बाल विवाह, कुपोषण से ग्रस्त क्षेत्रों की पहचान करने की जिम्मेदारी कलेक्टर और मजिस्ट्रेट पर: बंबई हाईकोर्ट
Published by : Agency Updated At : 14 Mar 2022 3:11 PM
पीठ जनहित याचिकाओं के एक समूह पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें कुपोषण के कारण आदिवासियों की मौत रोकने के लिए अदालत के हस्तक्षेप और ‘राज्य की उदासीनता’ को लेकर निर्देश देने का अनुरोध किया गया था.
मुंबई: बंबई हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र (Maharashtra) के सभी कलेक्टर और मजिस्ट्रेट को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है. हाईकोर्ट (Bombay High Court) ने सोमवार को कहा कि वह राज्य के सभी कलेक्टर और मजिस्ट्रेट को अपने-अपने क्षेत्राधिकार का सर्वेक्षण करने और उन क्षेत्रों की पहचान करने का निर्देश देगा, जहां बाल विवाह (Child Marriage) के मामले प्रचलित थे.
चीफ जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एमएस कार्णिक की पीठ ने कहा कि सर्वे में उन इलाकों की भी पहचान की जाये, खासकर आदिवासी क्षेत्रों में जहां कुपोषण (Malnutrition) के कारण बच्चों की मौत के मामले सामने आये हों. पीठ जनहित याचिकाओं के एक समूह पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें कुपोषण के कारण आदिवासियों की मौत रोकने के लिए अदालत के हस्तक्षेप और ‘राज्य की उदासीनता’ को लेकर निर्देश देने का अनुरोध किया गया था.
पीठ ने याचिकाकर्ताओं में से एक के वकील, उदय वरुंजिकर को सोमवार शाम तक अदालत में उन जिलों की सूची प्रस्तुत करने का निर्देश दिया, जहां लोग इन समस्याओं का सामना कर रहे हैं. चीफ जस्टिस दत्ता ने कहा, ‘मुझे मेरे सूत्रों से पता चला है कि अब महाराष्ट्र के आदिवासी इलाकों में भी लड़कियों की कम उम्र में शादी करायी जा रही है. 15 साल की उम्र में उनकी शादी करा दी जाती है और फिर वे जल्दी गर्भवती हो जाती हैं. ऐसे में कई बार मां और बच्चे की मौत हो जाती है. हमें इसे रोकना होगा.’
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उन्होंने कहा, ‘हमारे सभी प्रयास तब तक बेकार होते रहेंगे, जब तक कि हम उन्हें यह न समझाएं कि शादी कराने की कानूनी उम्र 18 है. हम ऐसा होने तक लड़कियों की रक्षा नहीं कर पायेंगे.’ महाधिवक्ता आशुतोष कुंभकोणि ने अदालत को बताया कि राज्य आदिवासी आबादी को संवेदनशील बनाने और स्वास्थ्य सेवा को और अधिक सुलभ बनाने के लिए निरंतर प्रयास कर रहा है.
कुंभकोणि ने कहा, ‘हम उन्हें उनकी परंपराओं को बनाये रखने दे रहे हैं. उन्हें फ्लैट में आकर रहने को नहीं कह रहे. साथ ही, हम यह सुनिश्चित करने के लिए भी कदम उठा रहे हैं कि आदिवासी क्षेत्रों में कुपोषण के कारण कोई मौत न हो.’ अदालत ने इसके बाद कहा कि राज्य की आदिवासी आबादी की अपनी परंपराएं हो सकती हैं, लेकिन यह जरूरी है कि आदिवासियों को कानून के बारे में संवेदनशील बनाया जाये.
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पीठ ने कहा, ‘कलेक्टर और मजिस्ट्रेट अपने जिलों में चिह्नित क्षेत्रों में जाकर सर्वेक्षण करें (बाल विवाह और कुपोषण के कारण बच्चों की मृत्यु की जांच के लिए). आप वरुंजिकर शाम तक जिलों की पहचान करते हुए एक सूची जमा करें और फिर हम एक आदेश पारित करेंगे.’
Posted By: Mithilesh Jha
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