#HBDayAmitShah: जानें भाजपा के ‘चाणक्य’ की कहानी

By Prabhat Khabar Digital Desk
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नयी दिल्ली : भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अध्यक्ष और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह आज अपना 55वां जन्मदिन मना रहे हैं. पीएम मोदी के साथ-साथ कई नेताओं और पार्टी कार्यकर्ताओं ने उन्हें जन्मदिन की बधाई दी. शाह का जन्म 22 अक्टूबर 1964 को मुंबई के संपन्न गुजराती परिवार में हुआ था, मां का नाम कुसुमबेन जबकि पिता का नाम अनिलचंद्र शाह है.

पॉलिटिकल पंडित अमित शाह को वर्तमान राजनीति का चाणक्य बताते हैं हालांकि शेयर ब्रोकर से राजनीति का शहंशाह बनने तक का सफर उनके लिए इतना आसान नहीं था. शाह 16 साल की उम्र तक अपने पैतृक गांव गुजरात के मान्सा में ही रहे और स्कूली शिक्षा वहीं से हासिल की. इसके बाद जब उनका परिवार अहमदाबाद शिफ्ट हो गया, तो वो वहां आ गये. अहमदाबाद से बॉयोकेमिस्ट्री में अमित शाह ने बीएससी की परीक्षा पास की. इसके बाद वे अपने पिता के प्लास्टिक के पाइप के कारोबार को संभालने लगे. प्लास्टिक के पाइप का कारोबाद संभालते हुए उन्होंने स्टॉक मार्केट में कदम रखा और शेयर ब्रोकर के रूप में काम करना शुरू किया.

अमित शाह को राजनीति विरासत में नहीं मिली है. वे एक व्यापारी के पुत्र थे लेकिन जब उन्होंने राजनीति में कदम रखा, तो फिर पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा. शाह साल 1980 में 16 वर्ष की उम्र के थे जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से उनका जुड़ाव हुआ. वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (एबीवीपी) के कार्यकर्ता बन गये थे. शाह ने अपनी कार्यकुशलता और सक्रियता के दम पर संगठन का ध्‍यान अपनी ओर आकर्षित किया. यही वजह है कि महज दो वर्ष बाद यानी 1982 में वे एबीवीपी की गुजरात इकाई के संयुक्त सचिव बन गये.

अमित शाह की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से 1986 में मुलाकात हुई थी और यह मुलाकात धीरे-धीरे दोस्ती में बदल गयी. दोनों के बीच दोस्ती समय के साथ गहरी होती चली गयी. साल 1987 की बात है जब अमित शाह साल भाजपा की युवा इकाई भारतीय जनता युवा मोर्चा (बीजेवाईएम) में शामिल हुए और सक्रिय राजनीतिक जीवन में कदम रखा. शाह को 1997 में बीजेवाईएम का राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष पार्टी ने नियुक्त किया. वो 1989 में भाजपा अहमदाबाद शहर के सचिव बने. राम जन्मभूमि आंदोलन में भी शाह ने सक्रिय भूमिका निभाई. उन्हें पार्टी ने इस दौरान प्रचार-प्रसार की जिम्मेदारी सौंपी थी. यही वो दौर था जब शाह का संपर्क लालकृष्ण आडवाणी से हुआ. उस वक्त आडवाणी गांधीनगर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव के मैदान में थे. शाह ने प्रथम बार से लेकर 2009 तक लगातार कई चुनावों में अडवाणी के चुनाव संयोजक की जिम्मेदारी बखूबी निभाने का काम किया.

बात अगर साल 1995 की करें तो इस वर्ष अमित शाह ने गुजरात प्रदेश वित्त निगम के अध्यक्ष पद की कमान संभाली. उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान न सिर्फ निगम को घाटे से बाहर निकालने का काम किया, बल्कि इसके मुनाफे में 214 प्रतिशत तक की बढोत्तरी कर दी. शाह की अध्यक्षता का ही कमाल था कि निगम ने पहली बार पट्टा खरीद फरोख्त, कार्यशील पूंजी अवधि लोन और ट्रक ऋण की शुरुआत करने का काम किया. आपको बता दें कि गुजरात प्रदेश वित्त निगम सूबे के लघु उद्योगों को टर्मलोन और वर्किंग कैपिटल प्रदान करके उनकी विकास को गति देने वाला एक महत्वपूर्ण संस्थान है.

अपने काम की बदौलत अमित शाह 36 साल की उम्र में अहमदाबाद जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष बने. यह पद प्राप्त करने वाले वे सबसे युवा शख्‍स थे. पद संभालने के एक साल के अंदर ही शाह ने न सिर्फ 20.28 करोड़ का घाटा पूरा किया, बल्कि बैंक को 6.60 करोड़ रुपये के फायदे में ला दिया. यही नहीं उन्होंने 10 प्रतिशत फायदे को वितरण करने का भी काम किया. इन सब पद की जिम्मेदारी बखूबी संभालने के बाद अमित शाह ने साल 1997 में पहली बार गुजरात के सरखेज विधानसभा से किस्मत आजमायी. इस सीट से भाजपा प्रत्याशी के तौर पर विधायक पद के लिए उन्होंने नामांकन भरा और भारी मतों से जीतकर पार्टी का परचम लहराया. विधानसभा क्षेत्र में अमित शाह की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से आप लगा सकते हैं कि आने वाले हर चुनाव में उनकी जीत का अंतर लगातार बढ़ता ही गया.

अमित शाह की संगठनात्मक कुशलता का ही कमाल था कि भाजपा ने उन्हें 1998 में पार्टी की गुजरात इकाई का प्रदेश सचिव नियुक्त कर दिया. इसके एक साल बाद 1998 में अमित शाह को संगठन द्वारा भाजपा की गुजरात इकाई के प्रदेश उपाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंप दी गयी. शाह को साल 2001 में भाजपा की राष्ट्रीय सहकारिता प्रकोष्ठ का संयोजक नियुक्त किया गया. साल 2002 की बात करें तो इस वर्ष अमित शाह के कंधे पर बहुत ही महत्वपर्ण जिम्मेदारी दी गयी. इस साल अमित शाह ने पहली बार गुजरात के मंत्री पद की शपथ ली.

इसके बाद शाह को गुजरात सरकार के मंत्री के रूप में गृह, यातायात, निषेध, संसदीय कार्य, विधि और आबकारी जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी मिली. अमित शाह ने अपने जीवन में कई उतार चढ़ाव देखे लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी. साल 2010 में फर्जी एनकाउंटर के मामले में अमित शाह का नाम आया. इस मामले में उन्हें जेल भी जाना पड़ा. इसके बाद 2015 में सीबीआई की एक विशेष अदालत ने इस एनकाउंटर केस में शाह को बरी कर दिया. उनकी क्षमता को देखते हुए भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ने 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले उनको राष्ट्रीय महासचिव बनाकर 80 सांसदों वाले उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया. जिम्मेदारी मिलने के बाद उन्होंने अपने आप को इस काम में झोंक दिया यही वजह रही कि इस चुनाव में भाजपा ने सूबे की 80 लोकसभा सीटों में से 71 सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की.

पार्टी ने शाह की मेहनत को सम्मान दिया और जुलाई 2014 में अमित शाह को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया. शाह पार्टी के सबसे युवा अध्यक्ष हैं. 24 जनवरी 2016 को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में उन्हें दोबारा से चुना गया और वो वर्तमान में भी इस पद पर बने हुए हैं. दूसरी बार 2019 में जब मोदी सरकार लोकसभा चुनाव जीतकर केंद्र की सत्ता में आयी, तो अमित शाह को केंद्रीय गृहमंत्री का पदभार दिया गया. यहां भी शाह ने एक कमाल किया और जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटा दिया जो ऐतिहासिक कदम था.

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