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नियमित जांच से बचाएं अपनी प्यारी आंखें

Updated at : 28 May 2019 6:05 AM (IST)
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नियमित जांच से बचाएं अपनी प्यारी आंखें

आं खें ऐसी अनमोल देन हैं, जिनका महत्व वही समझ सकता है, जिसके जीवन में इसके अभाव से अंधेरा है. फिर भी लोग अपनी आंखों के प्रति अक्सर लापरवाही बरतते हैं. कई नेत्र रोगों के कोई शुरुआती लक्षण नहीं होते. वे दर्द रहित हो सकते हैं और आप तब तक अपनी दृष्टि में कोई बदलाव […]

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आं खें ऐसी अनमोल देन हैं, जिनका महत्व वही समझ सकता है, जिसके जीवन में इसके अभाव से अंधेरा है. फिर भी लोग अपनी आंखों के प्रति अक्सर लापरवाही बरतते हैं. कई नेत्र रोगों के कोई शुरुआती लक्षण नहीं होते. वे दर्द रहित हो सकते हैं और आप तब तक अपनी दृष्टि में कोई बदलाव नहीं देख सकते जब तक कि बीमारी काफी बढ़ न जाये. नियमित रूप से नेत्र रोग विशेषज्ञ से जांच कराने से आंखों से संबंधित बीमारियों को काफी हद रोका जा सकता है. अंधेपन के अधिकांश मामले अज्ञानता और समय से नेत्र जांच न होने के कारण ही होते हैं.
2017 का लांसेट ग्लोबल हेल्थ जर्नल के एक अध्ययन से यह बात सामने आयी कि विश्वभर में 36 करोड़ लोग दृष्टिहीन हैं. उनमें से 8.8 करोड़ लोग भारत में हैं. नेशनल प्रोग्राम फॉर कंट्रोल ऑफ ब्लाइंडनेस इन इंडिया की रिपोर्ट कहती है कि लगभग 80 से 90 प्रतिशत अंधेपन का या तो इलाज हो सकता है या उसकी रोकथाम की जा सकती है. तो सवाल उठता है कि आखिर इतने सारे लोग इसके शिकार क्यों हैं?
यदि आपके पास 20/20 विजन है, तो आपको शायद कभी भी यह चिंता नहीं होगी कि कभी आप इसे खो भी सकते हैं. यह सही है कि उम्र बढ़ने के साथ आंखों के देखने की क्षमता क्षीण होने लगती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि कुछ रोग ऐसे हैं, जो आपकी आंखों पर इतना असर डालते हैं कि आपको दिखाई देना तक बंद हो सकता है.
आंखों की रोशनी को इनसे है खतरा
फोर्टिस हॉस्पिटल, शालीमार बाग, दिल्ली के ऑप्थल्मोलॉजी डिपार्टमेंट के हेड डॉ सूरज मुंजाल कहते हैं- मधुमेह और उच्च रक्तचाप रेटिनोपैथी, तंबाकू और अल्कोहल एंबीओपिया, स्टेरॉयड के उपयोग और यहां तक कि ट्रॉमा से भी अंधेपन का शिकार हो सकते हैं.
लेकिन अकसर लोगों को पता ही नहीं चलता कि इन कारणों से उनकी दृष्टि चली गयी है. उम्र बढ़ने के साथ और आधुनिक जीवन शैली से उपजे तनाव की वजह से ज्यादातर लोग आजकल आंखों में थकान और तनाव महसूस करते हैं. अकसर होनेवाले सिरदर्द को पेनकीलर खाकर लोग नजरअंदाज करते रहते हैं. वे यह भी नहीं सोचते कि ऐसा आंखों में होने वाली किसी दिक्कत की वजह से हो सकता है.
अन्य बीमारियों का असर
जो समस्याएं आंख से संबंधित नहीं हैं, उनकी वजह से भी अंधापन हो सकता है, जैसे मधुमेह. डॉ मुंजाल कहते हैं हाइपरग्लेसेमिया आपके शरीर के हर हिस्से को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकता है, जिसमें आपकी आंखें भी शामिल हैं. धुंधली दृष्टि अक्सर मधुमेह के पहले चेतावनी संकेतों में से एक है. उच्च रक्तचाप रेटिना में रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है. यह आंख के पीछे का क्षेत्र होता है, जहां छवियां केंद्रित होती हैं. यह नेत्र रोग उच्च रक्तचाप से ग्रस्त रेटिनोपैथी के रूप में जाना जाता है.
न्यूरोलॉजिकल घाव या चोटें भी आंख की रोशनी छीन सकती हैं. न्यूरो ऑप्थोमोलॉजी दृष्टि समस्याएं हैं, जो तंत्रिका तंत्र से संबंधित हैं. दृष्टि की गड़बड़ी ऑप्टिक नर्व, सेंट्रल नर्वस सिस्टम के विकारों के कारण हो सकती है. रुयूमेटॉयड आर्थराइटिस जोड़ों को प्रभावित करता है. इससे आंखों में ड्राइनेस, आंख के सफेद हिस्से में सूजन, कॉर्निया का पतला होना आदि हो सकता है.
करें यह अभ्यास
एक जगह बैठ कर एक बार छत की ओर देखें, एक बार फर्श की ओर देखें. एक बार दायें दीवार की तरफ देखें और एक बार बायें दीवार को देखें. आंखों को गोलाई में नजरें घुमाएं, पहले एक दिशा और फिर दूसरी दिशा में नजर घुमाएं.
लक्षणों से रोग को पहचानें
हम लगातार कंप्यूटर, मोबाइल स्क्रीन से चिपके रहते हैं. जबकि अध्ययनों से पता चला है कि 50-90% कंप्यूटर यूजर्स कंप्यूटर विज़न सिंड्रोम या डिजिटल आइ स्ट्रेन के विजन लक्षणों से पीड़ित हैं. अधिक वजन या मोटापे के कारण मधुमेह का खतरा बढ़ जाता है, जिससे दृष्टि हानि हो सकती है. भारत में कैटेरक्ट या मोतियाबिंद अंधेपन का प्रमुख कारण है. धूप में देखने में कठिनाई या हेडलाइट्स की चमक न सह पाना मोतियाबिंद के शुरुआती लक्षण हैं.
इसी तरह, अंधेरे और चमकती रोशनी में देखने में परेशानी होना ग्लूकोमा के शुरुआती लक्षण हैं, जबकि तैरती या बिगड़ी हुई आकृतियां दिखना रेटिना की समस्याओं के लक्षण हैं. धुंधलापन, कम दिखाई देना, दर्द, आंखों से पानी आना या आंखों का लाल होना, लगातार सिरदर्द रहना जैसे लक्षणों को नजरअंदाज न करें.
एक और गंभीर बीमारी है- एएमडी या उम्र से संबंधित मैक्यूलर डिजेनेरेशन. आंखों के पर्दे की सूजन को मैक्यूलर इडिमा कहते हैं. शुरू में इसके लक्षण दिखाई नहीं देते हैं. जब सूजन बढ़ जाती है और रक्त नलिकाओं में ब्लॉकेज होने लगती है, तब चीजें धुंधली दिखाई देने लगती हैं. मैक्यूला रेटिना का वह भाग है, जो हमें दूर की वस्तुओं और रंगों को देखने में सहायता करता है. जब रेटिना में तरल पदार्थ अधिक हो जाता है और रेटिना में सूजन आ जाती है तब यह समस्या हो जाती है.
फैक्ट
दुनिया भर में विभिन्न कारणों से 300 करोड़ से लेकर 400 करोड़ लोग नेत्र रोगी हैं. इस आंकड़े में लगभग 50 करोड़ लोग पूरी तरह से दृष्टिहीन हैं. 50 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में 80 प्रतिशत अंधापन होता है. इसके सामान्य कारणों में मधुमेह, मैक्यूलर डिजेनेरेशन, दर्दनाक चोटें, कॉर्निया के संक्रमण, ग्लूकोमा शामिल हैं. एक सामान्य कारण हैं- विटामिन ए की कमी, रेटिनोपैथी.
रेगुलर चेकअप कराना है बचाव का सही उपाय
हमारे पास ज्यादातर मरीज ऐसे आते हैं जो अज्ञानता और अनियमित नेत्र जांच के कारण अंधेपन का शिकार हो चुके होते हैं. खासकर वे डायबिटीज और ग्लूकोमा के मरीज होते हैं. उचित इलाज के साथ-साथ नियमित जांच से ही इससे बचाव किया जा सकता है. बेशक आप पूर्णतया स्वस्थ हों और आपका विजन एकदम परफेक्ट हो, तो भी रेगुलर चेकअप अनिवार्य है. यदि कोई मधुमेह से पीड़ित है, तो उसे रेटिनोपैथी स्क्रीनिंग करवानी चाहिए.
आंख अगर लाल हो, तो तुरंत नेत्र चिकित्सक को दिखाएं. आंख में चोट लग जाये तो भी फौरन जांच कराएं. कॉर्नियल ब्लाइंडनेस एक प्रकार का अंधापन है, जिसे प्रत्यारोपण द्वारा ठीक किया जा सकता है. नेत्र दोष के लिए जिम्मेवार विटामिन ए की कमी, समय से पहले रेटिनोपैथी, इंफ्लेमेट्री डिजिज, रेटिना पिगमेंटोसा, रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा, जन्मजात असामान्यताएं आदि हैं.
इन लक्षणों को न करें नजरअंदाज
अचानक आंखों में दर्द, जलन होना, धुंधलापन छा जाना.
प्रकाश की चमक सह न पाना या अचानक चमकते धब्बों को देखना, मकड़ी के जाले तैरते दिखाई देना.
क्या करें
  • इन गर्मियों में धूलभरी आंधी से आंखों में गंदगी चली जाती है. आंखों को रगड़े नहीं. दिनभर में तीन-चार बार साफ पानी से आंखें धोएं.
  • रोजाना फल और सब्जियों का सेवन करें. धूम्रपान न करें.
  • कंप्यूटर पर काम करते समय नियमित रूप से ब्रेक लें.
  • चश्मा पहनने की अगर चिकित्सक ने सलाह दी है, तो अवश्य पहनें.
  • घर से बाहर निकलने पर ऐसे धूप के चश्मे पहनें, जो आपकी आंखों को यूवीए और यूवीबी किरणों से बचाते हैं.
  • लेंस की सफाई करते रहें. इलेक्ट्रॉनिक गैजेट का प्रयोग कम करें.
नेत्र रोग
मेरा बच्चा छह माह का है. अक्सर उसकी आंखों से पानी आता रहता है. क्या यह आगे गंभीर परेशानी बन सकती है? क्या उपाय है?
सुरेंद्र प्रसाद, पटना
जन्म के समय अभिभावकों को शिशु की आंख के रंग पर ही ध्यान नहीं देना चाहिए, बल्कि आंख की छोटी से छोटी विषमता का पता लगने पर तुरंत नेत्र विशेषज्ञ के पास जाना चाहिए. जन्म के समय आमतौर पर शिशु की आंखें वयस्क की अपेक्षा छोटी होती हैं. शिशु की आंखों को वयस्क की आंखों के बराबर विकसित होने में लगभग दो वर्ष का समय लगता है.
नवजात की आंखों में संक्रमण कोई असाधारण बात नहीं है. पैदा होने से लेकर तीन सप्ताह तक शिशु नियोनैटल कंजक्टिवाइटिस का शिकार हो सकता है. इसके लक्षण स्वरूप शिशु की आंख लाल रहती है और निरंतर पानी निकलता रहता है. इस संक्रमण को नेत्र विशेषज्ञ द्वारा दी गयी एंटीबायोटिक के इस्तेमाल से ठीक किया जा सकता है. शिशु के जन्म के बाद लगभग चार सप्ताह तक आंख में आंसू कम बनते हैं, इसलिए आंख से किसी भी प्रकार का पानी आना हानिकारक होता है.
जन्म के समय आंख से पानी आने का मतलब संक्रमण होता है, लेकिन शिशु के तीन महीने या उससे अधिक के हो जाने पर ऐसे लक्षणों का उभरना आंसू-प्रणाली का रुक जाना माना जाता है. टियर डक्ट वह छोटी ट्यूब होती है, जो आंखों के भीतरी छोर को नाक से जोड़ती है. यह जन्म के तीन से चार सप्ताह के पश्चात विकसित होती हैं. ऐसे में नाक के मध्य भाग पर मालिश और एंटीबायोटिक से राहत पहुंचती है. अगर यह पानी निकलना 3-4 महीनों तक ठीक न हो तो एक प्रक्रिया के दौरान टियर डक्ट को खोला जाता है.
डॉ रितिका सचदेव
एडिशनल डायरेक्टर, सेंटर फॉर साइट, नयी दिल्ली
हृदय रोग
हृदयाघात, स्ट्रोक आदि हृदय की समस्याएं आज के युवाओं में बढ़ती जा रही हैं. बचाव के क्या उपाय हैं? कब और कौन-सा चेकअप कराना चाहिए?
मो नसीम, गया
भारत में 90 फीसदी से ज्यादा हार्ट अटैक के कुछ आम रिस्क फैक्टर्स हैं, जैसे- डिसलिपिडेमिया. खून में विभिन्न प्रकार की वसा का अनियंत्रित अनुपात में होना डिसलिपिडेमिया कहलाता है. इसे नियंत्रित करने के लिए हमें स्वस्थ जीवनशैली एवं लो, PUFA युक्त आहार अपनाने चाहिए. दूसरा बड़ा कारण है, धूम्रपान एवं तंबाकू सेवन. धूम्रपान की शुरुआत ही न करें. यदि लत है भी, तो तुरंत छोड़ें. अन्य आम समस्या है हाइ ब्लड प्रेशर. इससे बचाव के लिए शुरू से नमक का सेवन कम करें. प्रतिदिन एक चम्मच नमक से ज्यादा किसी भी रूप में न लें.
यदि हाइ बीपी हो गया हो, तो चिकित्सक के निर्देशानुसार नियमित बीपी की दवा लें एवं सही खान-पान व जीवनशैली से इसे 130/80 पर रखें. यदि आप मधुमेह रोगी हैं, तो दवा नियमित लेनी चाहिए. Hba,c को 7 से नीचे रखें. कम उम्र से ही चीनी या चीनी वाली चीजों का सेवन कम करें. मोटापा भी हृदय रोग का प्रमुख कारण है. पुरुष का वजन 90 से कम, महिला का 85 से कम होना चाहिए.
बीएमआइ 23 से कम रखें. शारीरिक सक्रियता बनाये रखें. प्रति सप्ताह कम से कम 150 मिनट मीडियम इंटेनसिटी, जैसे- तेजी से चलना, दौड़, फुटबॉल, तैराकी, टेनिस, बैडमिंटन इत्यादि खेल खेलें. व्यायाम करें. स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज भी अनिवार्य रूप से करें. रोज 400 ग्राम से ज्यादा फल एवं हरी सब्जियों का सेवन करें. रोज मुट्ठी भर बादाम का सेवन करें.
डॉ एकम कुमार
हृदय व मेडिसिन विशेषज्ञ, ऑर्किड हॉस्पिटल, रांची
दादी-नानी के नुस्खे
  • आंखों की समस्या को दूर करने के लिए रोज सुबह खाली पेट पालक के पत्ते खाएं. इससे रोशनी तो बढ़ती ही है, खून भी बढ़ता है.
  • रोज सुबह खाली पेट देसी घी और उसमें पिसी हुई मिश्री और पीसी हुई काली मिर्च मिला कर खाएं. यह आंखों के लिए बहुत ही फायदेमंद है.
  • हफ्ते में तीन बार बादाम वाला दूध पीएं. इसमें विटामिन-ई होता है, जो आंखों के विकार दूर करने में फायदेमंद है. विटामिन ई जैसे एंटीऑक्सिडेंट्स आंखों के लेंस को फ्री रेडिकल्स से होने वाले नुकसान से बचाते हैं.
  • जब भी बाहर से आएं या सुबह उठने के बाद ठंडे पानी से मुंह धोना चाहिए.
  • दो बादाम रात को भिगो दें और सुबह छिलके उतार कर घिस लें. फिर दूध में मिला कर आंखों के चारों ओर लगा दें.
  • भोजन में हमेशा विटामिन A, B, C भरपूर मात्रा में लेना चाहिए. विटामिन A की कमी से रतौंधी नामक रोग हो सकता है.
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