सरकारी नौकरियों में SBC आरक्षण को हाईकोर्ट में चुनौती, सुप्रिया सुले की केंद्र से मांग- OBC आरक्षण कानून बनाएं

महाराष्ट्र में स्पेशल बैकवर्ड क्लास आरक्षण को रद्द कराने एक संगठन हाईकोर्ट पहुंच गया, तो केंद्र से सुप्रिया सुले ने मांग की है कि ओबीसी आरक्षण के लिए कानून बनाया जाये. आरक्षण से जुड़ी लेटेस्ट खबरें यहां पढ़ें.
मुंबई: महाराष्ट्र लोक सेवा में विशेष पिछड़ा वर्ग (एसबीसी) के उम्मीदवारों को दिये गये आरक्षण को बंबई हाईकोर्ट में चुनौती दी गयी है. वहीं, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) की नेता सुप्रिया सुले ने केंद्र सरकार से मांग की है कि वह अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण का कानून लाना चाहिए.
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) की सांसद सुप्रिया सुले ने मंगलवार को मांग की कि केंद्र अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को राजनीतिक आरक्षण देने के लिए एक कानून लेकर आये और महाराष्ट्र में मराठा और धनगर समुदायों के लिए आरक्षण के मुद्दे का समाधान निकाले.
महाराष्ट्र से लोकसभा सदस्य सुले ने यह मांग तब की है, जब एक दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने राज्य में उन सीटों पर स्थानीय निकाय चुनावों पर अगले आदेश तक रोक लगा दी, जहां ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत तक आरक्षण है.
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स्पेशल बैकवर्ड क्लास को 1994 में मिला था 2 फीसदी आरक्षण
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एसबीसी आरक्षण की अधिसूचना को रद्द करने की हाईकोर्ट से मांग
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सुप्रिया सुले ने ट्वीट करके की ओबीसी आरक्षण लागू करने की मांग
सुप्रिया सुले ने ट्वीट किया, ‘माननीय सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी राजनीतिक आरक्षण पर रोक लगा दी है. संसद का शीतकालीन सत्र चलने पर हम मांग करते हैं कि केंद्र सरकार एक कानून लेकर आये, ताकि ओबीसी के साथ ही मराठा और धनगर समुदायों के लिए लंबित राजनीतिक आरक्षण के मुद्दे का समाधान निकाला जा सकें. इस फैसले का भारत में समाज के एक बड़े वर्ग पर असर पड़ेगा.’ उन्होंने लाखों लोगों की बेहतरी के लिए केंद्र से इस मामले पर गौर करने का अनुरोध किया.
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स्पेशल बैकवर्ड क्लास (एसबीसी) के उम्मीदवारों को महाराष्ट्र लोक सेवा में वर्ष 1994 में 2 प्रतिशत का आरक्षण दिया गया था. मराठा आरक्षण को चुनौती दे चुके ‘यूथ फॉर इक्वेलिटी’ ने बंबई हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर दावा किया है कि महाराष्ट्र सरकार की नौकरियों में एसबीसी के लिए दो प्रतिशत कोटा असंवैधानिक है.
याचिका को सोमवार को हाईकोर्ट में सुनवाई के लिए लिस्ट किया गया था, लेकिन समय की कमी के कारण इस पर विचार नहीं किया जा सका. याचिका में कहा गया है कि महाराष्ट्र सरकार ने 1994 में एसबीसी की श्रेणी बनायी और सरकारी नौकरियों में उनके लिए दो आरक्षण का प्रावधान किया गया.
याचिकाकर्ता ने कहा कि उक्त प्रावधान विभिन्न विशेष या अनुसूचित श्रेणियों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण का कुल प्रतिशत 52 तक हो जाता है, जो सुप्रीम कोर्ट की ओर से निर्धारित सीमा का उल्लंघन है. संगठन ने सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले का हवाला दिया है, जिसमें कहा गया है कि नौकरियों में आरक्षण 50 प्रतिशत की ऊपरी सीमा से अधिक नहीं होनी चाहिए, जब तक कि असाधारण परिस्थितियां नहीं हों.
याचिका में कहा गया है कि 8 दिसंबर 1994 का राज्य मंत्रिमंडल का एसबीसी श्रेणी को अधिसूचित करना और उन्हें आरक्षण देने का फैसला राजनीतिक कदम था, क्योंकि संबंधित अधिसूचना में कभी यह दावा नहीं किया गया कि विशेष पिछड़ा वर्ग से कोई असाधारण परिस्थिति जुड़ी हुई है. इसके अलावा, जब राज्य में शैक्षणिक संस्थानों में सीटों की बात आती है, तो एसबीसी को सामान्य श्रेणी के समान माना जाता है और वे आरक्षण के लिए तभी पात्र होते हैं, जब अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) श्रेणी की सीटें खाली रहती हैं.
याचिका में कहा गया है कि महाराष्ट्र सरकार की अधिसूचना के अनुसार, शिक्षा में 50 प्रतिशत आरक्षण की ऊपरी सीमा का उल्लंघन नहीं किया जाना चाहिए. याचिका में कहा गया है कि महाराष्ट्र सरकार ने ‘यह पता लगाने के लिए कोई प्रयास नहीं किया है कि क्या एसबीसी श्रेणी में शामिल जातियां पिछड़ी हैं, उनके पिछड़ेपन को दिखाने या साबित करने के लिए कोई डेटा भी नहीं है.’ याचिकाकर्ता ने आठ दिसंबर 1994 की अधिसूचना को निरस्त करने का अनुरोध किया है.
Posted By: Mithilesh Jha
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