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14 से 16 साल के बच्चों के लिए सामान्य पाठ्यक्रम वाली याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने किया खारिज़

Updated at : 17 Jul 2020 9:59 PM (IST)
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14 से 16 साल के बच्चों के लिए सामान्य पाठ्यक्रम वाली याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने किया खारिज़

उच्चतम न्यायालय ने देश में 6 से 14 साल की आयु के सभी बच्चों के लिये समान पाठ्यक्रम वाली एक समान शिक्षा प्रणाली लागू करने के लिये आईसीएसई और सीबीएसई बोर्ड का विलय करने की संभावनायें तलाशने के लिये दायर जनहित याचिका पर शुक्रवार को विचार करने से इंकार कर दिया.

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नयी दिल्ली : उच्चतम न्यायालय ने देश में 6 से 14 साल की आयु के सभी बच्चों के लिये समान पाठ्यक्रम वाली एक समान शिक्षा प्रणाली लागू करने के लिये आईसीएसई और सीबीएसई बोर्ड का विलय करने की संभावनायें तलाशने के लिये दायर जनहित याचिका पर शुक्रवार को विचार करने से इंकार कर दिया.

न्यायालय ने कहा कि यह नीतिगत मामला है जो उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है. न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़, न्यायमूर्ति इन्दु मल्होत्रा और न्यायमूर्ति के एम जोसेफ की पीठ ने भाजपा नेता और अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की याचिका पर वीडियो कांफ्रेन्सिंग के जरिये सुनवाई के दौरान कहा कि ये नीतिगत मामले हैं और शिक्षा बोर्डो का विलय करने जैसे मुद्दे का न्यायालय द्वारा निर्णय नहीं किया जा सकता है.

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पीठ ने टिप्पणी की, ‘‘आप न्यायालय से कैसे अनुरोध कर सकते हैं कि वह एक बोर्ड का दूसरे में विलय कर दे. ये न्यायालय के काम नहीं हैं.” पीठ ने अपने आदेश में कहा, ‘‘इस याचिका में नीति के मुद्दे उठाये गये है. हमारा दृढ़ मत है कि ये संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत इस न्यायालय के दायरे में नहीं आते हैं कि वह राष्ट्रीय शिक्षा परिषद या राष्ट्रीय शिक्षा आयोग गठित करने का निर्देश दे.”

पीठ ने कहा, ‘‘ये मामले विशेषज्ञों के दायरे में आते हैं. इसी तरह, संविधान पर एक अध्याय पाठ्य पुस्तक में शामिल करने के बारे में किया गया अनुरोध भी नीतिगत मामला है. स्कूल के पाठ्यक्रम में संविधान के तहत अधिकारों, कर्तव्यों और शासन से संबंधित विषय हैं.” पीठ ने इस मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता उपाध्याय से सवाल किया, ‘‘हमारे छात्रों के कंधों पर पहले से ही स्कूली बस्ते का भारी बोझा है.

आप और किताबें जोड़कर उनका बोझ क्यों बढ़ाना चाहते हैं.” पीठ ने यह अनुरोध भी अस्वीकार कर दिया कि रजिस्ट्री को इस याचिका को संबंधित प्राधिकारियों के पास प्रतिवेदन के रूप में भेजना चाहिए. पीठ ने कहा, ‘‘हम इस न्यायालय के कार्यालय को इस तरह के सुझावों पर प्राधिकारियों को विचार करने का निदेश देने के लिये इस्तेमाल करने की अनुमति देने से इंकार करते हैं.

यह और कुछ नहीं बल्कि शिक्षा नीति के दायरे में प्रवेश करने के याचिकाकर्ता के प्रयास को सही ठहराने की कवायद है. उपाध्याय ने इस याचिका में विभिन्न शिक्षा बोर्ड का विलय करके देश में ‘एक राष्ट्र एक शिक्षा बोर्ड’ स्थापित करने की संभावना तलाश करने का केन्द्र को निर्देश देने का अनुरोध किया था. याचिका में कहा गया था कि केन्द्र और राज्यों ने संविधान के अनुच्छेद 21ए (नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा) की भावना के अनरूप देश में एक समान पाठ्यक्रम वाली शिक्षा प्रणाली स्थापित करने की दिशा में अभी तक कोई कदम नहीं उठाया है.

याचिका में तर्क दिया गया था कि केन्द्र और राज्यों द्वारा मूल्यों पर आधारित समान शिक्षा उपलब्ध कराये बगैर बच्चे संविधान के अनुच्छेद 21ए के तहत अपने मौलिक अधिकारों का इस्तेमाल नहीं कर पायेंगे. याचिका में कहा गया है कि शिक्षा का माध्यम भले ही संबंधित राज्य की शासकीय भाषा के अनुरूप भिन्न हो सकता है लेकिन 6 से 14 साल की आयु वर्ग के बच्चों के लिये शिक्षा का पाठ्यक्रम एक समान होना चाहिए.

Posted By- Pankaj Kumar Pathak

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