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सरकार का अल्पमत में आने पर विपक्ष करता है शक्ति परीक्षण का दावा, आप जानते हैं कि क्या होता है फ्लोर टेस्ट

केंद्र या राज्य में सरकार का अल्पमत में आने पर अविश्वास प्रस्ताव के जरिए विपक्ष सदन में शक्ति परीक्षण करने की मांग करता है. विपक्ष की मांग पर राज्यपाल या राष्ट्रपति सरकार को बहुमत साबित करने के लिए सदन में शक्ति परीक्षण करने का आदेश देते हैं.

By Prabhat khabar Digital
Updated Date
सदन में हासिल किया जाता है विश्वास मत
सदन में हासिल किया जाता है विश्वास मत
प्रतीकात्मक फोटो

नई दिल्ली : महाराष्ट्र में राजनीतिक संकट के बीच तथाकथित तौर पर शिवसेना नीत महा विकास अघाड़ी (एमवीए) सरकार अल्पमत में आ गई है. शिवसेना के बागी नेता एकनाथ शिंदे का दावा है कि उनके खेमे में 40 से 50 विधायकों के आ जाने से एमवीए सरकार अल्पमत में आ गई है. एकनाथ शिंदे के इस दावे के बाद महाराष्ट्र में प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा ने मंगलवार की देर रात राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के सामने एमवीए सरकार के खिलाफ शक्ति परीक्षण या फिर फ्लोर टेस्ट कराने का दावा कर दिया. अब हर किसी के मन में यह सवाल पैदा होता होगा कि सरकार के अल्पमत में आते ही शक्ति परीक्षण या फ्लोर टेस्ट क्यों और कैसे कराया जाता है? आखिर, यह फ्लोर टेस्ट या शक्ति परीक्षण क्या होता है? आइए, हम जानते हैं इस फ्लोर टेस्ट के बारे में...

क्या होता है फ्लोर टेस्ट

अंग्रेजी के फ्लोर टेस्ट को हिंदी में विश्वास मत, अविश्वास मत या शक्ति परीक्षण कहा जाता है. इस फ्लोर टेस्ट के जरिए सत्तासीन दल को विधानसभा या लोकसभा में यह साबित करना होता है कि उसके पास बहुमत है. वहीं, विपक्ष यह साबित करता है कि सरकार के पास बहुमत नहीं है या फिर वह अल्पमत में है. बहुमत और अल्पमत साबित करने के लिए सत्तापक्ष और विपक्ष के पास विधायकों या सांसदों का समर्थन होना आवश्यक है. विधायकों और सांसदों की संख्या के आधार पर ही बहुमत और अल्पमत तय किया जाता है. चूंकि, इसमें विधायकों-सांसदों की संख्याबल अहम होता है, इसीलिए इसे शक्ति परीक्षण कहा जाता है. वहीं, यदि आवश्यक संख्या के मुताबिक विधायक अथवा सांसद सत्तासीन दल के पक्ष में अपना समर्थन जाहिर करते हैं, तो उसे विश्वासमत कहा जाता है और वहीं अगर सांसद अथवा विधायक सत्तापक्ष के खिलाफ अपना मत जाहिर करते हैं तो इसे अविश्वास मत कहा जाता है. इसके साथ ही, सदन में शक्ति परीक्षण या विश्वासमत हासिल करने के लिए विपक्ष की ओर से राज्यपाल या राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्ताव पेश किया जाता है, तो उसे अविश्वास प्रस्ताव कहा जाता है. अब अगर मामला किसी राज्य का है, तो सत्तापक्ष विधानसभा में शक्ति परीक्षण का सामना करेगा. वहीं, मामला अगर केंद्र सरकार के खिलाफ है, तो सत्तापक्ष लोकसभा में विश्वासमत साबित करेगा.

कौन कराता है फ्लोर टेस्ट

फ्लोर टेस्ट या शक्ति परीक्षण विधानसभा या लोकसभा के सभापति द्वारा कराया जाता है. इसमें राज्यपाल या राष्ट्रपति का सीधे तौर पर कोई हस्तक्षेप नहीं होता. किसी राज्य का विपक्षी दल सत्तासीन पार्टी के खिलाफ राज्यपाल के पास सरकार के अल्पमत में आने का दावा करते हुए अविश्वास प्रस्ताव के जरिए शक्ति परीक्षण कराने की मांग करता है, तो राज्यपाल इसके लिए केवल आदेश पारित करते हैं. राज्यपाल के आदेश के बाद विधानसभा के अध्यक्ष सदन में शक्ति परीक्षण कराते हैं. वहीं, अगर केंद्र सरकार के खिलाफ अल्पमत का दावा करते हुए अविश्वास प्रस्ताव के जरिए राष्ट्रपति से शक्ति परीक्षण की मांग की जाती है, तो राष्ट्रपति इसके लिए राज्यपाल की ही तरह केवल आदेश पारित करते हैं. लोकसभा के अध्यक्ष सत्तापक्ष से सदन में बहुमत साबित कराने की प्रक्रिया पूरी करते हैं. अगर शक्ति परीक्षण के समय लोकसभा या विधानसभा में स्पीकर नहीं बनाए गए होते हैं, तो सदन का विशेष सत्र बुलाने से पहले प्रोटेम स्पीकर की नियुक्ति की जाती है और फिर वही सदन में शक्ति परीक्षण की प्रक्रिया को पूरी कराते हैं.

कैसे किया जाता है फैसला

फ्लोर टेस्ट की पूरी प्रक्रिया पारदर्शी होती है. इसकी प्रक्रिया स्पीकर या प्रोटेम स्पीकर की निगरानी में पूरी की जाती है. विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव पर स्पीकर या प्रोटेम स्पीकर सांसदों अथवा विधायकों का मतदान कराते हैं. यह मतदान ध्वनिमत के जरिए कराया जाता है. जो सांसद या विधायक सरकार के समर्थन में होते हैं, वे स्पीकर या प्रोटेम स्पीकर के सवाल 'हां' में जवाब देते हैं. वहीं, जो सरकार के खिलाफ होते हैं, वे 'नहीं' बोलकर जवाब देते हैं. कई बार लोकसभा में इलेक्ट्रॉनिक मशीन के जरिए भी मतदान कराया जाता है, जिसका डिस्प्ले इलेक्ट्रॉनिक बोर्ड पर होता है. ध्वनिमत से मतदान कराने से पहले सदन में कोरम बेल बजाया जाता है. कोरम बेल के बाद सांसदों अथवा विधायकों को सत्तापक्ष और विपक्ष में बंटने को कहा जाता है. इसके तहत सरकार के विरोध में खड़े सांसद अथवा विधायक सदन में बनी 'नहीं' वाली लॉबी में चले जाते हैं. वहीं, सरकार के समर्थन वाले सांसद अथवा विधायक 'हां' लॉबी में चले जाते हैं. इसके बाद सांसदों और विधायकों की संख्या की गितनी की जाती है और फिर इसके आधार पर स्पीकर या प्रोटेम स्पीकर मतदान के नतीजों की घोषणा करते हैं. अगर सरकार के पास विश्वासमत हासिल करने के लिए आवश्यक जादुई आंकड़े प्राप्त हो जाते हैं, तो सरकार बच जाती है और नहीं तो संख्या के अभाव में सरकार गिर जाती है.

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