नेहरू ने देश पर थोपा ‘राजद्रोह कानून’, पत्रकार रामबहादुर राय की पुस्तक में दावा

Updated at : 08 Dec 2021 9:21 PM (IST)
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नेहरू ने देश पर थोपा ‘राजद्रोह कानून’, पत्रकार रामबहादुर राय की पुस्तक में दावा

रामबहादुर राय का दावा है कि यह पुस्तक भारतीय संविधान के ‘ऐतिहासिक सच, तथ्य, कथ्य और यथार्थ की कौतूहलता का सजीव चित्रण’ करती है.

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नयी दिल्ली: देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने देश पर ‘राजद्रोह कानून’ थोपा था. ऐसा उन्होंने सत्ता में बने रहने के लिए किया था. यह दावा किया है देश के वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय ने. देश की स्वतंत्रता के बाद से ही आम लोगों से लेकर न्यायपालिका तक बहस का विषय रहे ‘राजद्रोह कानून’ (Sedition Law) के बारे में श्री राय का दावा है कि नेहरू ने देश के पहले संसदीय चुनाव से पहले ही ‘सत्ता की राजनीति’ की बाध्यताओं के कारण एक ‘असंवैधानिक’ संविधान संशोधन के जरिये इसे देश में फिर लागू कर दिया था.

‘रहबरी के सवाल’ सहित कई पुस्तकों के लेखक व इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय ने अपनी नयी पुस्तक ‘भारतीय संविधान: अनकही कहानी’ में यह दावा किया है. रामबहादुर राय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की छात्र शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय सचिव भी रह चुके हैं. इस पुस्तक का लोकार्पण 9 दिसंबर को राजधानी दिल्ली स्थित आंबेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू करेंगे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम को वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से संबोधित करेंगे. रामबहादुर राय का दावा है कि यह पुस्तक भारतीय संविधान के ‘ऐतिहासिक सच, तथ्य, कथ्य और यथार्थ की कौतूहलता का सजीव चित्रण’ करती है. पुस्तक में श्री राय ने आश्चर्य जताया है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने हर मोड़ पर कांग्रेस को बौद्धिक, विधिक, राजनीतिक और नैतिक मार्गदर्शन दिया, लेकिन संविधान के इतिहास से पता नहीं क्यों इसे ओझल कर दिया गया.

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‘बड़बोले’ नेता थे नेहरू, ‘व्यक्तित्व’ था विरोधाभासी

उन्होंने कहा कि संविधान का इतिहास से जाहिर होता है कि पंडित जवाहर लाल नेहरू ‘बड़बोले’ नेता थे और उनका व्यक्तित्व ‘विरोधाभासी’ था. पुस्तक के आखिरी अध्याय ‘राजद्रोह की वापसी’ में राय ने दावा किया है कि नेहरू प्रेस और न्यायपालिका से इतने ‘कुपित’ हो गये थे कि ‘लोकतंत्र की हर मर्यादा को भुलाकर’ और तमाम विरोधों को धता बता देते हुए वह पहले संविधान संशोधन के जरिए राजद्रोह कानून को फिर से लागू करने का विधेयक लेकर आये.

उन्होंने लिखा, ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करने के लिए अंग्रेजी जमाने के प्रावधान और शब्द जाल को पुनः स्थापित किया गया. जैसे जनहित, राज्य की सुरक्षा और विदेशों से संबंध बिगड़ने जैसे अपरिभाषित शाब्दिक बहाने खोज निकाले गये.’ उन्होंने कहा, ‘मूल संविधान नागरिक को मौलिक अधिकारों से संपन्न बनाता था, नेहरू ने उसे राज्य तंत्र के पिंजरे में बंद करवाया. मूल संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा निर्धारित की गयी थी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में किसी प्रकार अदालत की मानहानि, झूठे आरोप, किसी का अपमान और किसी को बदनाम करने जैसे कार्यों का निषेध था.’

कोर्ट में हर बार सरकार को मुंह की खानी पड़ी

रामबहादुर राय ने पुस्तक में लिखा है कि संशोधन में से तीन आधार ऐसे जोड़े गये, जो कभी परिभाषित नहीं किये जा सकते और वह राज्य तंत्र की मर्जी से प्रयोग किये गये. उन्होंने कहा, ‘इससे सरकार को मनमानी करने की पूरी आजादी मिल गयी.’ पुस्तक में दावा किया गया है कि संविधान के लागू होते ही लोगों ने अपने अधिकारों के लिए ज्यादातर राज्यों में न्यायपालिका की शरण ली और जहां-जहां लोगों ने अपने अधिकार के लिए रोड़ा बने कानूनों को चुनौती दी, वहां-वहां फैसला सरकार के खिलाफ गया.

उन्होंने लिखा, ‘इन फैसलों से प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की चुनावी राजनीति में पलीता लगने लगा. विचित्र बात यह है जिस संविधान को बड़े धूमधाम से कांग्रेस के नेताओं ने महान उपलब्धि बतायी थी, उसे वह अपनी सत्ता राजनीति के रास्ते में बाधा समझने लगे. नेहरू ने फार्मूला खोजा. अपने चेहरे से उदार और लोकतांत्रिक मुखौटे को उतार फेंका. न्यायिक हस्तक्षेप को असंभव बनाने के लिए संविधान संशोधन को रामबाण की तरह देखा और हर संविधानिक मर्यादा से बेपरवाह होकर अपने एजेंडे को मनवाया.’

राजपोलाचारी को राष्ट्रपति बनाना चाहते थे नेहरू

पुस्तक के एक अन्य अध्याय ‘सरदार पटेल में गांधी दिखे’ में पत्रकार राय ने लिखा है कि देश के पहले राष्ट्रपति के रूप में राजेंद्र प्रसाद, सरदार वल्लभ भाई पटेल सहित अधिकतर की पसंद थे, लेकिन नेहरू पहले सी राजगोपालाचारी को इस पद पर देखना चाहते थे. उन्होंने पुस्तक में लिखा कि नेहरू ने संविधान सभा के कांग्रेसी सदस्यों की बैठक में राजगोपालाचारी को राष्ट्रपति बनाने का प्रस्ताव रखा, जिसका भारी विरोध हुआ, लेकिन सरदार पटेल की सूझबूझ की वजह से निर्णय को कुछ दिनों के लिए टाल दिया गया.

एजेंसी इनपुट के साथ

Posted By: Mithilesh Jha

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