सेक्स एजुकेशन से क्यों बचते हैं भारतीय?

Updated at : 27 Jun 2014 2:45 PM (IST)
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सेक्स एजुकेशन से क्यों बचते हैं भारतीय?

-इंटरनेट डेस्क- स्वास्थ्यमंत्री डॉ हर्षवर्द्धन ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि स्कूलों में सेक्स की शिक्षा प्रतिबंधित कर दी जानी चाहिए. डॉ हर्षवर्द्धन का यह बयान मीडिया में चर्चा का विषय बन गया है. कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी ने इस पर व्यंग्य करते हुए कहा है कि इसे तालिबानी फरमान तो नहीं कहा […]

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-इंटरनेट डेस्क-

स्वास्थ्यमंत्री डॉ हर्षवर्द्धन ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि स्कूलों में सेक्स की शिक्षा प्रतिबंधित कर दी जानी चाहिए. डॉ हर्षवर्द्धन का यह बयान मीडिया में चर्चा का विषय बन गया है. कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी ने इस पर व्यंग्य करते हुए कहा है कि इसे तालिबानी फरमान तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन यह काफी पिछड़ेपन का सूचक विचार मालूम पड़ता है.

स्कूलों में सेक्स एजुकेशन पर लगे बैन:डॉ हर्षवर्धन

बहुत संभव है कि डॉ हर्षवर्द्धन के इस बयान पर अभी और प्रतिक्रिया आये और कई लोग ऐसे सामने आयेंगे, जो उनके पक्षधर होंगे, तो कई ऐसे जो उनके आलोचक होंगे. लेकिन यहां सवाल यह है कि आखिर जो मुद्दा हर्षवर्द्धन ने उठाया वह कितना सही है और उसकी कितनी जरूरत समाज को है?

सेक्स एजुकेशन की जरूरत क्यों

यौन शिक्षा एक विस्तृत संकल्पना है, जो मानव यौन अंगों , जनन, संभोग या रति क्रिया , यौनिक स्वास्थ्य, जनन-संबंधी अधिकारों एवं यौन-आचरण संबंधी शिक्षा से संबंधित है. यह शिक्षा बच्चों को देने में उसके माता-पिता एवं अभिभावक, मित्र-मंडली, विद्यालयी पाठ्यक्रम, सार्वजनिक स्वास्थ्य जागरूकता के कार्यक्रम आदि यौन शिक्षा के प्रमुख साधन हैं. सेक्स एजुकेशन की जरूरत पूरे विश्व को तब जान पड़ी, जब एड्स जैसी महामारी ने उसे अपने शिकंजे में कस लिया. तब पश्चिमी देशों को ऐसा जान पड़ा कि सेक्स संबंधों में ईमानदारी बरती जानी चाहिए और लोगों को सेक्स संबंधों के प्रति जागरूक करने की जरूरत है. साथ ही वहां के खुले माहौल में 12-14 वर्ष की लड़कियां भी गर्भवती होने लगी थीं, जो उनके लिए चौंकाने वाले खबर थी. ऐसे माहौल में उन्होंने स्कूलों में सेक्स एजुकेशन की शुरुआत की. लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद आज तक भारत में स्कूलों में सेक्स एजुकेशन अनिवार्य नहीं है. भारत एक ऐसा देश है, जहां सेक्स की बात खुलेआम करना बेशरमी समझी जाती है. लोग इस विषय पर पढ़ते भी हैं, तो गुपचुप. इसमें कोई दो राय नहीं है कि सेक्स शब्द सुनते ही हर भारतीय के कान खड़े हो जाते हैं, लेकिन वे उस विषय पर बात करने में संकोच करते हैं.

क्या सेक्स एजुकेशन से एड्स पर लगाम कसी जा सकती है?

यह सवाल सौ टके का है. अगर हम एक ऐसे विषय पर बात करने के लिए तैयार है, जो हमारे यहां प्रतिबंधित है, तो फिर उसके परिणाम सकारात्मक होने चाहिए, अन्यथा ऐसी चर्चा का क्या फायदा. हमारे समाज में जिस तरह से एचआईवी पोजिटिव मरीजों की संख्या बढ़ रही है, नि: संदेह हमें सेक्स के बारे में बात करने की जरूरत है. हमें यह जानना जरूरी है कि अगर यौन संबंधों में हम असावधानी बरतेंगे, तो हमारी जान पर बन सकती है. लेकिन हमें यहां यह भी देखना होगा कि सेक्स एजुकेशन जब बच्चों को दिया जाये, तो उसे समझें और नादानी न करें. इसका एक स्याह पक्ष यह भी है कि बच्चे नादानी वश कहीं सेक्स एजुकेशन का दुरुपयोग न करें. अगर ऐसा होता है, सेक्स एजुकेशन का उद्देश्य ही समाप्त हो जायेगा.

आखिर क्यों भारतीय सेक्स पर बात करने से बचते हैं?

इस सवाल का जवाब अभी तक कोई नहीं दे पाया है कि आखिर क्यों एक आम भारतीय सेक्स पर बात करने से बचता है और इसे बेशरमी की संज्ञा देता है. जबकि प्राचीन काल से हमारे देश में सेक्स पर काफी खुले माहौल में बातचीत हुई है. कामसूत्र जैसा महाकाव्य इस देश में लिखा गया. खजुराहो और कोणार्क जैसे मंदिरों में सेक्स संबंधित मूर्तियों का अंकन इस बात का द्योतक है हमारा समाज सेक्स को वर्जित नहीं मानता था.

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