसी ही स्थिति बनी रही है. 
 
नौकरी 'अच्छी' होने का एक मापदंड यह भी है कि वेतन कितना है. अर्थव्यवस्था के ज्यादातर हिस्सों में वेतन की दर (महंगाई की दर से नियमित करने के बाद) 3 प्रतिशत सालाना बढ़ी है. पर यह वृद्धि काफी नहीं है. 
 
इसके बाद भी 82 प्रतिशत पुरुष और 92 प्रतिशत महिलाएं 10 हजार रुपये प्रतिमाह से कम कमाते हैं. सभी क्षेत्रों में औसत वेतन केंद्रीय वेतन आयोग द्वारा तय किये गये न्यूनतम वेतन 18 हजार रुपये से काफी कम है. न्यूनतम सरकारी वेतन से देश के अधिकांश हिस्से की इतनी कम आय ही सरकारी नौकरी के आकर्षण की एक वजह है.
 
हाल तक अच्छे और बढ़ते रोजगार की अपेक्षा हमें संगठित निर्माण के क्षेत्र से होती थी. आशा रहती थी की मिलों और कारखानों में मजदूरों को नियमित वेतन और अन्य सुविधाएं मिलती होंगी. पर रिपोर्ट के अनुसार इस क्षेत्र में 'कांट्रैक्ट मजदूरों' की संख्या में भारी वृद्धि हुई है.
 
श्रम-कानूनों से बचने के लिए कंपनियां कांट्रैक्ट, अप्रेंटिस, ट्रेनी के नाम पर ऐसे मजदूर रखती हैं, जो कमोबेश काम 'परमानेंट' मजदूरों वाले ही करते हैं, पर कम वेतन पर एवं अन्य सुविधाओं के बिना. अगर उद्योग-निर्माण का क्षेत्र अच्छी नौकरियां नहीं दे रहा है, तो क्या सेवा क्षेत्र से यह अपेक्षा की जा सकती है? रिपोर्ट के अनुसार, 'नयी सेवाएं' जैसे आईटी, संगठित फुटकर बिक्री (मॉल) में वृद्धि हुई है, लेकिन 50 प्रतिशत सेवा रोजगार अब भी छोटे दुकानदार, घरेलू सेवाओं से बनता है, जिसमें आय कम होती है और नौकरी बनाम स्व-रोजगार का प्रमाण ज्यादा होता है. 
यह रिपोर्ट रोजगार और वेतन में जाति, धर्म और लिंग के आधार पर विषमताओं पर भी नजर डालती है. महिलाओं की आय औसतन पुरुषों की आय के सिर्फ 65 प्रतिशत है. 
 
पिछले कुछ सालों में इस अंतर में कमी आयी है, पर अभी इसे और कम करने की जरूरत है. श्रम-बल में महिलाओं की भागीदारी की दर भी बहुत कम है. श्रमिकों में महिलाओं का हिस्सा निर्माण क्षेत्र में 22 प्रतिशत और सेवा क्षेत्र में 16 प्रतिशत है. 
 
राज्यों का आंकड़ा देखें, तो उत्तर प्रदेश में रोजी कमानेवाले 100 पुरुषों पर सिर्फ 20 महिलाएं हैं. तमिलनाडु में यह संख्या 50 है और उत्तर-पूर्वी राज्यों में 70 है. कम भागीदारी के लिए सामाजिक बाधाओं से ज्यादा उचित काम का अभाव जिम्मेदार है. मनरेगा, आशा, आंगनवाड़ी जैसे सरकारी कार्यक्रम महिलाओं के रोजगार को काफी बढ़ावा देते हैं.
 
रिपोर्ट के अनुसार, एससी/एसटी से आनेवाले श्रमिकों का हिस्सा कम वेतन वाले कामों में ज्यादा है. वहीं उच्च जातियों का हिस्सा अधिक वेतन वाले कामों में ज्यादा है. सवर्ण जातियों के मुकाबले एससी का वेतन औसतन 56 प्रतिशत और एसटी का वेतन 55 प्रतिशत है. 
 
अन्य पिछड़ों (ओबीसी) के लिए यह आंकड़ा 72 प्रतिशत है. हालांकि, सरकारी प्रशासन में एससी/एसटी का अच्छा प्रतिनिधित्व है, जिसे आरक्षण नीति की एक सफलता माना जा सकता है.
 
रिपोर्ट जोर देती है कि भारत की आर्थिक नीति का उद्देश्य अर्थव्यवस्था में ढांचागत बदलाव लाना है. इसे एक कृषि-केंद्रित और असंगठित तथा सूक्ष्म या छोटे उद्यमों वाली अर्थव्यवस्था से उद्योग और सेवा केंद्रित तथा मझौले और बड़े उद्यमों की तरफ ले जाना है. 
 
इसको सफल करने हेतु दो प्रकार के लोगों के लिए रोजगार बढ़ाना जरूरी है. एक वह जो कृषि या अन्य पारंपरिक काम छोड़कर आ रहे हैं, जिन्हें औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं, पर हुनरमंद हैं. दूसरे वह जो शिक्षित हैं. नये रोजगारों से यह भी अपेक्षा है कि वह जाति, लिंग और धर्म पर आधारित विषमताएं दूर करें और पर्यावरण के विनाश को बढ़ावा न दें. 
 
रोजगार और वेतन से जुड़ी इन चुनौतियों का सामना करने के लिए रिपोर्ट में एक राष्ट्रीय रोजगार नीति बनाने का सुझाव है. इस नीति के अंतर्गत मनरेगा जैसे रोजगार गारंटी योजना को शहरों में लागू करना, कृषि में सार्वजनिक निवेश बढ़ाना, व्यापार-उद्योग नीतियों को रोजगार-केंद्रित बनाना, राज्यों में चल रहे प्रयोगों से सीखना, शामिल हो सकते हैं. 
 
साथ ही रिपोर्ट एक 'यूनिवर्सल बेसिक सर्विसेस' प्रोग्राम का सुझाव देती है, जिसके अंतर्गत स्वास्थ, शिक्षा, सुरक्षा, सार्वजनिक परिवहन इत्यादि सुविधाएं हर नागरिक को एक हक के रूप में मिलेंगी. इन सेवाओं को प्रदान करने में कई 'अच्छी' नौकरियों का सृजन होने की संभावना है.
 

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