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अयोध्या मामला : कोर्ट ने पूछा- राम की मूर्ति को कानून ने व्यक्ति माना, क्या राम ‘जन्मस्थान'' को भी ऐसा माना जाए

Updated at : 08 Aug 2019 11:16 AM (IST)
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अयोध्या मामला : कोर्ट ने पूछा- राम की मूर्ति को कानून ने व्यक्ति माना, क्या राम ‘जन्मस्थान'' को भी ऐसा माना जाए

नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में राजनीतिक रूप से संवेदनशील राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद मामले में गुरुवार को एक बार फिर सुनवाई शुरू की. इस मामले में मध्यस्थता के जरिए मैत्रीपूर्ण तरीके से किसी समाधान पर पहुंचने की कोशिशें विफल होने के बाद सुनवाई की जा रही है. ‘राम लला’ की ओर […]

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नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में राजनीतिक रूप से संवेदनशील राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद मामले में गुरुवार को एक बार फिर सुनवाई शुरू की. इस मामले में मध्यस्थता के जरिए मैत्रीपूर्ण तरीके से किसी समाधान पर पहुंचने की कोशिशें विफल होने के बाद सुनवाई की जा रही है. ‘राम लला’ की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता के परासरन ने प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ के समक्ष दलीलें पेश करनी शुरू कीं.

परासरन ने कोर्ट से कहा कि ‘राम लला विराजमान’ को तब पक्षकार नहीं बनाया गया जब मजिस्ट्रेट ने विवादित स्थल को अपने कब्जे में लिया और जब दीवानी अदालत ने निषेधात्मक आदेश दिया. कोर्ट ने परासरन से पूछा कि भगवान राम की मूर्ति को कानून की दृष्टि से व्यक्ति माना गया है और क्या राम ‘जन्मस्थान’ को भी ऐसा माना जा सकता है.

आपको बता दें कि राजनीतिक और धार्मिक रूप से संवेदनशील मामले में राम लला विराजमान के वकील ने बुधवार को अदालत को बताया था कि लाखों भक्तों की ‘‘अटूट आस्था” यह साबित करने के लिए काफी है कि अयोध्या में पूरा विवादित स्थल भगवान राम का जन्म स्थान है. पीठ में न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस ए नजीर शामिल हैं. पीठ ने शुक्रवार को तीन सदस्यीय मध्यस्थता समिति की उस रिपोर्ट का संज्ञान लिया था जिसमें कहा गया कि करीब चार महीने तक चली मध्यस्थता प्रक्रिया में कोई अंतिम सहमति नहीं बनी. मध्यस्थता समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश एफएमआई कलीफुल्ला ने की.

2.77 एकड़ भूमि के दस्तावेज पेश करने को कहा

इससे पहले राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को हिंदू पक्षकार निर्मोही अखाड़ा से विवादित 2.77 एकड़ भूमि के दस्तावेज पेश करने को कहा. इस पर निर्मोही अखाड़ा के वकील सुशील जैन ने कहा कि 982 में वहां डकैती हुई, जिसमें सभी दस्तावेज खो गये. मंगलवार को सुनवाई के दौरान निर्मोही अखाड़ा ने पूरी 2.77 एकड़ विवादित जमीन पर अपना दावा किया था. बुधवार को सीजेआइ रंजन गोगोई की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने जैन से कहा कि चूंकि वह इस समय कब्जे के बिंदु पर है, इसलिए हिंदू संस्था को अपना दावा साबित करना होगा. यदि आपके पास अपने पक्ष में कोई राजस्व रिकॉर्ड है, तो यह आपके पक्ष में बहुत अच्छा साक्ष्य है. इस पर जैन ने कहा कि यह स्थल प्राचीन काल से ही उसके कब्जे में है और उसकी हैसियत मूर्ति के संरक्षक की है.

पीठ ने पूछा- कहीं और आया है गॉड का केस?

पीठ ने राम लला विराजमान के वकील के परासरण से पूछा कि क्या इस तरह के किसी धार्मिक व्यक्तित्व के जन्म के बारे में पहले कभी किसी अदालत में सवाल उठा था. क्या बेथलेहम में ईसा मसीह के जन्म जैसा विषय दुनिया की किसी अदालत में उठा और उस पर विचार किया गया.

वकील बोले : आस्था ही राम की जन्मभूमि होने का सबूत
परासरण ने कहा कि श्रद्धालुओं की आस्था ही विवादित स्थल के राम की जन्मभूमि होने का सबूत है. परासरन ने संविधान पीठ से सवाल किया कि इतनी सदियों बाद भगवान राम के जन्मस्थल का सबूत कैसे पेश किया जा सकता है. यह हिंदुओं की उपासना का प्रयोजन है.

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