Congress President Election : क्या खत्म होगा गांधी परिवार का वर्चस्व?

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Congress President Election :  क्या खत्म होगा गांधी परिवार का वर्चस्व?

2019 के चुनाव के बाद जब पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था. उस वक्त उन्होंने तीन-चार पेज का ट्‌वीट करते हुए हार की जिम्मेदारी ली थी .

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देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस को आज अपना नया अध्यक्ष मिल जायेगा हालांकि मल्लिकार्जुन खड़गे की जीत की खबर आ चुकी है, लेकिन औपचारिक ऐलान अभी नहीं हुआ है. 2019 के चुनाव के बाद जब पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था. उस वक्त उन्होंने तीन-चार पेज का ट्‌वीट करते हुए हार की जिम्मेदारी ली थी . उन्होंने उस वक्त यह कहा था कि कुछ लोग यह कह रहे हैं कि मैं पार्टी का अध्यक्ष तय कर दूं, लेकिन यह काम पार्टी कर लेगी. मेरी पार्टी का इतिहास बहुत समृद्ध रहा है. उस वक्त प्रियंका गांधी ने भी राहुल गांधी के फैसले का समर्थन किया था.

छठी बार हो रहा है कांग्रेस अध्यक्ष के लिए चुनाव

कांग्रेस पार्टी का इतिहास 137 साल का रहा है. इस दौरान ऐसा छठी बार हो रहा है कि कांग्रेस अध्यक्ष के लिए चुनाव हो रहे हैं. इससे पहले 1939, 1950, 1977, 1997 और 2000 में कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए चुनाव हुए थे. वर्ष 2000 में कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव सोनिया गांधी ने जितेंद्र सिंह को हराकर जीता था. इस बार के चुनाव में गांधी परिवार का कोई व्यक्ति चुनावी मैदान में नहीं है, इसलिए पार्टी को दो दशक के बाद ऐसा व्यक्ति अध्यक्ष के रूप में मिलेगा जो गांधी परिवार का नहीं होगा. ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या कांग्रेस पार्टी से गांधी परिवार का वर्चस्व खत्म होने की ओर है? राहुल गांधी को राजनीति का माहिर खिलाड़ी नहीं माना जाता है और प्रियंका की इंट्री देर से हुई है.

1939 में सुभाषचंद्र बोस जीते थे चुनाव

1939 में कांग्रेस के अध्यक्ष सुभाषचंद्र बोस बने थे उन्होंने महात्मा गांधी के प्रतिनिधि उम्मीदवार पट्टाभिसीतारमैया को हराया था. 1950 में पुरुषोत्तम दास टंडन अध्यक्ष बने. 1977 में कासू ब्रह्मानंद रेड्डी चुनाव जीते थे. 2000 में सोनिया गांधी चुनाव जीतकर अध्यक्ष बनी थीं.

आजादी के बाद पार्टी पर रहा नेहरू-गांधी परिवार का एकाधिकार

देश की आजादी के बाद कांग्रेस पार्टी पर एक तरह से नेहरू-गांधी परिवार का प्रभुत्व रहा. हालांकि कई ऐसे अध्यक्ष हुए जिन्होंने इस परिवार का ना होते हुए भी अपनी छाप छोड़ी. इनमें कामराज का नाम सबसे पहले आता है. इन्होंने पार्टी को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई और उनका कामराज प्लान आज भी चर्चा में रहता है.

राहुल के इनकार के बाद हो रहा चुनाव

दो दशक से भी ज्यादा समय तक कांग्रेस अध्यक्ष रहने के बाद सोनिया गांधी यह चाहती थीं कि राहुल गांधी ही पार्टी की कमान संभालें. 2017 में राहुल गांधी को पार्टी की कमान मिली भी लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद राहुल ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया और दोबारा अध्यक्ष पद स्वीकार करने से मना कर दिया.

लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद नेतृत्व पर उठे सवाल

लोकसभा चुनाव में मिली पार्टी को करारी हार के बाद पार्टी नेतृत्व पर कई सवाल खड़े हुए. पार्टी के अंदर से ही विरोध की आवाज उठी. जी-23 बना, कपिल सिब्बल, शशि थरूर, गुलाम नबी आजाद जैसे नेताओं ने विरोध जताया. विरोध के बाद सोनिया गांधी ने कहा भी था कि मैं, राहुल और प्रियंका पार्टी के तमाम पद से इस्तीफा देने को तैयार हूं .

मल्लिकार्जुन खड़गे और शशि थरूर के बीच हुआ मुकाबला

17 अक्टूबर को हुए कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और शशि थरूर मैदान में थे. गांधी परिवार से खड़गे की निकटता बतायी जाती है. आज जो परिणाम सामने आये उससे यह स्पष्ट हो चुका है कि खड़गे कांग्रेस के नये अध्यक्ष होंगे. हालांकि उनकी जीत की अभी औपचारिक घोषणा नहीं हुई है. शशि थरूर ने अपनी हार स्वीकार करते हुए खड़गे को बधाई भी दी है. चुनाव से पहले भी वे कई बार खड़गे की तारीफ कर चुके थे.

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रजनीश आनंद

लेखक के बारे में

By रजनीश आनंद

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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