पहली गर्भ निरोधक गोली सहेली बनाने वाले डॉ. नित्या आनंद का निधन, PGI में ली अंतिम सांस, जानें इनके बारे में
Published by : Sandeep kumar Updated At : 28 Jan 2024 8:04 AM
देश की पहली गर्भ निरोधक गोली सहेली बनाने वाले वैज्ञानिक पद्मश्री अवॉर्डी डॉ. नित्या आनंद का 99 साल की उम्र में निधन हो गया. उनकी तबीयत बिगड़ने के बाद 29 नवंबर 2023 को लखनऊ में पीजीआई के ICU में भर्ती किया गया था.
केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान (CDRI) लखनऊ के पूर्व निदेशक और देश की पहली गर्भ निरोधक गोली सहेली बनाने वाले वैज्ञानिक पद्मश्री अवॉर्डी डॉ. नित्या आनंद का 99 साल की उम्र में निधन हो गया. उनकी तबीयत बिगड़ने के बाद 29 नवंबर 2023 को लखनऊ में पीजीआई के ICU में भर्ती किया गया था. तभी से उनका इलाज एक्सपर्ट डॉक्टरों की निगरानी में चल रहा था. इस बीच इन्फेक्शन बढ़ने के साथ उन्हें वेंटिलेटर सपोर्ट भी दिया गया. डॉक्टरों के मुताबिक इलाज के दौरान शनिवार को सैप्टिक शॉक की वजह से उनका निधन हुआ है. डॉ. नित्या आनंद के तीन संताने हैं. आईआईटी कानपुर से पढ़े नीरज नित्यानंद यूएसए में हैं. उनके छोटे बेटे नवीन कनाडा में हैं, जो वैक्सीन के क्षेत्र में काम कर रहे हैं. छोटी बेटी डॉ. सोनिया नित्यानंद किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) कुलपति व लोहिया संस्थान की निदेशक हैं. डॉ. नित्या आनंद के निधन की सूचना पर केजीएमयू, लोहिया संस्थान समेत CDRI जैसे संस्थानों में शोक की लहर दौड़ गई. डॉ. नित्या आनंद का पार्थिव शरीर को निरालानगर स्थित आवास पर लाया गया, जहां डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक, वरिष्ठ आईएएस अधिकारी डॉ. रजनीश दुबे समेत वैज्ञानिक व मेडिकल संस्थान के डॉक्टर पहुंचे. डॉ. नित्या आनंद का नाम देश के टॉप ड्रग रिसर्च साइंटिस्ट में रहा है. दुनिया की पहली नॉन स्टेरॉयड कंट्रासेप्टिव पिल (सहेली) को बनाने में उनकी अहम भूमिका रही. इसके अलावा मलेरिया, कुष्ठ रोग और TB जैसे गंभीर रोगों के इलाज में सहायक ड्रग की खोज करने में उन्होंने अहम भूमिका निभाई.
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डॉ. नित्या आनंद साल 1974 से 1984 तक केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान (CDRI) लखनऊ के निदेशक रहे. डॉ. नित्या के बनाए ड्रग को CDRI ने साल 1991 में ‘सेंटक्रॉमैन’ के नाम से रिलीज किया था. बाद में हिंदुस्तान लेटेक्स लिमिटेड ने ‘सहेली’ नाम से इसे बाजार में उतारा. इस दवा ने महिलाओं को गर्भ निरोधक इंजेक्शन से मुक्ति दिलाई. इसकी सबसे बड़ी खूबी थी कि महिलाओं में कोई साइड इफेक्ट नहीं होता था. बता दें कि डॉ. नित्या के ड्रग बनाने से पहले पहले गर्भ निरोधक दवाओं में स्टेरॉयड का उपयोग होता था. प्रतिबंध होने के चलते जांच में स्टेरॉयड मिलने पर महिला खिलाड़ियों पर कार्रवाई का डर बना रहता था. ऐसे में ‘सहेली’ के आने से उन्हें स्टेरॉयड वाली गर्भ निरोधक दवाओं से छुटकारा मिला. इस दवा को राष्ट्रीय परिवार नियोजन कार्यक्रम में छाया के नाम से जोड़ा गया है.राष्ट्रपति प्रतिभा देवीसिंह पाटिल ने डॉ. नित्या आनंद को पद्मश्री सम्मान से नवाजा था.
दुनिया भर में नॉन स्टेरॉयडल कंट्रासेप्टिव पिल के ड्रग की चर्चा हुई. चीन के एक रिसर्च ने माना था कि भारत मे खोजी गई सेंटक्रॉमैन दुनिया भर में सबसे बेहतरीन गर्भ निरोधक दवाइयों में से एक है. इसके उपयोग स्पेन, साउथ कोरिया, ऑस्ट्रिया, इथोपिया, बेल्जियम और चीन जैसे देशों में भी होता है. विशेषज्ञ मानते हैं कि डॉ. नित्या आनंद की खोज सेंटक्रॉमैन, सिर्फ गर्भनिरोधक ही नही कई अन्य गंभीर बीमारियों में भी सहायक हैं. इसका इस्तेमाल ब्रेस्ट कैंसर, सर्वाइकल कैंसर, प्रोस्ट्रेट कैंसर, ओवेरियन कैंसर और ल्यूकेमिया के इलाज में भी सहायक हो सकती हैं.
डॉ. नित्या आनंद का जन्म 1 जनवरी, 1925 को पश्चिमी पंजाब के लायलपुर में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है. उनके पिता भाई बालमुकुंद लायलपुर के कृषि महाविद्यालय में भौतिकी और गणित के प्रोफेसर थे, जबकि मां विधवाओं और निराश्रित महिलाओं को हस्तशिल्प का प्रशिक्षण देने वाली एक संस्था की मानद प्रिंसिपल थीं. उनके माता-पिता दोनों सामाजिक कार्यों और राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल थे. 10वीं तक की उनकी शिक्षा धनपतमल एंग्लो-संस्कृत हाई स्कूल, इंटरमीडिएट साइंस गवर्नमेंट इंटर कॉलेज, लायलपुर से हुई. इसके बाद बीएससी लाहौर से किया. इस बीच 1943 में उनके परिवार ने भारत आने का फैसला किया. फिर वो अपने माता-पिता के साथ दिल्ली चले आए.
डॉ. नित्या आनंद ने एमएससी की पढ़ाई सेंट स्टीफंस कॉलेज से रसायन विज्ञान में पूरी की. फिर प्रोफेसर के. वेंकटरमन के साथ कार्बनिक रसायन विज्ञान में शोध के लिए यूनिवर्सिटी डिपार्टमेंट ऑफ केमिकल टेक्नोलॉजी बॉम्बे चले गए. जहां उन्हें 1948 में पीएचडी की डिग्री से सम्मानित किया गया. बता दें कि 1950 में कैम्ब्रिज से दूसरी पीएचडी डिग्री हासिल करने के बाद डॉ. नित्या आनंद देश लौटे. दिल्ली यूनिवर्सिटी के मेडिसिनल केमिस्ट्री डिवीजन में उन्होंने जॉइन किया. मार्च 1951 में उन्होंने CDRI लखनऊ जॉइन किया. यहां उनका पहला प्रोजेक्ट कुष्ठ रोग के इलाज में कारगर ड्रग खोजने को लेकर रहा. बाद में साल 1974 से 1984 तक वो CDRI के निदेशक रहे.
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देश के बंटवारे के दौरान जब दोनों मुल्क के हालात तनाव पूर्ण थे, तब डॉ. नित्या आनंद के माता-पिता लायलपुर (अब फैसलाबाद-पाकिस्तान) में ही थे. इस बीच अगस्त 1947 में जब हालात तेजी से बिगड़ रहे थे, तब टाटा एयरलाइन के अपने मित्र के जरिए डॉ. नित्या आनंद प्लेन से अपने माता-पिता को लेने पहुंचे. लैंड करने के बाद महज 2 घंटे के समय में उनको वापस आना था. इस बीच में जितना सामान हो सकता था, वो प्लेन में रखकर माता-पिता के साथ भारत लौटे.
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