अमेरिका में कैदी बढ़ रहे हैं

-हरिवंश- 28 सिंतबर को हमारा दिन शुरू होता है, सुबह 8.15 से ही पहली मुलाकात है, अमेरिकन सिविल प्लबर्टीज यूनियन के फील्ड डायरेक्टर जेन गुरेरो से. फिर ओहियो से जीते कांग्रेस प्रतिनिधि टानी पी हाल के प्रमुख सहायक रिक कार्ने और उनके विधायिका सहायक वाब जेरिच से. इसके बाद अमेरिकी संसदीय समिति की कार्यवाही देखना […]
-हरिवंश-
1992 में एक छोटे शहर में यह संख्या बढ़ कर 1499 हो गयी. आकलन है कि कक्षा सात में पढ़नेवाले एक विद्यार्थी को अपने जीवन में हिंसक अपराध झेलने की 80 फीसदी संभावना है. आधे से अधिक अपराध के शिकार वे लोग है, जिनकी आय 15 हजार डॉलर से कम है.1980 के दशक में अमेरिका के वयस्क जनसंख्या में 13 फीसदी वृद्धि हुई, लेकिन अपराधियों की संख्या में 139 फीसदी. इसका एक मुख्य कारण था अमेरिका द्वारा ‘ड्रग के खिलाफ युद्ध’ (वार आन ड्रग) की नीति पर सख्त अमल. कोकीन, हेरोइन, मारीजुआना खानेबेचने-रखने वाले धड़ाधड़ बंद होने लगे. 1992-93 में अमेरिकी जेलों में बंद लोगों का व्यापक सर्वे-अध्ययन किया गया. इसके निष्कर्ष दिलचस्प हैं.
आत्मविश्वास के साथ पाल केनेडी की चर्चित पुस्तक ‘द राइज एंड फाल ऑफ ग्रेट पावर्स’ में अमेरिका के भविष्य को लेकर व्यक्त चिंता के संदर्भ में उत्तर देते हैं, हम सपने पालते हैं और हमारे सपने यही हैं कि विश्व का अगुआ अमेरिका भविष्य में भी वैसा ही बना रहे, जैसा अब है. जोर देकर दुहराते हैं कि यह बनी रहेगी. नाम चास्की द्वारा अमेरिका को ‘मिलिट्री कांप्लेक्स इंस्टीट्यूशन्स’ मुहावरे के संदर्भ में या चीन को व्यपार की दृष्टि से अति निम्न वर्ग (मोस्ट फेवर्ड नेशन) देशों में रखने या इराक पर हमले या हैती या वियतनाम के संदर्भ में अमेरिका की कटु आलोचना का भी धैर्य, संयम और प्रखरता से उत्तर देते हैं. आम अमेरिकी लोगों का कटु आलोचना की स्थिति में भी आत्म संयम, धैर्य उल्लेखनीय है.
कोई सामान्य नागरिक प्रवेश नहीं कर सकता. अगर किसी गोपनीय मसले या राष्ट्र सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील मुद्दों पर बातचीत होती है, तो आगंतुकों-अतिथियों से उतने समय के लिए बाहर रहने की गुजारिश होती है. अमेरिकी संसद में अति मामूली सुरक्षा है. संस्थान जन प्रतिनिधियों का मंच है, यह लगता है. चौकस पहरेदार हैं, पर वैसा रोक-टोक निगरानी नहीं है, जैसा भारत में है. भारत में कलक्टर, एसपी या एसडीओ से मिलना-प्रवेश करना कठिन है, पर अमेरिका के ‘कैपिटल’, ‘व्हाइट हाउस’, ‘संसद’ में प्रवेश करना-घूमना-मिलना-बहस करना आसान है.
हर मुलाकात-भेंट में कश्मीर का सवाल अवश्य उछलता-उठता है.यहीं पर हमें बहुचर्चित पुस्तक मिलती है ‘ट्रेंडिंग अवे द फ्यूचर’ ‘चाइल्ड लेबर इन इंडियाज एक्सपोर्ट इंडस्टीज’. फेरिस जे हार्वे और लारेन रिगिन ने ‘इंटरनेशनल लेबर राइट्स एडूकेशन एंडरिसर्च फंड’ के तत्वावधान में यह काम किया है. इस पुस्तक को केंद्र बना कर भारत के कालीन उद्योग वगैरह (जहां बच्चे काम करते हैं) पर पाबंदी की मांग चल रही है. निश्चित रूप से यह मानवाधिकार का मामला हैं, पर इसकी तह में भी बहुत कुछ है. कालीन उद्योग वगैरह से भारत काफी विदेशी मुद्रा अर्जित करता रहा है. बड़े पैमाने पर उसका आयात होता है. अगर यह आयात बंद होता है, तो भारत का बड़ा नुकसान होगा.
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