साहित्य की धारा में बदलाव: नये लेखकों ने पाठकों के बीच बनायी पकड़
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 27 Aug 2019 10:49 AM
-हर साल 10,000 से ज्यादा छपती हैं हिंदी की किताबेंपटना : कुछ दिन पहले का दौर याद कीजिए. आप फ्लाइट से सफर कर रहे हो, पांच सितारा या तीन सितारा होटलों में जा रहे हों, ट्रेन के एसी बोगी से कोई लंबी यात्रा कर रहा हो, आप काॅफी हाउस में जा रहे हों. आपको या […]
-हर साल 10,000 से ज्यादा छपती हैं हिंदी की किताबें
पटना : कुछ दिन पहले का दौर याद कीजिए. आप फ्लाइट से सफर कर रहे हो, पांच सितारा या तीन सितारा होटलों में जा रहे हों, ट्रेन के एसी बोगी से कोई लंबी यात्रा कर रहा हो, आप काॅफी हाउस में जा रहे हों. आपको या तो अंग्रेजी के उपन्यास दिखाई देते थे या फिर अंग्रेजी के मैगजीन. लेकिन अब स्थितियां बदल चुकी हैं. हर ओर हमें अब हिंदी का जलवा दिखाई दे रहा है. न केवल उपन्यास बेस्ट सेलर हो रहे हैं बल्कि अपनी उपस्थिति बहुत प्रमुखता से दर्ज करा रहे दर्ज करा रही हैं. न केवल नये युवा साहित्यकारों ने अंग्रेजी उपन्यासों का वर्चस्व तोड़ा है बल्कि किताबों की दुकानों में तो रवीश कुमार, सत्य व्यास, नीलोत्पल मृणाल, दिव्य प्रकाश दुबे तो ऐसे नाम हैं जो काफी फेमस हैं.
नये लेखक अपनी जुबान में कर रहे बात
नये उपन्यास की सबसे खास बात यह है कि लेखकों ने अपने किरदारों की जुबान नहीं काटी है. किरदारों ने जब चाहा, जो चाहा बोल दिया, जैसी भावनाएं रखनी चाही, रख दीं. लेखक ने ठीक वैसे ही उसे लिख दिया. इसलिए वे शब्द, शिल्प, बिंब आदि के साहित्यिक पैमानों से बरी हो जाते हैं और ऐसा तब हुआ है जब किरदारों के साथ ऐसा इंसाफ यथार्थ लेखन में संभव हुआ है. सत्य व्यास और नीलोत्पल जिन्होंने क्रमश: बनारस टॉकिज और डार्क हार्स लिखी है वे खुद भी यह दावा करते हैं कि उन्होंने इस उपन्यास के रूप में कोई साहित्य नहीं रचा है, बल्कि उन्होंने जो देखा है, उसे ही अक्षरों, शब्दों और वाक्यों में पिरोकर एक कहानी कह डाली है. इस उपन्यास को पढ़ते हुए, किरदारों के मुंह से ‘गंवई मुहावरों’ को सुनते हुए ऐसा नजर भी आया है, जिससे यह कहा जा सकता है कि वे अपने दावे पर खरे उतरे हैं. 42 करोड़ लोगों की भाषा है हिंदी, जो 2011 की जनगणना के मुताबिक 42 करोड़ से ज्यादा लोगों की मातृभाषा है. वही हिंदी, जिसमें हर साल 10,000 से ज्यादा किताबें छपती हैं. हिंदी में बेस्ट सेलर की बहस नया फेनॉमिना है. क्लासिक बनाम पॉपुलर वाली बहस अपनी जगह कायम है. क्या किसी समाज के जिंदा और विचारशील होने की निशानी यह है कि उसकी दुनिया में साहित्य और किताबों की कितनी जगह है? शिव त्रयी से प्रसिद्ध हुए लेखक अमीश त्रिपाठी की अगली किताब के लिए वेस्टलैंड बुक्स ने 5 करोड़ रुपये का अनुबंध किया था तो चेतन भगत के नॉबेल हिंदी में लगातार अनुवादित हुए. यह भी हिंदी की ताकत बताती है.
नये लेखकों को मौके दे रहे हैं प्रकाशक
प्रभात प्रकाशन, हिंद युग्म, शब्दारंभ प्रकाशन के साथ ही राजकमल का सार्थक पब्लिकेशन युवाओं को लेकर आगे आ रहे हैं और नये लेखकों को मौके दे रहे हैं. इसी का परिणाम है कि नये लेखक बेस्ट सेलर हो रहे हैं और इसके बाद इनका हौसला और भी बढ़ा है. ये सभी अपने आसपास की कहानी लिखकर सफल हो रहे हैं. इसकी खासियत यह है कि कोई मोटी या लंबी चौड़ी किताब नहीं बल्कि 100 से 120 पन्नों की हल्की फुल्की किताबें लिख रहे हैं.
कुछ बेस्ट सेलर्स के बारे में जानिए
बनारस टॉकीज: सत्य व्यास की बनारस टॉकीज हिंदी की पिछले कुछ समय में आयी किताबों में बिक्री के लिहाज से सबसे सफल है. किताब बनारस हिंदू विश्विद्यालय के भगवान दास हॉस्टल की कहानी है जिसमें बनारस के रंग-ढंग और कॉलेज लाइफ की मस्ती को देसी तरीके से उतारा गया है. किताब की खासियत है कि इसका ह्यूमर लगातार चलता रहता है और आप 2-3 घंटों में पूरी किताब निपटा देते हैं.
मसाला चाय: फिल्मों में एक जॉनर होता है वन टाइम वॉच. हिंद युग्म से आई दिव्य प्रकाश दुबे की किताब भी ऐसी ही है. फुर्सत हो कुछ नया, हल्का-फुल्का पढ़ने का मन हो तो इसकी कहानियां पढ़ लीजिए. आपके आसपास की ही घटनाएं मिलेंगी.
मुसाफिर कैफे: दिव्य प्रकाश दुबे की लिखी हुई ये शायद वो किताब है जो मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु ही नहीं पटना जैसे हांफते शहरों में आपको कुछ पलों का ठहरा हुआ सुकून दे सकती है. चाय की चुस्की में चुटकी भर मिठास घोल सकती है.
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