आजादी के बाद करीब डेढ़ साल तक एक सवाल लटका रहा कि भारतीय सेना का नेतृत्व आखिर कौन करेगा. उस दौर में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का मानना था कि भारतीय अफसरों के पास अभी इतना अनुभव नहीं है कि वे पूरी सेना संभाल सकें इसलिए किसी ब्रिटिश अधिकारी को ही कमांडर-इन-चीफ बनाया जाना चाहिए.
क्या प्रधानमंत्री भी किसी अंग्रेज को बना लेना चाहिए था ?
एक बैठक में यह बात रखी गई. माहौल अचानक बेहद गंभीर हो गया. ज्यादातर लोग चुप थे, मानो हालात को स्वीकार कर लिया गया हो. तभी उस सन्नाटे को तोड़ते हुए लेफ्टिनेंट जनरल नाथू सिंह राठौर खड़े हुए. उन्होंने नेहरू से सीधा सवाल किया, “सर, हमारे पास देश चलाने का भी तो कोई अनुभव नहीं था. तो क्या हमें भारत का पहला प्रधानमंत्री भी किसी अंग्रेज को बना लेना चाहिए था?”
यह सवाल किसी हथियार से कम नहीं था. पूरी सभा स्तब्ध रह गई. लेकिन यही वह पल था, जिसने इतिहास की दिशा बदल दी. नाथू सिंह राठौर ने साफ कह दिया कि भारतीय अफसरों में न सिर्फ क्षमता है, बल्कि देश और सेना को समझने का जज्बा भी है.
नेतृत्व करने से किया इंकार
इसी बातचीत के बाद उनसे कहा गया कि वे खुद सेना प्रमुख क्यों नहीं बन जाते लेकिन उन्होंने अनुशासन और परंपरा की मिसाल पेश की. उन्होंने साफ इंकार कर दिया और कहा, “सेना का नेतृत्व वही करेगा, जो सबसे वरिष्ठ है.”
उस समय सबसे वरिष्ठ अधिकारी थे—KM करिअप्पा. एक ऐसे अफसर, जिन्होंने 1919 में सेना जॉइन की थी, अंग्रेजी दौर में भी कभी दबना नहीं सीखा और भारतीय सैनिकों के सम्मान के लिए लगातार आवाज उठाई. उन्होंने विद्रोह को ताकत से नहीं, समझ और संवाद से संभाला. यही वजह थी कि उनके इलाकों में शांति बनी रहती थी.
KM करिअप्पा बनें सेना अध्यक्ष
बंटवारे के वक्त सेना का टूटना उन्हें भीतर तक तोड़ गया. अफसर, जवान और हथियार—सब कुछ उनकी आंखों के सामने बंटा. इसके बावजूद उन्होंने देश के लिए अपना कर्तव्य नहीं छोड़ा. आखिरकार, 15 जनवरी 1949 को वह ऐतिहासिक दिन आया, जब KM करिअप्पा ने आखिरी ब्रिटिश कमांडर-इन-चीफ जनरल फ्रांसिस रॉय बुचर से कमान संभाली. भारत को अपना पहला भारतीय सेना प्रमुख मिला.
इसी ऐतिहासिक फैसले की याद में हर साल 15 जनवरी को भारतीय थल सेना दिवस मनाया जाता है. एक दिन, जो याद दिलाता है कि आजादी सिर्फ झंडा फहराने से नहीं, बल्कि नेतृत्व अपने हाथ में लेने से पूरी होती है.

