पूर्व CJI दीपक मिश्रा ने कहा - कोई भी नागरिक संवैधानिक नैतिकता से वंचित नहीं हो सकता

Updated at : 05 Oct 2018 10:47 PM (IST)
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पूर्व CJI दीपक मिश्रा ने कहा - कोई भी नागरिक संवैधानिक नैतिकता से वंचित नहीं हो सकता

नयी दिल्ली : राजनीति के अपराधीकरण, व्यभिचार, समलैंगिकता, भीड़ द्वारा पीट-पीट कर की जा रही हत्या और सबरीमाला सहित कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर फैसले सुनानेवाली पीठों का नेतृत्व करनेवाले पूर्व प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने शुक्रवार को कहा कि किसी व्यक्ति को संवैधानिक नैतिकता के सिद्धांत से वंचित नहीं किया जा सकता. न्यायमूर्ति मिश्रा ने […]

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नयी दिल्ली : राजनीति के अपराधीकरण, व्यभिचार, समलैंगिकता, भीड़ द्वारा पीट-पीट कर की जा रही हत्या और सबरीमाला सहित कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर फैसले सुनानेवाली पीठों का नेतृत्व करनेवाले पूर्व प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने शुक्रवार को कहा कि किसी व्यक्ति को संवैधानिक नैतिकता के सिद्धांत से वंचित नहीं किया जा सकता.

न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा कि संवैधानिक संप्रभुता सर्वोपरि है और भारत की एक मजबूत स्वतंत्र न्यायपालिका है जो कानून के शासन से शासित होती है. उन्होंने सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश को मंजूरी देने से जुड़े उच्चतम न्यायालय के फैसले को लेकर कहा, हमने संवैधानिक नैतिकता की अवधारणा की शुरुआत की और हमने कहा कि यह नैतिकता संविधान द्वारा विकसित की गयी नैतिकता है. न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा, मुझे खुशी है कि मुझे लैंगिक न्याय के योद्धा के रूप में पेश किया जा रहा है. आप किसी खास धर्म की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश करने से नहीं रोक सकते. महिलाओं का सम्मान करना होगा और वे पुरुषों के जीवन में बराबर की भागीदार हैं. उन्होंने कहा कि इसलिए आप महिलाओं को (मंदिर से) दूर नहीं रख सकते.

संसद से भीड़ द्वारा पीट-पीट कर कर की जानेवाली हत्या को लेकर कानून बनाने की सिफारिश करनेवाली पीठ की अध्यक्षता करनेवाले न्यायमूर्ति मिश्रा ने सवाल किया कि कैसे कोई पुरुष या समूह नैतिकता की पहरेदारी करता है और उन्होंने समाज से ‘सहिष्णुता के विचार को बढ़ावा देने एवं दूसरों के रुख का सम्मान करने’ की अपील की. उन्होंने राष्ट्र के विभिन्न अंगों द्वारा शक्तियों के बंटवारे की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि न्यायालय कानून नहीं बनाते और कानून बनाना विधायिका का काम है. न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा कि भारत के नागरिक के रूप में किसी को भी यह नहीं महसूस होना चाहिए कि संविधान उससे दूर है या वह इसका हिस्सा नहीं है और कोई भी नागरिक इस अवधारणा से वंचित नहीं हो सकता.

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