भारत छोड़ो आंदोलन -3: 8 अगस्त 1942 को क्या-क्या हुआ... Quit India Resolution की पूरी कहानी
August Offer से भारत छोड़ो आंदोलन तक: कैसे बढ़ता गया अविश्वास
8 अगस्त 1942 को बंबई से निकला ‘भारत छोड़ो’ का संदेश अगले ही दिन गिरफ्तारियों के बीच पूरे देश में फैलने लगा. गांधी जेल में थे, कांग्रेस का नेतृत्व जेल में था, लेकिन सड़कों पर आंदोलन जारी था. यही था अगस्त क्रांति का असली चरित्र.
8 अगस्त 1942 की शाम बंबई में कांग्रेस की बैठक खत्म हुई.
माहौल में बेचैनी थी, लेकिन उससे कहीं ज्यादा एक फैसले की दृढ़ता थी.
Mahatma Gandhi ने ब्रिटिश हुकूमत के सामने अब तक का सबसे साफ संदेश रख दिया था- अब भारत में अंग्रेजी राज नहीं चल सकता.
उस रात शायद किसी को अंदाजा नहीं था कि अगली सुबह क्या होने वाला है.
9 अगस्त की सुबह सूरज निकला तो...
गांधी और कांग्रेस के लगभग सभी बड़े नेता जेल पहुंच चुके थे.
ब्रिटिश सरकार ने एक ही झटके में आंदोलन का पूरा नेतृत्व अपने कब्जे में ले लिया था. उसका अनुमान सीधा था- नेता नहीं होंगे, तो आंदोलन भी नहीं होगा.
लेकिन इतिहास ने इस बार दूसरी राह चुनी.
नेताओं को जेल में डालते ही आंदोलन जैसे किसी एक मंच से उतरकर सड़कों पर फैल गया. अब उसके पास कोई एक चेहरा नहीं था, कोई एक दफ्तर नहीं था, कोई एक आदेश नहीं था. लेकिन उसके पास हजारों-लाखों लोगों का गुस्सा था.
कहीं जुलूस निकले, कहीं सरकारी दफ्तरों के सामने भीड़ जमा हुई, कहीं संचार व्यवस्था को बाधित किया गया. कई इलाकों में सरकारी मशीनरी की पकड़ ढीली पड़ने लगी.
ब्रिटिश हुकूमत ने जिस गिरफ्तारी को आंदोलन का अंत समझा था, वही गिरफ्तारी उसके विस्तार की शुरुआत बन गई.
यही वह दौर था, जिसे इतिहास ने बाद में अगस्त क्रांति के नाम से याद किया.
लेकिन 9 अगस्त की सुबह अचानक नहीं आई थी.
इसके पीछे महीनों से जमा हो रही बेचैनी थी...
क्रिप्स मिशन की विफलता, युद्ध का बढ़ता खतरा, अंग्रेजी शासन से गहरी होती निराशा और यह सवाल कि आखिर भारत को अपनी स्वतंत्रता के लिए और कितना इंतजार करना होगा.
Cripps Mission की नाकामी के बाद बढ़ी निराशा
1942 की शुरुआत तक भारत की राजनीति पर द्वितीय विश्वयुद्ध का गहरा असर पड़ चुका था.
जापानी सेना तेजी से दक्षिण-पूर्व एशिया में आगे बढ़ रही थी और भारत की सीमाओं तक युद्ध का खतरा पहुंचने लगा था.
ब्रिटिश सरकार ने भारतीय नेताओं का समर्थन हासिल करने के लिए क्रिप्स मिशन भेजा, लेकिन उसके प्रस्ताव कांग्रेस को स्वीकार नहीं हुए.
मिशन की विफलता के बाद राजनीतिक निराशा और गहरी हो गई.
कांग्रेस के सामने भी अब यह सवाल था कि वह कितने समय तक केवल मांगों और प्रस्तावों तक सीमित रह सकती है.
गांधी का रुख भी बदल रहा था.
अब अंग्रेजों की ‘व्यवस्थित वापसी’ जरूरी है: गांधी
अप्रैल 1942 के अंत में गांधी ने अंग्रेजों से भारत छोड़ने की मांग को अधिक स्पष्ट रूप से सामने रखना शुरू किया.
उनका तर्क था कि भारत में ब्रिटिश सत्ता की मौजूदगी ही जापान के लिए भारत पर हमला करने का एक कारण बन रही है.
गांधी के अनुसार, अगर अंग्रेज भारत से चले जाएं तो यह खतरा कम हो सकता है.
मई 1942 में Harijan में उन्होंने लिखा कि भारत में ब्रिटिश उपस्थिति जापान को भारत पर हमला करने के लिए आकर्षित करती है.
गांधी की सोच केवल सत्ता हस्तांतरण की मांग तक सीमित नहीं थी.
वह चाहते थे कि अंग्रेज भारत से व्यवस्थित और समय रहते वापस जाएं.
इसी विचार के आसपास धीरे-धीरे एक नया राजनीतिक नारा आकार लेने लगा—
‘Quit India’ यानी ‘भारत छोड़ो’.
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कांग्रेस ने भी तय कर लिया- अब पीछे नहीं हटेंगे
14 जुलाई 1942 को कांग्रेस कार्यसमिति ने ब्रिटिश शासन की समाप्ति की मांग करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया.
प्रस्ताव में कहा गया कि अगर ब्रिटिश सरकार इस अपील को स्वीकार नहीं करती, तो कांग्रेस राजनीतिक अधिकारों और स्वतंत्रता के लिए अपने अहिंसक आंदोलन की ताकत का इस्तेमाल करने को मजबूर होगी.
यह महत्वपूर्ण था.
1920 के बाद से कांग्रेस ने कई जन आंदोलनों का नेतृत्व किया था, लेकिन 1942 में परिस्थितियां अलग थीं.
विश्वयुद्ध चल रहा था, जापान भारत के करीब पहुंच चुका था और ब्रिटिश सरकार भारतीयों को सत्ता में निर्णायक हिस्सेदारी देने के लिए तैयार नहीं थी.
अब कांग्रेस के सामने सवाल था-
क्या अंग्रेजी शासन के खिलाफ अंतिम और निर्णायक संघर्ष शुरू किया जाए?
जवाब जल्द मिलने वाला था.
8 अगस्त 1942: ‘Quit India Resolution’
8 अगस्त 1942 को बंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (AICC) की बैठक हुई.
कांग्रेस ने कार्यसमिति के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी.
प्रस्ताव में कहा गया कि भारत में ब्रिटिश शासन का तत्काल अंत जरूरी है.
यह केवल भारत के लिए नहीं, बल्कि मित्र राष्ट्रों (Allied Powers) के युद्ध प्रयास के लिए भी जरूरी बताया गया.
यहीं से भारत छोड़ो आंदोलन ने औपचारिक राजनीतिक रूप ले लिया.

Mahatma Gandhi ने इसी अवसर पर वह संदेश दिया, जो आने वाले दिनों में पूरे देश में आंदोलन का प्रतीक बन गया-
करो या मरो (Do or Die).
यह केवल एक नारा नहीं था.
यह उस समय की राजनीतिक बेचैनी का संक्षिप्त रूप बन गया था.
8 अगस्त की शाम कांग्रेस ने फैसला सुनाया था.
9 अगस्त की सुबह जनता ने उसका जवाब देना शुरू कर दिया...
8 अगस्त 1942 को कांग्रेस ने भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित किया और अगली ही सुबह गांधी समेत शीर्ष नेतृत्व गिरफ्तार कर लिया गया. लेकिन गिरफ्तारियों के साथ आंदोलन खत्म नहीं हुआ. कई इलाकों में जनता ने खुद प्रतिरोध की कमान संभाल ली.
पढ़ें अगली स्टोरी में...
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लेखक के बारे में
By अचल प्रियदर्शी
अचल प्रियदर्शी (Achal Priyadarshy) अंतरराष्ट्रीय संबंधों, इंडिक एवं इंडीजीनस अध्ययन के जानकार, शिक्षाविद् और 32 पुस्तकों के लेखक हैं.
उन्होंने केंद्रीय मंत्री के राजनीतिक सहायक के तौर पर काम किया है, तथा ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (TRI)- रांची और झारखंड सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग (DoFECC) के साथ भी कार्य किया है.
उन्होंने सैकड़ों UPSC अभ्यर्थियों का मार्गदर्शन किया है, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों व समसामयिक विषयों पर उनके विश्लेषणात्मक लेख नियमित रूप से UPSC-केंद्रित पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं.
साहित्य और जनजातीय इतिहास में उनके योगदान को मान्यता देते हुए उन्हें वर्ष 2025 में आयोजित जमशेदपुर लिटरेचर फेस्टिवल के उद्घाटन संस्करण में उनकी पुस्तक Tribal Bravehearts के लिए शब्द-शिल्पी सम्मान से सम्मानित किया गया. शैक्षणिक रूप से, उन्होंने हार्वर्ड डिविनिटी स्कूल से Religion, Peace and Conflict विषय में अध्ययन किया है.
ये उनकी कुछ लोकप्रिय किताबें हैं;
Pakistan State, Armed Influenconomy (प्रभात प्रकाशन) (2026)
बिहार जनादेश 2025 (प्रभात प्रकाशन) (2026)
International Relations: UPSC & State Civil Services Examinations (Oakbridge Publishing) (2026)
ब्रांड हेमंत (स्वतंत्र प्रकाशन) (2025)
झारखण्ड की जनजाति समाज और समय का संकट (प्रकाशन संसथान) (2026)
जनजातीय शूरवीर (प्रभात प्रकाशन) (2026)
Know Your State: Jharkhand (अरिहंत प्रकाशन) (2025)
उत्तर प्रदेश सामान्य ज्ञान (क्राउन पुब्लिकेशन्स) (2024)
बिहार सामान्य ज्ञान (उपकार प्रकाशन) (2024)
International Relations for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)
Internal Security & Disaster Management for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)
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