जंतर-मंतर ने दुनिया को दिखाया नया भारत, हमारा जेन-जी सबसे अलग

जेन-जी प्रोटेस्ट, जंतर-मंतर
36 दिनों के जंतर-मंतर आंदोलन ने भारतीय छात्र राजनीति का एक नया अध्याय लिखा है. इस लेख में जानें कैसे जेन-जी पीढ़ी ने अनुशासित, अहिंसक और रचनात्मक विरोध का अनूठा उदाहरण पेश किया, जो दुनिया के अन्य आंदोलनों से बिल्कुल अलग था.
नई दिल्ली से संदीप सावर्ण की रिपोर्ट
36 दिनों के लंबे धरने के बाद जब जंतर-मंतर से तिरंगे समेटे गए और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के साथ छात्र आंदोलन समाप्त हुआ, तो यह प्रदर्शन खत्म नहीं हुआ, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में विरोध की राजनीति का एक नया और अनोखा अध्याय शुरू हुआ.

जिस 'जेन-जी' पीढ़ी को अक्सर रील्स और सोशल मीडिया तक सीमित मान लिया जाता है, उसी पीढ़ी ने इस आंदोलन से यह स्थापित किया कि भारत की नई पीढ़ी सिर्फ डिजिटल नहीं, लोकतांत्रिक भी है. सिर्फ मुखर नहीं, अनुशासित भी है, सिर्फ अधिकारों की बात नहीं करती, बल्कि सार्वजनिक जिम्मेदारियां निभाना भी जानती है. जंतर-मंतर पर पिछले 36 दिनों में जो तस्वीरें सामने आईं, वे दुनिया भर में पिछले एक दशक के छात्र आंदोलनों से बिल्कुल अलग थीं. यहां न सरकारी बसें जलाई गईं, न दुकानों में आग लगी, न सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया. पुलिस की कार्रवाई, वॉटर कैनन और हिरासत जैसी परिस्थितियों के बावजूद आंदोलन का चरित्र व्यापक रूप से अहिंसक बना रहा.
यह विरोध प्रदर्शन जितना गंभीर था, उतना ही इनोवेटिव
कहीं छात्र पुलिस के वॉटर कैनन के बीच नाचते दिखाई दिए, कहीं वे पुलिसकर्मियों से ही मजाकिया अंदाज में हेलमेट मांगते दिखे, ताकि लोकतांत्रिक विरोध सुरक्षित रह सके. भीषण गर्मी में कुछ छात्र हाथों में पंखे लेकर राहगीरों को हवा करते रहे. प्रदर्शन स्थल गंदा होने पर स्वयंसेवकों ने दस्ताने पहनकर कचरा उठाया, झाड़ू लगाई और सफाई अभियान चलाया. विरोध के बीच जिम्मेदारी का यह भाव भारतीय आंदोलनों में विरल दृश्य था.

दुनिया के जेन-जी आंदोलनों से कितना अलग था भारत
पिछले कुछ वर्षों में दुनिया के अनेक देशों में जेन-जी ने बड़े आंदोलन किए हैं. कई जगह इन आंदोलनों ने सत्ता को चुनौती दी, लेकिन अनेक स्थानों पर वे व्यापक हिंसा, आगजनी और सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान में भी बदल गए. इन अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों की तुलना में जंतर-मंतर का आंदोलन एक अलग तस्वीर पेश करता है. यहां आंदोलनकारियों ने विरोध और अनुशासन को साथ लेकर चलने की कोशिश की. आंदोलन के दौरान स्वयं सफाई करना, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना और सांस्कृतिक गतिविधियों, कविता, संगीत, व्यंग्य और रचनात्मक पोस्टरों के माध्यम से अपनी बात रखना इसकी विशिष्ट पहचान बन गया.
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मास्क के पीछे छिपी एक और कहानी
इस आंदोलन की एक दिलचस्प परत वह भी थी, जहां कुछ छात्र चेहरे पर मास्क या हेलमेट लगाकर धरने में शामिल हुए. कारण सुरक्षा नहीं, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक दबाव था. कई छात्रों का कहना था कि उनके परिवार सत्तारूढ़ दल के समर्थक हैं और वे घर में अनावश्यक विवाद नहीं चाहते थे. यह दृश्य बताता है कि भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक मतभेद अब सिर्फ संसद तक सीमित नहीं, बल्कि परिवारों के भीतर भी मौजूद हैं.
जंतर-मंतर ने दुनिया को दिखाया नया भारत, हमारा जेन-जी अलग
देश के सामान्य नहीं, सबसे मेधावी छात्र सड़क पर थे. यह भी कोई सामान्य छात्र आंदोलन नहीं था. यहां देश के प्रतिष्ठित संस्थानों के विद्यार्थी मौजूद थे—आईआईटी, एम्स, आईआईएम, एनआईटी, दिल्ली विश्वविद्यालय, जेएनयू, बीएचयू, श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स, मिरांडा हाउस और अनेक केंद्रीय विश्वविद्यालयों के छात्र. इनमें बड़ी संख्या उन युवाओं की थी जिन्होंने जेईई एडवांस्ड, नीट, कैट, क्लैट और सीयूईटी जैसी देश की सबसे कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया था. इसलिए आंदोलन के पोस्टर, नारे, रणनीति और सोशल मीडिया अभियान में भी एक अलग बौद्धिक परिपक्वता दिखाई दी.

विरोध की नई भारतीय भाषा
भारतीय छात्र आंदोलनों का इतिहास लंबा रहा है. जेपी आंदोलन से लेकर मंडल आंदोलन और नागरिकता कानून विरोध तक. लेकिन जंतर-मंतर का यह आंदोलन एक नई प्रवृत्ति लेकर आया. यहां नारे थे, लेकिन घृणा कम थी. व्यंग्य था, लेकिन हिंसा नहीं. गुस्सा था, लेकिन सार्वजनिक संपत्ति के प्रति सम्मान भी था. सोशल मीडिया था, लेकिन जमीन पर संगठन भी था. यह आंदोलन बताता है कि भारतीय जेन-जी डिजिटल मीम्स बना सकता है और संविधान की प्रस्तावना भी पढ़ सकता है. वह सत्ता से सवाल पूछ सकता है और प्रदर्शन स्थल की सफाई भी कर सकता है.
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दुनिया के प्रमुख जेन-जी आंदोलन और उनका स्वरूप
फ्रांस (2023):
राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की पेंशन सुधार नीति और बाद में 17 वर्षीय नाहेल की पुलिस गोलीबारी में मौत के बाद युवा सड़कों पर उतरे. हजारों गाड़ियां जलाई गईं, सरकारी इमारतों और दुकानों में तोड़फोड़ हुई. पुलिस व प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़पें हुईं.
चिली (2019):
मेट्रो किराया बढ़ाए जाने के विरोध में शुरू हुआ छात्र आंदोलन जल्द ही राष्ट्रीय जनआंदोलन बन गया. राजधानी सैंटियागो समेत कई शहरों में मेट्रो स्टेशनों को आग लगा दी गई, सार्वजनिक संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचा और कई लोगों की जान गई.
हांगकांग (2019-20):
प्रत्यर्पण विधेयक के विरोध में शुरू हुआ आंदोलन मुख्य रूप से युवाओं और विश्वविद्यालय के छात्रों के नेतृत्व में चला. कई स्थानों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक संघर्ष, पेट्रोल बम, बैरिकेड और व्यापक गिरफ्तारियां देखने को मिलीं.
संयुक्त राज्य अमेरिका (2024):
गाजा युद्ध के विरोध में हार्वर्ड, कोलंबिया, यूसीएलए सहित कई विश्वविद्यालयों में छात्रों ने प्रदर्शन किए. अधिकांश प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे, लेकिन कुछ परिसरों में पुलिस कार्रवाई, झड़पें और गिरफ्तारियां हुईं.
बांग्लादेश (2024):
सरकारी नौकरियों में आरक्षण व्यवस्था के विरोध में शुरू हुआ छात्र आंदोलन बेहद हिंसक हो गया. राजधानी ढाका सहित कई शहरों में आगजनी, तोड़फोड़, पुलिस से हिंसक संघर्ष और सैकड़ों लोगों की मौत हुई. इंटरनेट सेवाएं भी कई दिनों तक प्रभावित रहीं.
नेपाल (2024-25):
शिक्षा सुधार, भ्रष्टाचार और राजनीतिक जवाबदेही जैसे मुद्दों पर विश्वविद्यालयों और युवाओं ने कई चरणों में प्रदर्शन किए. अधिकांश प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे, हालांकि कुछ स्थानों पर पुलिस के साथ झड़पें, पथराव और बल प्रयोग की घटनाएं भी सामने आईं.
श्रीलंका (2022):
आर्थिक संकट के दौरान अरगलया आंदोलन में बड़ी संख्या में युवाओं ने हिस्सा लिया. आंदोलन लंबे समय तक शांतिपूर्ण रहा, लेकिन बाद में राष्ट्रपति भवन पर कब्जा, सरकारी संपत्तियों में घुसने और कुछ स्थानों पर हिंसक घटनाएं भी हुईं.
जर्मनी और ब्रिटेन:
जलवायु परिवर्तन, शिक्षा और सामाजिक मुद्दों पर जेन-जी के नेतृत्व में कई आंदोलन हुए. अधिकांश प्रदर्शन अहिंसक रहे, हालांकि कुछ मौकों पर सड़क जाम, पुलिस से हल्की झड़पें और सार्वजनिक व्यवधान की घटनाएं दर्ज की गईं.
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लेखक के बारे में
By आलोक पाठक
आलोक पाठक वर्ष 2019 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अपने पत्रकारिता सफर के दौरान वे खबर मंत्र, गांडीव और नक्षत्र न्यूज़ जैसे संस्थानों के साथ जुड़े रहे हैं। वर्तमान में वे प्रभात खबर के डिजिटल विभाग में कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हैं। हिंदी भाषा और लेखन के प्रति उनका विशेष लगाव है। उन्हें भू-राजनीति (Geopolitics) और राष्ट्रीय राजनीति से जुड़े विषयों पर लिखना पसंद है। निजी जीवन में कहानियां और कविताएं लिखना तथा कालजयी साहित्य का अध्ययन उनकी प्रमुख रुचियों में शामिल है। उनका प्रयास तथ्यों पर आधारित, सरल और प्रभावी लेखन के माध्यम से पाठकों तक सार्थक जानकारी पहुंचाना है।
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