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Harela Festival: लोक पर्व 'हरेला' से हुई आज यहां सावन की शुरुआत, इसलिए है बेहद खास, जानें मान्यता

Updated at : 17 Jul 2023 6:28 AM (IST)
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Harela Festival: लोक पर्व 'हरेला' से हुई आज यहां सावन की शुरुआत, इसलिए है बेहद खास, जानें मान्यता

कई जगह सामूहिक रूप से भी हरेला बोया और काटा जाता है. काटने के बाद इसे स्थानीय देवता के मंदिर में समर्पित किया जाता है. मान्यता है कि हरेला जितना बड़ा होगा, फसल उतनी ही अच्छी होगी. हरेला प्रकृति के संरक्षण का प्रतीक है. साथ ही इसमें महिलाओं की विशेष भूमिका होती है.

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Harela Festival: प्रकृति का सानिध्य हर किसी को पसंद होता है. वहीं सावन में प्रकृति की सुंदरता कई गुना बढ़ जाती है. बारिश की फुहारें जहां गर्मी से निजात दिलाती हैं. वहीं इसके बाद मिट्टी की खुशबू मन को आनंदित कर देती है. इसी सावन से जुड़े लोक पर्व हरेला को आज उत्तर प्रदेश में रहने वाले उत्तराखंड के मूल निवासी हर्षोल्लास के साथ मना रहे हैं.

दरअसल उत्तर प्रदेश का कभी हिस्सा रहा देव भूमि कहा जाने वाला उत्तराखंड भले ही आज अलग राज्य हो. लेकिन, दोनों प्रदेशों की संस्कृति, तीज-त्योहारों और यहां रहने वाले लोगों ने आज भी एक-दूसरे को बेहद अटूट रिश्ते से जोड़ रखा है. दोनों राज्यों में रहने वाले ये लोग जहां एक-दूसरे की खुशियों में शरीक होते आये हैं, वहीं अपने-अपने लोक पर्वों को भी हर्षोल्लास से मनाते हैं. कुछ इसी तर्ज पर सोमवार को हरेला पर्व मनाया जा रहा है. 

देश की धार्मिक रीतियों की विविधता को दर्शाता है हरेला पर्व

दिलचस्प बात है कि उत्तर प्रदेश समेत देश के अन्य राज्यों के लोगों के लिए सावन माह का शुभारंभ भले ही पिछले हफ्ते से हो गया हो. लेकिन, उत्तराखंड के लोग हरेला से सावन की शुरुआत मानते हैं. इसलिए उनके सावन माह का आगाज आज से हुआ है. एक ही माह की अलग-अलग तिथियों में शुरुआत भी देश की धार्मिक रीतियों की विविधता को दर्शाता है.

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साल में तीन बार मनाया जाता है अनोखा पर्व

खास बात है कि कोई भी त्योहार साल में जहां एक बार आता है, वहीं हरेला के साथ ऐसा नहीं है. देवभूमि से जुड़े कुछ लोगों के यहां ये पर्व चैत्र, श्रावण और आषाढ़ के शुरू होने पर यानी वर्ष में तीन बार मनाया जाता है, तो कहीं एक बार मनाने की परंपरा है. इनमें सबसे अधिक महत्व सावन के पहले दिन पड़ने वाले हरेला पर्व का होता है, क्योंकि ये सावन की हरियाली का प्रतीक माना जाता है.

सात प्रकार के अन्न बोने की है अनूठी परंपरा

ज्योतिषाचार्य दीपांकर जोशी ने बताया कि हरेला शब्द की उत्पत्ति हरियाली से हुई है. हरेला के त्योहार से नौ दिन पहले घर के मंदिर या गांवों के देवालयों के अन्दर सात प्रकार के अन्न जौ, गेहूं, मक्का, गहत, सरसों, उड़द और भट्ट को टोकरी में रोपित किया जाता है. इससे लिये एक विशेष प्रक्रिया अपनाई जाती है. पहले टोकरी में एक परत मिट्टी की बिछाई जाती है, फिर इसमें बीज डाले जाते हैं. उसके बाद फिर से मिट्टी डाली जाती है, फिर से बीज डाले जाते हैं, यही प्रक्रिया पांच-छह बार अपनाई जाती है.

सूरज की सीधी रोशनी से रखा जाता है दूर

इसे सूर्य की सीधी रोशनी से बचाया जाता है और रोजाना सुबह पानी से सींचा जाता है. नौवें दिन इनकी एक स्थानीय वृक्ष की टहनी से गुड़ाई की जाती है और दसवें यानी की हरेला के दिन इसे काटा जाता है. कहीं कही हरेला को नौवें दिन काटने की परंपरा है.

घर की बुजुर्ग महिला की होती है अहम जिम्मेदारी

हरेला काटने के बाद गृह स्वामी द्वारा इसे तिलक-चन्दन-अक्षत से अभिमंत्रित किया जाता है, जिसे हरेला पतीसना कहा जाता है. उसके बाद इसे देवता को अर्पित किया जाता है. इसके बाद घर की बुजुर्ग महिला सभी सदस्यों को हरेला लगाती हैं. लगाने का अर्थ यह है कि हरेला सबसे पहले पैर, फिर घुटने, फिर कन्धे और अंत में सिर में रखा जाता है और आशीर्वाद स्वरुप यह पंक्तियां, ‘जी रये, जागि रये…धरती जस आगव, आकाश जस चाकव है जये…सूर्ज जस तराण, स्यावे जसि बुद्धि हो..दूब जस फलिये, सिल पिसि भात खाये, जांठि टेकि झाड़ जाये’ बोली जाती है. आज उत्तराखंड मूल के परिवारों में यह शब्द बार-बार सुनाई देते रहे. 

इस तरह की जाती है खुशियों की कामना

ज्योतिषाचार्य दीपांकर जोशी ने बताया कि इनका अर्थ है कि हरियाला तुझे मिले, जीते रहो, जागरूक रहो, पृथ्वी के समान धैर्यवान, आकाश के समान उदार बनो, सूर्य के समान तेजस्वी, सियार के समान बुद्धि हो, दूर्वा के तृणों के समान पनपते हुए और इतने दीर्घायु हो कि दंतहीन होने पर चावल भी पीस कर खाना पड़े और शौच जाने के लिए लाठी का उपयोग करना पड़े, तब भी तुम जीवन का आनन्द ले सको. बड़े बुजुर्गों की ये दुआएं छोटों के जीवन में खुशहाली और समृद्धि का प्रतीक बनती हैं.

हरेला पूजन के लिए होता है इंतजार

हरेला का महत्व इस बात से भी समझा जा सकता है कि अगर परिवार का कोई सदस्य त्योहार के दिन घर में मौजूद न हो, तो उसके लिए बकायदा हरेला रखा जाता है और जब भी वह घर पहुंचता है तो बड़े-बजुर्ग उसे हरेला से पूजते हैं. वहीं कई परिवार इसे अपने घर के दूरदराज के सदस्यों को आज भी कूरियर के जरिए पहुंचाते हैं.

हरेला से जुड़ी अहम बातें

एक अन्य विशेष बात है कि जब तक किसी परिवार का विभाजन नहीं होता है, वहां एक ही जगह हरेला बोया जाता है, चाहे परिवार के सदस्य अलग-अलग जगहों पर रहते हों. परिवार के विभाजन के बाद ही सदस्य अलग हरेला बो और काट सकते हैं. इस तरह से आज भी इस पर्व ने कई परिवारों को एकजुट रखा हुआ है. इसके साथ ही इस दिन शिव-परिवार की मूर्तियां भी गढ़ी जाती हैं, जिन्हें डिकारे कहा जाता है. शुद्ध मिट्टी की आकृतियों को प्राकृतिक रंगों से शिव-परिवार की प्रतिमाओं का आकार दिया जाता है और इस दिन उनकी पूजा की जाती है.

उत्तराखंड के सावन की अलग शुरुआत के पीछे की वजह

देश भर में सावन का महीना 4 जुलाई से शुरू हो चुका है. लेकिन, उत्तराखंड में 17 जुलाई से सावन के पवित्र माह की शुरुआत के पीछे यहां की अपनी पंचांग व्यवस्था है. दरअसल उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और नेपाल सावन बाकी राज्यों से अलग होता है. देश के उत्तर मध्य और पूर्वी भागों में पूर्णिमा के बाद नए हिंदू माह की शुरुआत होती है.

इस पंचांग व्यवस्था में उत्तराखंड के मैदानी क्षेत्र के अलावा उत्तर प्रदेश सहित अन्य राज्य आते हैं. इसलिए उनके सावन पूर्णिमा से शुरू होकर पूर्णिमा के आसपास खत्म होते हैं. वहीं उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र, नेपाल और हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में सौर पंचांग के अनुसार महीने शुरू और खत्म होते हैं. यानी जब सूर्य भगवान एक राशि से दूसरी राशि में जाते हैं, तब नए माह की शुरुआत होती है.

सूर्य के राशि परिवर्तन को संक्रांति कहते हैं. यह संक्रांति हमेशा महीनों के बीच में पड़ती है. इसलिए प्रति माह संक्रांति 15-16 या 17 तारीख के आसपास पड़ती है. इसीलिए हमेशा उत्तराखंड का सावन का महीना 16 या 17 जुलाई के आसपास से शुरू होकर 15 या 16 अगस्त को खत्म हो जाता है. इस वर्ष 4 जुलाई यानी गुरु पूर्णिमा से सावन का महीना शुरु हो गया है, जबकि 17 जुलाई को सूर्य मिथुन राशि से निकलकर कर्क राशि में प्रवेश कर रहे हैं, इसलिए सूर्य के इसी राशि परिवर्तन के साथ उत्तराखंड में सावन के महीने की शुरुआत हो रही है.

पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक है हरेला

वास्तव में हरेला सुख, समृद्धि, शांति एवं पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक है. उत्तराखंड सरकार ने इस बार हरेला पर्व की थीम ‘जल संरक्षण एवं जल धाराओं का पुनर्जीवन’ निर्धारित की है. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि यह पर्व प्रकृति और मानव के सह अस्तित्व को स्मरण कराता है. उन्होंने सभी से अपील की है कि जल का संरक्षण करें और इस दिशा में अन्य लोगों को भी जागरूक करें. लोकपर्व हरेला के अवसर पर मुख्यमंत्री आवास परिसर में पौधरोपण भी किया गया.

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Sanjay Singh

लेखक के बारे में

By Sanjay Singh

working in media since 2003. specialization in political stories, documentary script, feature writing.

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