Tribalpedia: औपनिवेशिक जनजातीय नीतियां... अलगाव से एकीकरण तक, कैसे बदली आदिवासी दुनिया?
ब्रिटिश नीतियों ने आदिवासी समाज और उसके भूगोल को गहराई से प्रभावित किया.
Scheduled Tracts से Excluded Areas तक, औपनिवेशिक प्रशासन ने आदिवासी भूभाग को अलग-अलग श्रेणियों में बांटा. इसके पीछे शासन की सुविधा थी या आदिवासी हित?
ब्रिटिश शासन के विस्तार के साथ भारत के उन इलाकों पर भी औपनिवेशिक नियंत्रण बढ़ा, जहां आदिवासी समुदाय लंबे समय से अपनी सामाजिक व्यवस्था, परंपराओं और संसाधनों के साथ अपेक्षाकृत स्वतंत्र जीवन जी रहे थे.
खासकर पूर्वी भारत और उत्तर-पूर्व के जनजातीय क्षेत्रों में अंग्रेजों के सामने सवाल था- इन इलाकों को अपने प्रशासन में कैसे शामिल किया जाए?
इसका जवाब समय के साथ बदलता गया.
ब्रिटिश नीति मोटे तौर पर अलगाव (Segregation/Isolation), आत्मसात्करण (Assimilation) और फिर प्रशासनिक एकीकरण (Integration) के अलग-अलग चरणों से गुजरी.
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पहले रास्ता था- अलग रखो
औपनिवेशिक शासन के शुरुआती दौर में कई जनजातीय क्षेत्रों को मुख्यधारा के प्रशासन से अलग रखने की नीति अपनाई गई. विचार यह था कि इन इलाकों को उपमहाद्वीप के बाकी हिस्सों से काफी हद तक अलग रखा जाए.
इसका अर्थ था- कम संपर्क, सीमित संचार और अलग प्रशासनिक व्यवस्था.
उत्तर-पूर्व भारत इसका प्रमुख उदाहरण बना.
बाद में Inner Line Permit जैसी व्यवस्थाओं के जरिए भी कुछ क्षेत्रों में बाहरी लोगों की आवाजाही को नियंत्रित किया गया.
इस नीति का एक परिणाम यह हुआ कि जनजातीय इलाकों और शेष भारत के बीच एक तरह की प्रशासनिक और सामाजिक दूरी बनी रही.
अलगाव का असर केवल प्रशासन तक सीमित नहीं था. इससे कई इलाकों में seclusion यानी अलगाव की भावना और कुछ परिस्थितियों में अलग पहचान की भावना भी मजबूत हुई.
फिर आया आत्मसात्करण का दौर
ब्रिटिश नीति का दूसरा पहलू था Assimilation यानी आत्मसात्करण.
इस दौर में मिशनरियों और ईसाई संस्थाओं की गतिविधियां भी बढ़ीं. दिए गए स्रोत के अनुसार, 1813 में खासी, 1845 में झारखंड के उरांव और 1880 में मध्य प्रदेश के भील क्षेत्रों में ईसाई मिशनरी गतिविधियों का उल्लेख मिलता है.
शिक्षा, धर्म और सामाजिक गतिविधियों के माध्यम से जनजातीय समाज के साथ नए प्रकार का संपर्क स्थापित हुआ.
यह प्रक्रिया केवल धार्मिक परिवर्तन तक सीमित नहीं थी.
औपनिवेशिक प्रशासन के लिए ईसाई बने आदिवासी समुदायों को प्रशासनिक ढांचे में शामिल करना अपेक्षाकृत आसान माना गया. स्रोत में इसकी तुलना Eurasians को प्रशासनिक व्यवस्था में समाहित करने से की गई है.
इस तरह धर्म, शिक्षा और प्रशासन- तीनों एक-दूसरे से जुड़ने लगे.
अलगाव से प्रशासनिक सुधार तक
समय के साथ ब्रिटिश सरकार को यह महसूस हुआ कि केवल अलग रखकर इन क्षेत्रों को नियंत्रित करना पर्याप्त नहीं है.
इसके बाद Integration और Reforms की दिशा में कदम बढ़े.
Government of India Act, 1870 के तहत Scheduled Tracts की अवधारणा सामने आई. इन क्षेत्रों में हिमालयी इलाकों के साथ असम, दार्जिलिंग, कुमाऊं, गढ़वाल और नीलगिरि जैसे क्षेत्र शामिल किए गए.
इसके बाद Scheduled Districts Act, 1874 आया.
आगे चलकर Government of India Act, 1919 में इन क्षेत्रों के लिए Backward Tracts जैसी प्रशासनिक श्रेणियां विकसित हुईं.
फिर Government of India Act, 1935 के तहत व्यवस्था और स्पष्ट हुई.
इसमें जनजातीय क्षेत्रों को Excluded Areas और Partially Excluded Areas जैसी श्रेणियों में बांटा गया.

इसका आदिवासी समाज पर क्या असर पड़ा?
इन नीतियों ने आदिवासी समाज को केवल प्रशासनिक रूप से नहीं बदला, बल्कि उसके सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों को भी प्रभावित किया.
एक तरफ अलगाव ने पारंपरिक संस्थाओं और जीवन-पद्धतियों को कुछ हद तक बाहरी हस्तक्षेप से बचाए रखा, तो दूसरी तरफ इसने मुख्यधारा से दूरी भी पैदा की.
वहीं आत्मसात्करण और प्रशासनिक एकीकरण ने मिशनरी शिक्षा, नए प्रशासनिक ढांचे और बाहरी संस्थाओं के लिए रास्ता खोला.
इसलिए औपनिवेशिक जनजातीय नीति को केवल ‘अलगाव’ या केवल ‘विकास’ की कहानी के रूप में देखना अधूरा होगा.
असल कहानी यह है कि ब्रिटिश शासन ने पहले जनजातीय क्षेत्रों को दूर रखा, फिर उन्हें अपने तरीके से बदलने की कोशिश की और अंततः विशेष प्रशासनिक व्यवस्थाओं के जरिए उन्हें औपनिवेशिक राज्य में समाहित किया.
यही नीतियां आगे चलकर स्वतंत्र भारत की जनजातीय प्रशासन, अनुसूचित क्षेत्रों और विशेष संवैधानिक सुरक्षा पर होने वाली बहसों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी बनीं.
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लेखक के बारे में
By अचल प्रियदर्शी
अचल प्रियदर्शी (Achal Priyadarshy) अंतरराष्ट्रीय संबंधों, इंडिक एवं इंडीजीनस अध्ययन के जानकार, शिक्षाविद् और 32 पुस्तकों के लेखक हैं.
उन्होंने केंद्रीय मंत्री के राजनीतिक सहायक के तौर पर काम किया है, तथा ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (TRI)- रांची और झारखंड सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग (DoFECC) के साथ भी कार्य किया है.
उन्होंने सैकड़ों UPSC अभ्यर्थियों का मार्गदर्शन किया है, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों व समसामयिक विषयों पर उनके विश्लेषणात्मक लेख नियमित रूप से UPSC-केंद्रित पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं.
साहित्य और जनजातीय इतिहास में उनके योगदान को मान्यता देते हुए उन्हें वर्ष 2025 में आयोजित जमशेदपुर लिटरेचर फेस्टिवल के उद्घाटन संस्करण में उनकी पुस्तक Tribal Bravehearts के लिए शब्द-शिल्पी सम्मान से सम्मानित किया गया. शैक्षणिक रूप से, उन्होंने हार्वर्ड डिविनिटी स्कूल से Religion, Peace and Conflict विषय में अध्ययन किया है.
ये उनकी कुछ लोकप्रिय किताबें हैं;
Pakistan State, Armed Influenconomy (प्रभात प्रकाशन) (2026)
बिहार जनादेश 2025 (प्रभात प्रकाशन) (2026)
International Relations: UPSC & State Civil Services Examinations (Oakbridge Publishing) (2026)
ब्रांड हेमंत (स्वतंत्र प्रकाशन) (2025)
झारखण्ड की जनजाति समाज और समय का संकट (प्रकाशन संसथान) (2026)
जनजातीय शूरवीर (प्रभात प्रकाशन) (2026)
Know Your State: Jharkhand (अरिहंत प्रकाशन) (2025)
उत्तर प्रदेश सामान्य ज्ञान (क्राउन पुब्लिकेशन्स) (2024)
बिहार सामान्य ज्ञान (उपकार प्रकाशन) (2024)
International Relations for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)
Internal Security & Disaster Management for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)
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