शहर और गांवों में टुसू पर्व की धूम: दांव पर लग रही मुर्गे की जिंदगी
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 14 Jan 2020 10:37 AM
सोनारी दोमुहानी समेत दर्जनों जगह पर मुर्गा लड़ाई शुरूजमशेदपुर : लाल-लाल, खुड़िया-खुड़िया,टोपी वाला, धोती वाला, लुंगी वाला सरीखे बोल अब खूब सुनायी दे रहे हैं. शहर हो या गांव टुसू पर्व में पूरी तरह से रम गया है. लोग समूह बनाकर मुर्गा पाड़ा में जा रहे हैं और मुर्गे की जोड़ी लगाकर अपना दांव खेल […]
सोनारी दोमुहानी समेत दर्जनों जगह पर मुर्गा लड़ाई शुरू
जमशेदपुर : लाल-लाल, खुड़िया-खुड़िया,टोपी वाला, धोती वाला, लुंगी वाला सरीखे बोल अब खूब सुनायी दे रहे हैं. शहर हो या गांव टुसू पर्व में पूरी तरह से रम गया है. लोग समूह बनाकर मुर्गा पाड़ा में जा रहे हैं और मुर्गे की जोड़ी लगाकर अपना दांव खेल रहे हैं. लोग मुर्गे की लड़ाई का रोमांच देख रहे हैं और टोपी वाला, लुंगी वाला बोल कर अपने पसंदीदा मुर्गे पर दांव खेल रहे हैं. कृषि कार्य से जुड़े लोग अपने सभी कामकाज से मुक्त होने के बाद मुर्गा लड़ाई व टुसू मेला जाकर खूब मस्ती कर रहे हैं. शहर में सोनारी दोमुहानी समेत दर्जनों जगहों पर मुर्गा लड़ाई का दौर शुरू हो गया है.
मुर्गे के पैर में बांधते हैं ‘यू’ आकार का हथियार : मुर्गा लड़ाई के दौरान मुर्गे के एक पैर में अंग्रेजी के अच्छर ‘यू’ आकार का एक हथियार बांधा जाता है. जिसे कांति कहते हैं. इसे बांधने की भी कला है. जो इस कला के माहिर होते हैं उसे कांतिकार कहा जाता है. मुर्गा पाड़ा में जब दो मुर्गे लड़ते हैं तो दर्शक अपने मनपसंद मुर्गे पर दांव लगाते हैं. इस दौरान मुर्गे को उत्साहित करने के लिए तरह-तरह की आवाज निकाली जाती है. इससे मुर्गा और अधिक जोश-खरोश के साथ लड़ता है. मुर्गों की लड़ाई तभी समाप्त होती है जब एक मुर्गा घायल हो जाता है या मैदान छोड़कर भाग जाता है.
मुर्गा लड़ाई पीढ़ियों से है मनोरंजन का हिस्सा: आदिवासी-मूलवासी समाज में मुर्गा लड़ाई कई पीढ़ियों से मनोरंजन का हिस्सा बना हुआ है. इस लड़ाई को संस्कृति से जोड़कर देखा जाता है. लेकिन यह संस्कृति बिल्कुल नहीं है. मुर्गा लड़ाना ही होगा, यह जरूरी नहीं है. सुदूर गांव देहात में टुसू पर्व के दौरान मुर्गा लड़ाई मनाेरंजन का एक माध्यम है. परंतु अब धनलोलुप लोगों ने इस मनोरंजन को भी विकृत कर दिया है.
टुसू पर्व के दौरान कुछ लोग अखान जतरा के दिन मुर्गा लड़ाते हैं. उनके मुर्गा लड़ाने का मुख्य मकसद अपना जतरा देखना है. यदि वह मुर्गा को लड़ाकर जीत जाता है तो समझता है कि उसका जतरा बहुत अच्छा है. वह शौकिया मुर्गा लड़ाने वाला नहीं होता है.
-दुर्गाचरण मुर्मू, तालसा निवासी
साधुचरण महतो के मुर्गे ने किया खूंखार प्रदर्शन
जमशेदपुर: सोनारी दोमुहानी में आयोजित दो दिवसीय मुर्गा पाड़ा के प्रथम दिन करीब 300 जोड़ी मुर्गा को लड़ाया गया. पूर्व विधायक साधुचरण महतो भी मुर्गा पाड़ा में अपनी किस्मत आजमाने पहुंचे थे. श्री महतो भले ही ईचागढ़ विधानसभा चुनाव में हार गये हों. लेकिन मुर्गा पाड़ा में सोमवार को उनका ही दबदबा दिखा. उनके द्वारा लड़ाई के लिए लाये गये मुर्गे ने दमदार फाइटिंग की. मुर्गा काफी जोश-खरोश के साथ लड़ा और अपने मालिक को जीत दिलायी. उनका हौसला अफजाई करने के लिए पूर्व मंत्री दुलाल भुइयां भी पहुंचे थे. सभी बाजी मुर्गा जीते : मुर्गा पाड़ा आयोजन कमेटी की ओर से प्रथम, द्वितीय व तृतीय बाजी मुर्गा पर क्रमश: 5000, 3000 व 2000 रुपये इनाम रखा गया था. कमेटी की तीनों बाजी मुर्गे की जोड़ी पर लगायी गयी. तीनों बाजी मुर्गे जीते.
मुर्गा लड़ाई कभी भी परंपरा नहीं रही है. शौकीन लोग मुर्गा लड़ाते हैं. हर किसी के लिए मुर्गा लड़ाना जरूरी नहीं है. गांव-देहात में टुसू पर्व के दौरान मुर्गा लड़ाई अधिक देखने को मिलती है. क्योंकि लोग कृषि कार्य से कुछ समय के लिए मुक्त हो जाते हैं. इस वजह से लोगों के दिमाग में मस्ती छायी रहती है.
– बिरजू पात्रो, गदड़ा निवासी
प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
लेखक के बारे में
By Prabhat Khabar Digital Desk
यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए










