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पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई कल सुबह 11 बजे लेंगे राज्‍यसभा सांसद के रूप में शपथ

By ArbindKumar Mishra
Updated Date
गोगोई राज्यसभा सांसद के रूप में लेंगे शपथ
गोगोई राज्यसभा सांसद के रूप में लेंगे शपथ
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नयी दिल्ली : भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई गुरुवार सुबह 11 बजे राज्यसभा के सांसद के रूप में शतथ लेंगे. मालूम हो राष्‍ट्रपति रामनाथ कोविंद ने गोगोई को मनोनीत किया है.

हालांकि गोगोई के मनोनीत किये जाने की जमकर आलोचना हुई. आलोचना करने वालों में पूर्व न्यायाधी भी शामिल हैं. वहीं विरोध करने वालों को पूर्व प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा कि शपथ लेने के बाद उच्च सदन की सीट की पेशकश स्वीकार करने के बारे में वह विस्तार से बोलेंगे. गुवाहाटी में अपने आवास पर मुलाकात के लिये पहुंचे संवाददाताओं से संक्षिप्त बातचीत में गोगोई ने कहा, कहा, पहले मुझे शपथ लेने दीजिए, इसके बाद मैं मीडिया से इस बारे में विस्तार से चर्चा करूंगा कि मैंने यह पद क्यों स्वीकार किया और मैं राज्यसभा क्यों जा रहा हूं.

ज्ञात हो सरकार की ओर से एक अधिसूचना जारी कर कहा गया था कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 80 के खंड (1) के उपखंड (ए), जिसे उस अनुच्छेद के खंड (3) के साथ पढ़ा जाए, के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए राष्ट्रपति को श्री रंजन गोगोई को राज्यसभा में एक सदस्य का कार्यकाल समाप्त होने से खाली हुई सीट पर मनोनीत करते हुए प्रसन्नता हो रही है.

यह सीट केटीएस तुलसी का राज्यसभा का कार्यकाल पूरा होने से खाली हुई थी. गोगोई ने उस पांच न्यायाधीशों की पीठ का नेतृत्व किया जिसने गत वर्ष नौ नवम्बर को संवेदनशील अयोध्या मामले पर फैसला सुनाया था. वह उसी महीने बाद में सेवानिवृत्त हो गए थे. गोगोई ने साथ ही सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और राफेल लड़ाकू विमान सौदे संबंधी मामलों पर फैसला देने वाली पीठों का भी नेतृत्व किया.

गोगोई का किसने किया विरोध

उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश कुरियन जोसफ सहित पूर्व न्यायाधीशों ने पूर्व प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई के राज्यसभा में मनोनयन की कड़ी आलोचना की और कहा कि सेवानिवृत्ति के बाद पद लेना न्यायपालिका की स्वतंता को ‘कमतर' करता है.

जोसफ ने गोगोई और दो अन्य वरिष्ठ न्यायाधीशों जे. चेलमेश्वर और मदन बी. लोकुर (अब सभी सेवानिवृत्त) के साथ 12 जनवरी 2018 को संवाददाता सम्मेलन करके तत्कालीन सीजेआई के तहत उच्चतम न्यायालय की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए थे. जोसफ ने कहा कि गोगोई ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता के सिद्धांतों से समझौता किया है.

उन्होंने हैरानी जताई और कहा कि गोगोई द्वारा इस मनोनयन को स्वीकार किये जाने ने न्यायापालिका में आम आदमी के विश्वास को हिला कर रख दिया है. पत्रकारों ने जब जोसफ से इस बारे में प्रतिक्रिया मांगी तो उन्होंने आरोप लगाया कि गोगोई ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता व निष्पक्षता के ‘पवित्र सिद्धांतों से समझौता' किया. पूर्व न्यायाधीश ने कहा, मेरे मुताबिक, राज्यसभा के सदस्य के तौर पर मनोनयन को पूर्व प्रधान न्यायाधीश द्वारा स्वीकार किये जाने ने निश्चित रूप से न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर आम आदमी के भरोसे को झकझोर दिया है.

उन्होंने कहा कि न्यायपालिका भारत के संविधान के मूल आधार में से एक है. जोसफ ने इस संवाददाता सम्मेलन के संदर्भ में कहा, मैं हैरान हूं कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिये कभी ऐसा दृढ़ साहस दिखाने वाले न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने कैसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता के पवित्र सिद्धांत से समझौता किया है.

दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ए पी शाह और उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश आर एस सोढ़ी ने भी सरकार द्वारा गोगोई के नामांकन पर तीखी प्रतिक्रिया जताई. न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) सोढ़ी ने कहा कि न्यायाधीश को कभी भी सेवानिवृत्त नहीं होना चाहिए या सेवानिवृत्ति के बाद कभी भी पद नहीं लेना चाहिए. उन्होंने कहा, मेरा हमेशा विचार रहा है कि न्यायाधीशों को सेवानिवृत्ति के बाद कभी भी नौकरी स्वीकार नहीं करनी चाहिए. न्यायाधीशों को इतना मजबूत होना चाहिए कि अपनी स्वतंत्रता को बचाए रखें ताकि न्यायपालिका की स्वतंत्रता कमतर नहीं हो.

न्यायपालिका की स्वतंत्रता से समझौते का पुरस्कार है गोगोई का राज्यसभा के लिए मनोनयन : कांग्रेस

कांग्रेस ने पूर्व प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई को राज्यसभा के लिए मनोनीत किए जाने के संबंध में आरोप लगाया कि यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता से समझौते का पुरस्कार है. पार्टी के वरिष्ठ प्रवक्ता आनंद शर्मा ने ट्वीट किया, न्यायमूर्ति गोगोई को मनोनीत किया जाना न्यायपालिका की स्वतंत्रता से समझौता करने और सरकार को खुश करने के लिए अहम संवैधानिक मामलों की सुनवाई में देरी का इनाम है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने ट्वीट करके कहा, हमें मिलीभगत नहीं चाहिए. हमें संवैधानिक सिद्धांतों और प्रावधानों को बरकरार रखने के लिए निर्भीकता और स्वतंत्रता की जरूरत है.

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