सोमनाथ चटर्जी को उनके गढ़ में हराने वाली कौन थी वह महिला? जानें 1984 के उस लोकसभा चुनाव का किस्सा

Published by : Amitabh Kumar Updated At : 13 Aug 2024 10:16 AM

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Somnath Chatterjee Death Anniversary: सोमनाथ चटर्जी की आज पुण्यतिथि है. इस अवसर पर जानें उनसे जुड़ी खास बातें, खासकर 1984 के लोकसभा चुनाव का वह खास किस्सा

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Somnath Chatterjee Death Anniversary: सोमनाथ चटर्जी (25 जुलाई 1929 – 13 अगस्त 2018) एक जाने माने राजनीतिज्ञ थे, जिनकी आज पुण्यतिथि है. यूं तो उनके जीवन से जुड़ी कई बातें हैं जिनकी चर्चा होती है लेकिन 1984 में जो बंगाल की राजनीति में चटर्जी के साथ हुआ उसे कभी नहीं भुलाया जा सकता है. तो आइए आपको बताते हैं कि आखिर ऐसा क्या हुआ था अस्सी के दशक में…

दरअसल, 1984 में देश में लोकसभा का चुनाव होना था. कांग्रेस नेता राजीव गांधी को नए चेहरे की तलाश थी जो पश्चिम बंगाल की जादवपुर सीट के लिए से लड़े. यह वह सीट थी जहां से माकपा के दिग्गत नेता सोमनाथ चटर्जी को हराना काफी मुश्किल था. यह वाम का गढ़ था जहां से कांग्रेस का कोई भी दिग्गज चुनावी मैदान में नहीं उतरना चाहता था. बंगाल कांग्रेस का कोई भी नेता सोमनाथ चटर्जी के खिलाफ खड़ा नहीं होना चाहता था. कांग्रेस नेता सुब्रत मुखर्जी ने प्रदीप घोष और सुशोवन बनर्जी से इस संबंध में बात की, लेकिन हार निश्चित थी, यह सोचकर उन्होंने साफ इनकार कर दिया.

सोमनाथ चटर्जी को किसने दी टक्कर ?

सुब्रत मुखर्जी को एक ऐसे नेता की तलाश थी जो सोमनाथ चटर्जी को जादवपुर सीट से टक्कर दे. उनके पास एक ऑपशन था ममता बनर्जी, जो वर्तमान में पश्चिम बंगाल की सीएम हैं. ममता बनर्जी को सक्रिय राजनीति में लाने में सुब्रत की अहम भूमिका रही है. उन्होंने दिल्ली शीर्ष नेतृत्व को ममता का नाम सुझाया. तत्कालीन केंद्रीय मंत्री प्रणब मुखर्जी से इस बाबत उन्होंने फोन पर बात भी की. कलकत्ता में हुई कांग्रेस कमिटी की एक बैठक में ममता को अहम जिम्मेदारी सौंपी गई थी. राजीव गांधी भी इस बैठक में शिरकत करने पहुंचे थे. सुब्रत के याद दिलाने के बाद प्रणब मुखर्जी ने हामी भरी और राजीव गांधी के आगे ममता का नाम सुझाया. यही ममता बनर्जी के जीवन का टर्निंग पॉवाइंट रहा.

कैसे सोमनाथ चटर्जी को वाम के गढ़ में ममता ने कैसे दी टक्कर ?

वाम के गढ़ में ममता बनर्जी की लड़ाई दिग्गज वाम नेता से थी. इसी वजह से मुकाबला रोचक था. ममता ने खूब मेहनत की. जनता को अपने भाषणों से लुभाया. यही नहीं ममता बनर्जी खुद से ही अपना पोस्टर तैयार करतीं और रात में दीवारों पर चिपकातीं. ये एंटी-लेफ्ट पोस्टर्स होते थे जिसे सुबह में कम्युनिस्ट कार्यकर्ता फाड़ देते. अगली सुबह फिर से वहां दूसरे पोस्टर्स ममता के समर्थन में नजर आने लगते थे. ममता फिर पोस्टर तैयार कर चिपकवाती थीं.

सोमनाथ चटर्जी किससे हारे चुनाव ?

ममता बनर्जी हर क्षेत्र में प्रचार कर रहीं थीं. कबीरतीर्थ कंस्टीच्यूएंसी को लेकर सोमनाथ चटर्जी की चिंता बनी हुई थी. इसकी वजह वहां हिंदू-मुस्लिम आबादी का 50-50 प्रतिशत होना था. हिंदू-मुस्लिम वोटर्स के बीच वो यहां एक बैठक सोमनाथ करना चाहते थे. निर्मल रे के सामने उन्होंने प्रस्ताव भी रखा था, पर उन्हें समझाया गया कि इस क्षेत्र में कोई दिक्कत नहीं है. चुनाव परिणाम आए तो सोमनाथ का डर सही साबित हुआ. कबीरतीर्थ में खराब प्रदर्शन के कारण वो जादवपुर सीट से चुनाव हार गए. इसी जीत के साथ ममता बनर्जी भारतीय राजनीति में उभरीं. यही नहीं ममता बनर्जी का नाम सबसे कम उम्र में सांसद बननेवाली नेताओं में शामिल हो चुका था.

किस वजह से सोमनाथ चटर्जी रहे चर्चा में ?

1. बीजेपी के नेतृत्व वाले NDA ने 2004 में 14वीं लोकसभा के अध्यक्ष के रूप में सोमनाथ चटर्जी का समर्थन किया था जबकि वह सीपीएम से आते थे.
2. सोमनाथ चटर्जी सबसे लंबे समय तक सांसद रहने वाले नेताओं की लिस्ट में शामिल हैं. वह 1971 से 2009 तक 10 बार लोकसभा सांसद रहे. इस दौरान केवल एक बार 1984 के चुनाव में वे ममता बनर्जी से हार गए थे.
3. 2008 में उनकी पार्टी CPM ने उन्हें निष्कासित कर दिया गया था. वजह यह थी कि सीपीएम ने यूपीए गठबंधन से अपना समर्थन वापस ले लिया था जबकि चटर्जी ने स्पीकर के पद से इस्तीफा देने से मना कर दिया था.


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अमिताभ कुमार झारखंड की राजधानी रांची के रहने वाले हैं और पिछले कई वर्षों से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय हैं. डिजिटल न्यूज में अच्छी पकड़ है और तेजी के साथ सटीक व भरोसेमंद खबरें लिखने के लिए जाने जाते हैं. वर्तमान में अमिताभ प्रभात खबर डिजिटल में नेशनल और वर्ल्ड न्यूज पर फोकस करते हैं और तथ्यों पर आधारित खबरों को प्राथमिकता देते हैं. हरे-भरे झारखंड की मिट्टी से जुड़े अमिताभ ने अपनी शुरुआती पढ़ाई जिला स्कूल रांची से पूरी की और फिर Ranchi University से ग्रेजुएशन के साथ पत्रकारिता की पढ़ाई की. पढ़ाई के दौरान ही साल 2011 में रांची में आयोजित नेशनल गेम को कवर करने का मौका मिला, जिसने पत्रकारिता के प्रति जुनून को और मजबूत किया.1 अप्रैल 2011 से प्रभात खबर से जुड़े और शुरुआत से ही डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय रहे. खबरों को आसान, रोचक और आम लोगों की भाषा में पेश करना इनकी खासियत है. डिजिटल के साथ-साथ प्रिंट के लिए भी कई अहम रिपोर्ट कीं. खासकर ‘पंचायतनामा’ के लिए गांवों में जाकर की गई ग्रामीण रिपोर्टिंग करियर का यादगार अनुभव है. प्रभात खबर से जुड़ने के बाद कई बड़े चुनाव कवर करने का अनुभव मिला. 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव के साथ-साथ झारखंड विधानसभा चुनावों (2014, 2019 और 2024) की भी ग्राउंड रिपोर्टिंग की है. चुनावी माहौल, जनता के मुद्दे और राजनीतिक हलचल को करीब से समझना रिपोर्टिंग की खास पहचान रही है.

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