पढें, आखिर माछिल सेक्टर में सेना के सामने क्या है सबसे बड़ी चुनौती

Updated at : 23 Nov 2016 8:31 AM (IST)
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पढें, आखिर माछिल सेक्टर में सेना के सामने क्या है सबसे बड़ी चुनौती

श्रीनगर : मंगलवार को एक बार फिर माछिल सेक्टर तक चर्चे में आ गया जब वहां से तीन जवानों के शहीद होने की खबर आयी. नियंत्रण रेखा (एलओसी) के पार से कुपवाड़ा जिला में आतंकी इसे घुसपैठ का सुरक्षित रास्ता मानते हैं. समुद्र तल से 6,500 फीट से ज्यादा की ऊंचाई पर स्थित यह सेक्टर […]

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श्रीनगर : मंगलवार को एक बार फिर माछिल सेक्टर तक चर्चे में आ गया जब वहां से तीन जवानों के शहीद होने की खबर आयी. नियंत्रण रेखा (एलओसी) के पार से कुपवाड़ा जिला में आतंकी इसे घुसपैठ का सुरक्षित रास्ता मानते हैं. समुद्र तल से 6,500 फीट से ज्यादा की ऊंचाई पर स्थित यह सेक्टर घने जंगलों से घिरा है जो आतंकियों के लिए फायदेमंद साबित हो रहा है.

इन जंगलों में आतंकी आसानी से छिप जाते हैं. यही नहीं यहां का मौसम और इलाके की बनावट भी आतंकियों की पक्षधर है. यहां कुपवाड़ा शहर से महज 50-80 किमी. की दूरी पर भारत और पाकिस्तान के बंकर्स एक-दूसरे के काफी नजदीक स्थित हैं.

इस संबंध में आज अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने रिपोर्ट छापी है जिसके अनुसार एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने जानकारी दी है कि कई ऐसे स्थान हैं जहां आतंकी या पाकिस्तानी सैनिक हाजी नाका से माछिल तक आसानी से भारतीय सैनिकों की नजर बचाकर प्रवेश कर जाते हैं.

अधिकारिक सूत्रों के अनुसार, आतंकी कुपवाड़ा और लोलाब घाटी में पहुंचने के लिए घुसपैठ के कई रास्तों का इस्तेमाल प्राय: करते हैं. 28-29 सितंबर में भारतीय सेना की ओर से किए गए सर्जिकल स्ट्राइक के बाद सीजफायर उल्लंघन के मामले में काफी बढ गए हैं. गत 29 अक्टूबर को भी भारत के एक जवान के शहीद होने की खबर आयी थी. पिछले कुछ महीनों में इस इलाके से चार से ज्यादा बार घुसपैठ के प्रयास होचुके हैं. अगस्त में बीएसएफ के तीन जवान इस इलाके में शहीद हुए थे.

यहां बता दें कि भारत के आखिरी गांव से महज 6 किलोमीटर की दूरी पर एलओसी है और दूसरी तरफ केल इलाका है, जिसके बारे में अधिकारियों का मानना है कि आतंकी इसे सबसे बड़े लॉन्चपैड के तौर पर इस्तेमाल करते हैं.

8 जुलाई को जम्मू-कश्‍मीर में हिज्बुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद आतंकियों को और ज्यादा मौका मिला है. बुरहान की मौत के बाद घाटी में लोग बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. यहां सेना का सारा ध्यान प्रदर्शनकारियों से निपटने में टिका है. ऐसे समय में आतंकियों के खिलाफ चलाए जाने वाले ऑपरेशन में कमी से अतंकियों को फायदा पहुंचा है.

उल्लेखनीय है कि 2010 में माछिल उस समय चर्चा में आया था, जब एक मुठभेड़ में सेना की गोली का शिकार तीन ग्रामीणों हो गए थे जिसके बाद कश्मीर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुआ था और सेना ने मुठभेड़ की जांच का आदेश दिया था. जांच में मुठभेड़ फर्जी निकला था और एक पूर्व कमांडिंग ऑफिसर समेत छह जवानों को आजीवन कारावास की सजा सुना दी गई थी.

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