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कांग्रेस में हो गया 'खेला': कीर्ति आजाद - अशोक तंवर टीएमसी में शामिल, ममता बनर्जी की मौजूदगी में लेंगे सदस्यता

संभावना यह भी जताई जा रही है कि इस समय पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी की सुप्रीमो ममता बनर्जी दिल्ली में मौजूद हैं, तो ये दोनों कांग्रेसी नेता उनकी मौजूदगी के दौरान मंगलवार को ही टीएमसी की प्राथमिक सदस्यता ग्रहण करेंगे.

By Prabhat khabar Digital
Updated Date
अशोक तंवर और कीर्ति झा आजाद.
अशोक तंवर और कीर्ति झा आजाद.
फोटो : ट्विटर.

नई दिल्ली : देश की सबसे बड़ी और पुरानी पार्टी कांग्रेस को एक बड़ा झटका लगने वाला है. खबर है कि राहुल गांधी के करीबी और पूर्व सांसद अशोक तंवर कांग्रेस को छोड़कर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का दामन थामेंगे. इसके साथ ही, खबर यह भी है कि क्रिकेटर से राजनेता बने संयुक्त बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री भागवत झा आजाद के बेटे कीर्ति आजाद भी टीएमसी में शामिल होंगे. यह दूसरी बार होगा, जब कीर्ति आजाद पार्टी छोड़कर किसी दूसरी पार्टी का हाथ थामेंगे. इसके पहले, उन्होंने भाजपा को छोड़कर कांग्रेस का हाथ थाम था.

सूत्रों के हवाले से समाचार एजेंसी एएनआई ने ट्वीटकर इस बात की जानकारी दी है कि राहुल गांधी के सबसे करीबी नेता और पूर्व कांग्रेसी सांसद अशोक तंवर टीएमसी में शामिल होंगे. इससे पहले, समाचार एजेंसी ने इस बात की भी जानकारी दी कि बिहार से कांग्रेस के नेता और पूर्व क्रिकेटर कीर्ति आजाद टीएमसी की सदस्यता ग्रहण करेंगे.

मीडिया की खबरों में संभावना यह भी जताई जा रही है कि इस समय पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी की सुप्रीमो ममता बनर्जी दिल्ली में मौजूद हैं, तो ये दोनों कांग्रेसी नेता उनकी मौजूदगी के दौरान मंगलवार को ही टीएमसी की प्राथमिक सदस्यता ग्रहण करेंगे. हालांकि, इस बात की अभी तक पुष्टि नहीं हो पाई है कि कांग्रेस के ये दोनों दिग्गज नेता किस कारण से पार्टी छोड़कर टीएमसी का दामन थामने जा रहे हैं.

मीडिया में और राजनीतिक विश्लेषकों द्वारा कयास यह लगाया जा रहा है कि अभी न तो बिहार में और न ही दिल्ली में कोई चुनाव होने वाले हैं, तो आखिर ये दोनों कांग्रेसी नेता को टीएमसी में शामिल होने का फायदा क्या मिलेगा? इसके साथ ही, चर्चा इस बात की भी की जा रही है कि पश्चिम बंगाल चुनाव के दौरान अगर ये दोनों टीएमसी में शामिल होते, तो उसका कुछ लाभ इन्हें जरूर मिलता.

इसके साथ ही, चर्चा इस बात की भी की जा रही है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी सुप्रीमो निकट भविष्य की रणनीति के तहत इन दोनों नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल नहीं कर रही हैं, बल्कि उन्होंने 2024 के आम चुनाव को लक्ष्य करके अपनी रणनीति के तहत यह कदम उठाया है. पश्चिम बंगाल चुनाव के दौरान उन्होंने 'खेला होबे' का नारा दिया था, जिसका परिणाम दिखाई दिया. राज्य विधानसभा चुनाव के बाद भी वे लगातार 'खेला होबे'-'खेला होबे' कह रही हैं.

इसके साथ ही, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान प्रबल प्रतिद्वंद्वी पार्टी भाजपा पर उन्होंने निशाना तो साधा ही है, इस चुनाव के बाद भी वे केंद्र की मोदी सरकार और खुद प्रधानमंत्री मोदी के साथ शुरू हुए टकराव को शांत करने के मूड में दिखाई नहीं दे रही हैं. इसी का नतीजा है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से अभी हाल ही के महीनों में बंगाल में सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) का अधिकार क्षेत्र बढ़ाए जाने के खिलाफ उन्होंने बंगाल विधानसभा में प्रस्ताव पारित कराया है.

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