कंधे व पीठ की तकलीफ दूर कर देता है हस्त उत्तानासन

हस्त उत्तानासन विशेष रूप से उन लोगों को फायदा पहुंचाता है, जो आगे की ओर कंधा झुका कर कार्य करते हैं. देर तक कंप्यूटर पर कार्य करनेवाले लोगों के लिए तो यह रामबाण उपाय माना जाता है. यह कंधा एवं पीठ के ऊपरी भाग के कड़ेपन को दूर करता है और दर्द से आराम दिलाता […]
हस्त उत्तानासन विशेष रूप से उन लोगों को फायदा पहुंचाता है, जो आगे की ओर कंधा झुका कर कार्य करते हैं. देर तक कंप्यूटर पर कार्य करनेवाले लोगों के लिए तो यह रामबाण उपाय माना जाता है. यह कंधा एवं पीठ के ऊपरी भाग के कड़ेपन को दूर करता है और दर्द से आराम दिलाता है.
हस्त उत्तानासन विशेष रूप से खड़े होकर करनेवाला अभ्यास है. इस आसन को आसानी से किया जा सकता है. इसके अभ्यास को नियमित करने से पीठ, कंधों और पैर की पेशियों में खिंचाव उत्पन्न होता है और उसमें मजबूती आती है. यह अभ्यास उन लोगों के लिए विशेष लाभकारी हैं, जो लंबे समय तक बैठ कर काम करते हैं, जिसके कारण पीठ में कड़ापन आ जाता है और दर्द होने लगता है. जैसे दफ्तर में काम करनेवाले लोगों को इस आसन का लाभ जरूर उठाना चाहिए. इस आसन से फेफड़े की क्षमता काफी बढ़ती है. ऑक्सीजन को अंदर ले जाने में यह काफी लाभकारी है. यह साइटिका और स्लिप डिस्क की समस्या में काफी लाभ पहुंचाता है. जिन्हें हृदय संबंधी समस्या है, उनके लिए यह विशेष लाभकारी हैं.
आसन करने की विधि
सर्वप्रथम जमीन के ऊपर दोनों पंजों को मिला कर खड़े हो जाइए. आपकी भुजाएं बगल में होनी चाहिए. अब संपूर्ण शरीर को शांत और शिथिल बनाने का प्रयास करें और पूरे शरीर के भार को अपने दोनों पंजों के ऊपर बराबर संतुलित करें. अपने दोनों हाथों को शरीर के सामने कैंचीनुमा आकार में रखें. अब धीरे-धीरे गहरी और लंबी श्वास लेते हुए अपने दोनों हाथों को कैंचीनुमा बनाये रखते हुए सिर के ऊपर ले जाएं. इस गति को श्वास के साथ जोड़ने का प्रयास करें. साथ ही अपने सिर को थोड़ा पीछे झुका कर हाथों की ओर देखें. अब अपने श्वास को छोड़ते हुए भुजाओं को बगल में इस प्रकार फैलाएं कि वे कंधों की सीध में आ जाएं. अब पुन: श्वास लेते हुए धीरे-धीरे अपने दोनों हाथों को पुन: सिर के ऊपर कैंचीनुमा स्थिति में लाने का प्रयास करें. अब पुन: अपनी श्वास को छोड़ते हुए अपनी भुजाओं को धीरे-धीरे शरीर के सामने नीचे लाएं, ताकि आप एक बार पुन: प्रारंभिक स्थिति में वापस आ जाएं. इस प्रक्रिया की शुरुआत में पांच से 10 बार करना चाहिए. किंतु आगे चलकर क्षमता के अनुसार 10 से 15 बार इसे आरामपूर्वक कर सकते हैं.
सजगता : पूरे अभ्यास के दौरान अपने मन को पूर्णत: शांत बनाये रखें. शारीरिक गति को हमेशा श्वास की गति के साथ जोड़ कर ही अभ्यास करें. इसमें सजगता आपकी धीमी और गहरी श्वास के ऊपर, भुजाओं और कंधोंे के खिंचाव के ऊपर एवं फेफड़ों के विस्तार के ऊपर होना चाहिए.
श्वसन : जब दोनों हाथ कैंचीनुमा स्थिति में ऊपर की ओर जायेंगे, तो श्वास अंदर की ओर जायेगी. जब आप दोनों हाथों को कंधे के बराबर बगल में ले जायेंगे तो श्वास को धीरे-धीरे छोड़ेंगे. पुन: जब सिर के ऊपर दोनों हाथों को कैंचीनुमा बनाते हुए लायेंगे तो श्वास लेंगे और जब दोनों हाथों को कैंचीनुमा स्थिति में नीचे लाएं तो श्वास धीरे-धीरे बाहर निकालेंगे.
सीमाएं : जिन लोगों को गंभीर अस्थमा हो या जिन्हें गंभीर सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस की शिकायत हो और खड़े होने पर चक्कर आता हो, उन लोगों को इस अभ्यास से बचना चाहिए.
धर्मेद्र सिंह
एमए योग मनोविज्ञान, बिहार योग विद्यालय-मुंगेर
गुरु दर्शन योग केंद्र-रांची
योग मित्र मंडल-रांची
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