भारत छोड़ो आंदोलन -4: जब नेता जेल गए... लेकिन ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन सड़कों पर उतर आया!
August Offer से भारत छोड़ो आंदोलन तक: कैसे बढ़ता गया अविश्वास
ब्रिटिश सरकार को लगा था कि गांधी और कांग्रेस के बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन को रोका जा सकता है. लेकिन 9 अगस्त 1942 के बाद आंदोलन किसी एक नेता का नहीं रहा. वह सड़कों, कस्बों और गांवों तक फैल गया.
9 अगस्त की सुबह...
कांग्रेस के प्रस्ताव के अगले ही दिन ब्रिटिश सरकार ने कार्रवाई कर दी.
9 अगस्त 1942 की सुबह गांधी और कांग्रेस कार्यसमिति के दूसरे प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया.
अखिल भारतीय कांग्रेस समिति और प्रांतीय कांग्रेस समितियों पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया.
ब्रिटिश सरकार की रणनीति साफ थी-
अगर आंदोलन का नेतृत्व करने वाले नेता जेल में होंगे, तो आंदोलन को नियंत्रित करना आसान होगा.
लेकिन ब्रिटिश प्रशासन ने शायद जनता की प्रतिक्रिया का पूरा अनुमान नहीं लगाया था.
नेताओं की गिरफ्तारी के बाद आंदोलन खत्म होने के बजाय कई जगह और तेज हो गया.
भारत छोड़ो आंदोलन - 1: पहले भाग में बताया गया है कि कैसे ब्रिटेन ने आजादी के मुद्दे पर चुप्पी साधे रखते हुए भारत को दूसरे विश्व युद्ध में धकेल दिया.
नेतृत्व जेल में, आंदोलन सड़कों पर
गांधी और कांग्रेस के दूसरे बड़े नेता जेल में थे. इसलिए आंदोलन का कोई एक केंद्रीय संचालन तंत्र नहीं बचा.
इसके बावजूद देश के कई हिस्सों में लोग सड़कों पर उतर आए.
प्रदर्शन हुए.
सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं सामने आईं.
संचार व्यवस्था बाधित हुई.
कई जगहों पर रेल और तार व्यवस्था को निशाना बनाया गया.
कुछ क्षेत्रों में सरकारी मशीनरी लगभग ठप पड़ गई.
यानी आंदोलन का एक नया रूप सामने आया- नेताओं के बिना चलने वाला जन आंदोलन.
कांग्रेस नेतृत्व ने हिंसा की घटनाओं से खुद को अलग किया था. लेकिन उस समय के सरकारी विवरणों में बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ और हिंसा का उल्लेख मिलता है.
ब्रिटिश सरकार ने इसे गंभीर चुनौती के रूप में लिया और दमन शुरू कर दिया.

ब्रिटिश सरकार का जवाब: गिरफ्तारी और दमन
आंदोलन को दबाने के लिए बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां की गईं.
कई लोगों को जेल भेजा गया और सरकारी दमन तेज हुआ. स्रोत सामग्री के अनुसार, सैकड़ों लोग मारे गए और बड़ी संख्या में लोगों को जेल में डाल दिया गया.
ब्रिटिश सरकार की नीति स्पष्ट थी-
आंदोलन को दबाना और कांग्रेस नेतृत्व को तब तक हिरासत में रखना, जब तक वह अपने आंदोलन की दिशा बदलने का आश्वासन न दे.
लेकिन इस दमन से एक बड़ा बदलाव हो चुका था.
आंदोलन अब केवल कांग्रेस नेताओं की अपील पर निर्भर नहीं था.
भारत छोड़ो आंदोलन - 2: दूसरे भाग में बताया गया है कि कैसे कांग्रेस और ब्रिटिश सरकार के बीच गतिरोध को सुलझाने में क्रिप्स मिशन की विफलता ने भारत छोड़ो आंदोलन का रास्ता तैयार किया.
‘भारत छोड़ो’ आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता क्या थी?
भारत छोड़ो आंदोलन को समझने के लिए केवल 8 और 9 अगस्त की घटनाओं को देखना पर्याप्त नहीं है.
इस आंदोलन की खासियत यह थी कि केंद्रीय नेतृत्व की गिरफ्तारी के बावजूद विरोध की भावना देश के अलग-अलग हिस्सों में फैलती रही.
यह उस समय के राजनीतिक माहौल में एक महत्वपूर्ण बदलाव था.
ब्रिटिश सरकार के लिए चुनौती केवल गांधी या कांग्रेस नहीं रह गई थी. चुनौती यह थी कि जनता के भीतर स्वतंत्रता की मांग कितनी गहराई तक पहुंच चुकी थी.
युद्धकालीन संकट, क्रिप्स मिशन की विफलता, ब्रिटिश शासन के प्रति बढ़ती निराशा और तत्काल स्वतंत्रता की मांग- इन सबने मिलकर अगस्त 1942 के विस्फोट को जन्म दिया.

भारत छोड़ो आंदोलन - 3: तीसरे भाग में 8 अगस्त, 1942 की घटनाओं का विवरण है... भारत छोड़ो प्रस्ताव की पूरी कहानी.
इसी बीच मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग को आगे बढ़ाया
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भारतीय राजनीति का एक दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष भी सामने आ रहा था.
कांग्रेस के नेताओं की गिरफ्तारी और ब्रिटिश सरकार के साथ उसके टकराव के बीच मुस्लिम लीग ने अपनी अलग राजनीतिक दिशा बनाए रखी.
स्रोत सामग्री के अनुसार, 23 मार्च 1943 को मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान दिवस मनाया. मोहम्मद अली जिन्ना ने मुस्लिम आबादी के लिए पाकिस्तान की मांग को अंतिम राष्ट्रीय लक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया. 26 अप्रैल को लीग के एक प्रस्ताव में भी इस दृष्टिकोण का समर्थन किया गया.
इस तरह 1942-43 का दौर केवल अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष का दौर नहीं था.
यह भारतीय राजनीति के भीतर अलग-अलग राजनीतिक कल्पनाओं के मजबूत होने का समय भी था.
एक तरफ कांग्रेस तत्काल ब्रिटिश शासन की समाप्ति चाहती थी. दूसरी तरफ मुस्लिम लीग पाकिस्तान को अपने राजनीतिक भविष्य के केंद्र में रख रही थी.
अगस्त क्रांति ने क्या बदला?
भारत छोड़ो आंदोलन तत्काल स्वतंत्रता नहीं दिला सका. ब्रिटिश सरकार ने इसे कठोर दमन से दबा दिया और कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व लंबे समय तक जेल में रहा.
लेकिन आंदोलन ने एक राजनीतिक संदेश जरूर स्पष्ट कर दिया-
ब्रिटिश शासन अब भारतीय जनता की स्थायी स्वीकृति पर नहीं चल सकता था.
1942 के बाद स्वतंत्रता का सवाल केवल भविष्य की संवैधानिक योजना नहीं रहा. वह तत्काल राजनीतिक मांग बन चुका था.
और शायद यही अगस्त क्रांति की सबसे बड़ी ऐतिहासिक विरासत थी.
8 अगस्त को प्रस्ताव पारित हुआ. 9 अगस्त को नेता गिरफ्तार हुए. लेकिन आंदोलन जेल की सलाखों के पीछे नहीं रुका- वह सड़कों पर फैल गया.
इसीलिए भारत छोड़ो आंदोलन की कहानी केवल एक प्रस्ताव, एक नारे या कुछ दिनों के विरोध की कहानी नहीं है.
यह उस क्षण की कहानी है जब नेतृत्व को गिरफ्तार किया जा सकता था, लेकिन स्वतंत्रता की मांग को नहीं.
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लेखक के बारे में
By अचल प्रियदर्शी
अचल प्रियदर्शी (Achal Priyadarshy) अंतरराष्ट्रीय संबंधों, इंडिक एवं इंडीजीनस अध्ययन के जानकार, शिक्षाविद् और 32 पुस्तकों के लेखक हैं.
उन्होंने केंद्रीय मंत्री के राजनीतिक सहायक के तौर पर काम किया है, तथा ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (TRI)- रांची और झारखंड सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग (DoFECC) के साथ भी कार्य किया है.
उन्होंने सैकड़ों UPSC अभ्यर्थियों का मार्गदर्शन किया है, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों व समसामयिक विषयों पर उनके विश्लेषणात्मक लेख नियमित रूप से UPSC-केंद्रित पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं.
साहित्य और जनजातीय इतिहास में उनके योगदान को मान्यता देते हुए उन्हें वर्ष 2025 में आयोजित जमशेदपुर लिटरेचर फेस्टिवल के उद्घाटन संस्करण में उनकी पुस्तक Tribal Bravehearts के लिए शब्द-शिल्पी सम्मान से सम्मानित किया गया. शैक्षणिक रूप से, उन्होंने हार्वर्ड डिविनिटी स्कूल से Religion, Peace and Conflict विषय में अध्ययन किया है.
ये उनकी कुछ लोकप्रिय किताबें हैं;
Pakistan State, Armed Influenconomy (प्रभात प्रकाशन) (2026)
बिहार जनादेश 2025 (प्रभात प्रकाशन) (2026)
International Relations: UPSC & State Civil Services Examinations (Oakbridge Publishing) (2026)
ब्रांड हेमंत (स्वतंत्र प्रकाशन) (2025)
झारखण्ड की जनजाति समाज और समय का संकट (प्रकाशन संसथान) (2026)
जनजातीय शूरवीर (प्रभात प्रकाशन) (2026)
Know Your State: Jharkhand (अरिहंत प्रकाशन) (2025)
उत्तर प्रदेश सामान्य ज्ञान (क्राउन पुब्लिकेशन्स) (2024)
बिहार सामान्य ज्ञान (उपकार प्रकाशन) (2024)
International Relations for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)
Internal Security & Disaster Management for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)
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